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रामचन्द्र और शेरू कुत्ता की कहानी

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  रामचन्द्र और शेरू कुत्ता की कहानी एक छोटे से और शांत गाँव में रामचन्द्र नाम के एक सीधे-सादे और बुजुर्ग व्यक्ति रहते थे। रामचन्द्र जी अकेले ही अपना जीवन बिता रहे थे, क्योंकि समय के चक्र ने उनके परिवार को उनसे दूर कर दिया था। उनका घर गाँव के छोर पर था, जहाँ सुबह की धूप बहुत प्यारी लगती थी और शाम को खेतों की हवा सुकून देती थी। एक सर्द और ठिठुरती हुई शाम की बात है। रामचन्द्र जी जब अपने घर लौट रहे थे, तो उन्हें दरवाज़े के पास एक कोने में किसी के कांपने की आवाज़ सुनाई दी। उन्होंने पास जाकर देखा, तो वहाँ कुछ हफ़्तों का एक बहुत ही छोटा और कमज़ोर पिल्ला दुबक कर बैठा हुआ था। ठंड से उसकी हालत बहुत खराब थी। रामचन्द्र जी का दिल पसीज गया। उन्होंने बिना एक पल भी सोचे उसे उठाया, अपने आंचल या चादर में छिपाकर घर के अंदर ले आए। उन्होंने चूल्हे के पास थोड़ी आग जलाकर उसे गर्माहट दी और कटोरी में थोड़ा गुनगुना दूध पिलाया। कुछ ही दिनों की देखभाल से वह पिल्ला चंगा हो गया और उछल-कूद करने लगा। रामचन्द्र जी ने उसका नाम 'शेरू' रखा। नाम भले ही 'शेरू' था, लेकिन वह बेहद प्यारा और वफादार था। अनू...

जादू की चाबी और पुराना संदूक

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  📖 कहानी: जादू की चाबी और पुराना संदूक लेबल / श्रेणी: बच्चों की कहानियाँ | बाल कथाएँ उम्र वर्ग: 8 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए 🔍 टीज़र (Teaser) रोहन और मिया को दादाजी के पुराने कमरे में एक अजीब सी पीतल की चाबी मिली, जिस पर चमकता हुआ उल्लू बना था। लेकिन पूरे घर में उस चाबी से खुलने वाला कोई ताला नहीं दिख रहा था! क्या दोनों भाई-बहन उस छिपे हुए पुराने संदूक का रहस्य सुलझा पाएंगे? आइए पढ़ते हैं इस मजेदार और साहसिक कहानी में... 📝 पूरी कहानी एक छोटे से सुंदर शहर में दो भाई-बहन रहते थे—रोहन और मिया। रोहन दस साल का था और बहुत समझदार था, जबकि आठ साल की मिया बहुत ही उत्सुक और साहसी थी। दोनों को रहस्य सुलझाना और नई-नई चीज़ें खोजना बहुत पसंद था। रविवार की दोपहर को, जब घर के सब लोग आराम कर रहे थे, रोहन और मिया ने दादाजी के पुराने स्टोर रूम की सफाई करने का फैसला किया। उस कमरे में पुरानी किताबें, पेंटिंग्स और लकड़ी के नक्काशीदार सामान रखे हुए थे। अचानक, मिया का पैर एक पुरानी किताब से टकराया। किताब के नीचे से एक चमकती हुई चीज़ खिसककर बाहर आई। मिया ने झुककर उसे उठाया—वह पीतल की एक सुंद...

हिंदी निबंध लेखन की तैयारी कैसे करें

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  हिंदी निबंध  लेखन परीक्षा या प्रतियोगिता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए केवल भाषा का ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि सही रणनीति, अध्ययन और निरंतर अभ्यास की भी आवश्यकता होती है। निबंध लिखने की तैयारी को प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन किया जा सकता है: 1. विषयों का चयन और पठन अभ्यास सबसे पहले समसामयिक (current affairs), सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय मुद्दों की एक सूची तैयार करें। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रमुख घटनाओं पर नज़र रखें। इसके लिए नियमित रूप से हिंदी समाचार पत्र (जैसे दैनिक जागरण, जनसत्ता) के संपादकीय (Editorial) पृष्ठ पढ़ें। इससे आपकी शब्दावली में वृद्धि होगी और विचारों में स्पष्टता आएगी। 2. मुख्य बिंदुओं और आँकड़ों का संग्रह एक अच्छी निबंध पुस्तिका बनाएं, जिसमें विभिन्न विषयों से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य, सरकारी योजनाएँ, आँकड़े, और सूचकांक दर्ज करें। इसके अलावा, प्रसिद्ध विचारकों, साहित्यकारों और महापुरुषों के प्रासंगिक उद्धरण (Quotes), कविताएं तथा सूक्तियाँ लिखकर रखें। निबंध में इनका ...

भल हर, भल हरि, भल तुअ कला। खन पीत वसन खनहि बघ छला।।”

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    “भल हर, भल हरि, भल तुअ कला। खन पीत वसन खनहि बघ छला।।” यह विद्यापति के पद की पंक्तियाँ हैं और यहाँ कवि ईश्वर के हरि और हर (शिव) दोनों रूपों की अद्भुत एकता तथा उनके रूप-परिवर्तन की लीला का वर्णन कर रहे हैं।  संदर्भ एवं प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश प्रसिद्ध मैथिली कवि विद्यापति के पद से लिया गया है। विद्यापति मैथिली भाषा के प्रमुख कवियों में  सर्वाधिक प्रसिद्ध कवि माने जाते हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में ईश्वर के प्रति गहरी भक्ति, प्रेम और समर्पण की भावना व्यक्त की है। प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ईश्वर की अद्भुत शक्ति और उनकी विभिन्न रूपों में प्रकट होने की क्षमता से प्रभावित होकर उनकी प्रशंसा करता है। यहाँ हर और हरि अर्थात् शिव और विष्णु के रूपों की एकता का भाव अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त हुआ है। व्याख्या कवि कहता है कि हे प्रभु! आप हर के रूप में भी सुंदर हैं और हरि के रूप में भी सुंदर हैं। आपकी कला और आपकी लीला वास्तव में अद्भुत है। आप अपनी इच्छा के अनुसार अलग-अलग रूप धारण कर लेते हैं। आपके स्वरूप में ऐसी अद्भुत शक्ति है कि एक क्षण में आप शिव दिखाई देते हैं औ...

सूखा कुआं और किसान का धैर्य

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  सूखा कुआं और किसान का धैर्य  गांव के किनारे एक किसान का खेत था। खेत के बीचोबीच एक पुराना कुआं था। उसी से उसकी फसलों की सिंचाई होती थी। एक बार गर्मी में कुआं सूख गया। किसान ने कुएं में झांका। वहां सिर्फ मिट्टी दिखाई दे रही थी। पड़ोसी बोले, 'अब तुम कोई दूसरा खेत ढूंढ लो।' किसान ने उनकी बात नहीं मानी। उसने कुएं के आसपास की जमीन को ध्यान से देखना शुरू किया। उसने देखा कि बारिश का पानी पास की पहाड़ी से बहकर गांव के बाहर चला जाता है। उसने एक योजना बनाई। अगले दिन से उसने छोटी-छोटी नालियां खोदनी शुरू कर दीं। काम कठिन था। लोग हंसते भी थे— 'सूखे कुएं में पानी लाने चला है!' किसान चुपचाप काम करता रहा। कुछ दिनों बाद बारिश हुई। पहाड़ी से बहता पानी उन्हीं नालियों से होकर कुएं के पास की जमीन तक पहुंचने लगा। पहली बारिश में कुआं नहीं भरा। किसान ने नालियां और गहरी कर दीं। कुछ महीनों बाद कुएं के तल में पानी दिखाई देने लगा। किसान का बेटा खुशी से बोला, 'आपने सूखे कुएं को फिर से जिंदा कर दिया!' किसान बोला, 'कुआं सूखा था, रास्ता नहीं। मुझे पानी पैदा नहीं करना था, बस उसका रास्...

एकलव्य की कहानी

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 एकलव्य की कहानी  महाभारत के सबसे प्रतिभाशाली और प्रेरणादायी पात्रों में एकलव्य की कथा निष्ठा, लगन, गुरुभक्ति और आत्म-समर्पण की एक अद्वितीय मिसाल है। एकलव्य की कहानी यह सिखाती है कि यदि मनुष्य के भीतर सीखने की सच्ची तड़प और अटूट दृढ़ संकल्प हो, तो अभाव और विषमताएं भी उसके रास्ते का रोड़ा नहीं बन सकतीं। हमें आज भी एकलव्य की कहानी से सीख लेनी चाहिए। आरंभिक जीवन और धनुर्विद्या की चाह एकलव्य निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र था, जो जंगलों में रहने वाले भील समुदाय से संबंध रखता था। बाल्यावस्था से ही एकलव्य की गहरी रुचि धनुर्विद्या में थी। उसकी प्रतिभा और लक्ष्य-वेध की क्षमता जन्मजात थी, लेकिन वह अपनी कला को संपूर्ण और व्यवस्थित रूप देना चाहता था। उस काल में द्रोणाचार्य हस्तिनापुर के राजकुमारों (कौरवों और पांडवों) के कुल गुरु थे और संपूर्ण भारतवर्ष में सर्वश्रेष्ठ धनुर्विद्या के आचार्य माने जाते थे। एकलव्य द्रोणाचार्य को अपना गुरु मानकर उनके आश्रम पहुंचा और उनसे धनुर्विद्या सिखाने का निवेदन किया। परंतु, उस समय की सामाजिक व्यवस्था, राजधर्म और भीष्म पितामह को दिए गए वचन के कारण आचार्य द्...

डिजिटल युग में वित्तीय साक्षरता और सुरक्षित लेन-देन के साधन

डिजिटल युग में वित्तीय साक्षरता और सुरक्षित लेन-देन के साधन ​आज के आधुनिक समय में जहाँ शिक्षा, पठन-पाठन और साहित्य से जुड़ी अधिकांश सामग्री डिजिटल हो चुकी है, वहीं हमारे दैनिक जीवन में वित्तीय लेन-देन (Financial Transactions) का तरीका भी पूरी तरह बदल गया है। आज के समय में किताबों की खरीदारी, ऑनलाइन कोर्स की फीस, या विदेश में रहने वाले किसी मित्र या पार्टनर को पैसे भेजना या टिकट बुकिंग जैसी सेवाएँ बेहद सहज हो गई हैं। ​डिजिटल क्रांति के इस दौर में सुरक्षित लेन-देन करना बेहद महत्वपूर्ण है। जब हम इंटरनेट के माध्यम से किसी सेवा के लिए भुगतान करते हैं, तो सुरक्षा सबसे प्राथमिक विषय बन जाता है। डिजिटल भुगतान प्रणाली को सुरक्षित और सुलभ बनाने के लिए आधुनिक तकनीक पर आधारित कई डिजिटल और   Crypto Wallet India  का उपयोग बढ़ रहा है। ​ऑनलाइन लेन-देन को सुरक्षित और त्वरित बनाने के लिए कई तरह के टूल्स का इस्तेमाल किया जाता है। उदाहरण के लिए, डिजिटल भुगतानों और संपत्तियों के प्रबंधन के लिए लोग IronWallet जैसी सेवाओं का सहारा लेते हैं, जिससे ऑनलाइन सेवा (जैसे टिकट या बुकिंग) का भुगतान ...

दो बांके कहानी , लेखक भगवती चरण वर्मा, सारांश , प्रश्न उत्तर

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  दो बांके कहानी , लेखक भगवती चरण वर्मा, सारांश , प्रश्न उत्तर By  Dr Umesh Kumar Singh, Ph-D  लqखनऊ की गलियों में शाम ढल रही थी। चौक की रौनक अपने शबाब पर थी—एक तरफ़ इत्र और ज़री की दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ थी, तो दूसरी तरफ़ चाट और कबाब की ख़ास महक हवा में तैर रही थी। इसी चहल-पहल के बीच से दो नौजवान बड़ी शान से गुज़र रहे थे—नवाब मुस्तफ़ा अली और मिर्ज़ा सुल्तान बेग। दोनों ही अपने आप को शहर के सबसे बड़े 'बांके' यानी अनूठे बांकपन और अकड़ वाले शूरवीर समझते थे। सिर पर तिरछी दोपल्ली टोपी, ढीला पायजामा, कंधे पर ज़रीदार अंगोछा और चाल ऐसी जैसे पूरी कायनात उनके कदमों में झुकती हो। बांकपन का पहला नियम था—अपनी बात से पीछे न हटना, चाहे जान भले चली जाए! चौक के चौराहे पर दोनों का आमना-सामना हुआ। संकरी गली में रास्ता एक ही गाड़ी या इंसान के निकलने लायक था। न मुस्तफ़ा रुके, न मिर्ज़ा। दोनों आकर आमने-सामने खड़े हो गए। "मिर्ज़ा साहब! ज़रा किनारे हो जाइए, बांकों का रास्ता रोकने की गुस्ताख़ी अच्छी नहीं," मुस्तफ़ा ने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए कहा। मिर्ज़ा ने अपनी तिरछी टोपी को और...

नौबतखाने में इबादत' (लेखक: यतीन्द्र मिश्र) का संपूर्ण सारांश और परीक्षा-उपयोगी प्रश्न-उत्तर

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  'नौबतखाने में इबादत' (लेखक: यतीन्द्र मिश्र) का संपूर्ण सारांश और परीक्षा-उपयोगी प्रश्न-उत्तर  पाठ का सारांश (Summary) 'नौबतखाने में इबादत' प्रसिद्ध लेखक यतीन्द्र मिश्र द्वारा लिखा गया एक व्यक्तिचित्र (संस्मरण) है, जो प्रसिद्ध शहनाई वादक भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के जीवन, उनकी सादगी, संगीत साधना और धार्मिक सौहार्द पर आधारित है। प्रारंभिक जीवन और डुमरांव संबंध: बिस्मिल्लाह खान का जन्म बिहार के डुमरांव में हुआ था। डुमरांव का शहनाई से गहरा संबंध है क्योंकि शहनाई बजाने के लिए इस्तेमाल होने वाली 'रीड' (पत्ती) जिस 'नरकट' घास से बनती है, वह डुमरांव में सोन नदी के किनारे पाई जाती है। उनके परदादा और पिता डुमरांव रियासत में शहनाई बजाते थे। काशी का माहौल और रियाज़: 6 वर्ष की उम्र में वे काशी (वाराणसी) अपने मामा अली बख्श 'विलायती' के पास आ गए। काशी के बालाजी और मंगला गौरी मंदिर में वे घंटों शहनाई का रियाज़ करते थे। संगीत प्रेरणा: उन्हें संगीत की प्रेरणा अपने मामाओं के अलावा रसूलनबाई और बतूलनबाई नामक दो बहनों के गाए गीतों (ठुमरी, टप्पा, द...

सनातन धर्म में तुलसी माला का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व

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  सनातन धर्म में तुलसी माला का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व सनातन परंपरा में तुलसी को केवल एक पौधा नहीं, बल्कि साक्षात 'देवी' और भगवान विष्णु की परम प्रिय 'हरिप्रिया' माना गया है। श्रीमद्भागवत और पद्म पुराण के अनुसार, जिस घर या हृदय में तुलसी का वास होता है, वहाँ नकारात्मकता कभी टिक नहीं सकती। पूजा-पाठ, जप और साधना में तुलसी की काष्ठ (लकड़ी) से बनी माला का अत्यंत पवित्र स्थान है। तुलसी का माला सुखदाई जीवन के लिए जिसे धारण करने से श्री हरि विष्णु प्रसन्न रहते हैं। Amazon से खरीदें कम दामों में click here तुलसी माला धारण करने और जप करने के प्रमुख लाभ भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की कृपा: तुलसी माला धारण करने वाले साधक पर भगवान श्रीहरि विष्णु की विशेष अनुकंपा बनी रहती है। मान्यता है कि तुलसी की कंठी माला पहनने से व्यक्ति को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता। मन की शांति और एकाग्रता: तुलसी की काष्ठ में एक विशेष प्रकार की प्राकृतिक सुगंध और सकारात्मक ऊर्जा होती है। जब इसका स्पर्श त्वचा से होता है, तो मन के विकार शांत होते हैं और तनाव दूर होता है। मंत्र जप में असीम फल: तुलसी...

भजन और कीर्तन का आध्यात्मिक महत्व

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  भजन और कीर्तन का आध्यात्मिक महत्व भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में भक्ति मार्ग को ईश्वर प्राप्ति का सबसे सहज और उत्तम साधन माना गया है। श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित नवधा भक्ति में 'श्रवण' के बाद 'कीर्तन' का स्थान आता है। मानव मन चंचल है, और इस चंचलता को शांत कर परमात्मा से जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम भजन और संकीर्तन है। भजन और कीर्तन में मूल अंतर भजन: यह प्रायः व्यक्तिगत या एकांत में गाया जाने वाला ईश्वर का संगीतमय स्मरण है। इसमें साधक अपने इष्टदेव के गुणों, लीलाओं और महिमा का भावपूर्ण ध्यान करते हुए लीन होता है। कीर्तन: यह सामूहिक रूप से गाया जाने वाला प्रभु का नाम-स्मरण है। इसमें एक मुख्य गायक पंक्तियों का गायन करता है और अन्य लोग एक स्वर में उसका अनुसरण करते हैं। इसमें ढोलक, मंजीरा और खड़ताल जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की लय पर सभी भक्त मिलकर झूमते हैं। तुलसी का माला सुखदाई जीवन के लिए जिसे धारण करने से श्री हरि विष्णु प्रसन्न रहते हैं। Amazon से खरीदें कम दामों में click here  आध्यात्मिक एवं मानसिक लाभ मानसिक शांति और एकाग्रता: निरंतर राम-नाम या...

संपादकीय और आलेख में अंतर

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   संपादकीय और आलेख में अंतर होता  पत्रकारिता और लेखन में संपादकीय और आलेख दो ही महत्वपूर्ण विधाएँ हैं। लेकिन इनके उद्देश्य, शैली और दृष्टिकोण में गहरा अंतर है।  बिंदु संपादकीय आलेख 1. मूल उद्देश्य किसी हालिया घटना पर समाचार-पत्र या संस्था की आधिकारिक राय देना। किसी विषय पर गहराई से विश्लेषण करना, जानकारी देना या विचार प्रस्तुत करना। 2. लेखक मुख्य संपादक, वरिष्ठ पत्रकार या संपादकीय बोर्ड (नाम प्रायः गुप्त रहता है)। विषय विशेषज्ञ, स्वतंत्र लेखक या पत्रकार। (लेखक का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज रहता है।) 3. दृष्टिकोण संस्थागत और वस्तुनिष्ठ विचार। व्यक्तिगत दृष्टिकोण, शोध और विश्लेषण। 4. स्थान समाचार-पत्र का निश्चित 'संपादकीय पृष्ठ'। समाचार-पत्र, पत्रिका, ब्लॉग या वेबसाइट के विभिन्न हिस्से। संपादकीय संपादकीय समाचार पत्र की आत्मा माना जाता है। यह किसी भी सामयिक घटना, नीति या सामाजिक मुद्दे पर अखबार की अपनी राय व्यक्त करता है। विशेषताएं: ​ अनाम लेखन – लेखक का नाम नहीं होता। ​ सामयिकता – यह हाल ही में घटी घटनाओ...

समाचार और संपादकीय में अंतर

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 समाचार और संपादकीय में        अंतर  आधार समाचार संपादकीय 1. परिभाषा किसी ताजा घटना, तथ्य या सूचना का निष्पक्ष विवरण। किसी प्रमुख समाचार या विषय पर समाचार पत्र/संपादक का अपना दृष्टिकोण। 2. मुख्य उद्देश्य पाठक तक केवल सही जानकारी पहुँचाना। पाठक को किसी मुद्दे पर जागरूक करना, मार्गदर्शन करना एवं राय निर्माण करना। 3. दृष्टिकोण पूर्णतः तटस्थ एवं निष्पक्ष होता है। (Objective) विचारात्मक एवं विश्लेषणात्मक (Subjective) होता है। 4. लेखक की पहचान इसमें संवाददाता या लेखक का नाम हो सकता है या समाचार एजेंसी का स्रोत होता है। यह संपादक या वरिष्ठ विचारकों द्वारा लिखा जाता है, इसमें किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं होता। 5. लेखन शैली इसमें छः ककारों (क्या, कौन, कहाँ, कब, क्यों, कैसे) और उलटे पिरामिड शैली पर आधारित है। भूमिका, विश्लेषण, तर्क और निष्कर्ष (समाधान) के प्रारूप में लिखा जाता है। 6. तथ्य बनाम विचार इसमें केवल तथ्यों और आंकड़ों का प्रयोग होता है, विचार नहीं। मुख्य अंतर (संक्षेप में): ​ समा...

दुर्गा पूजा 2026 (Durga Puja 2026 )

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*************** दुर्गा मां का सुंदर फोटो खरीदें  क्लिक करें अमेज़न पर जाने केलिए  यह Koshtak नव दुर्गा, अम्बे शेरावाली, लक्ष्मी, काली और सरस्वती फोटो फ्रेम आपके घर के मंदिर और पूजा घर के लिए एक बेहद सुंदर और आध्यात्मिक विकल्प है। मुख्य विशेषताएं: डिजाइन: इसमें ग्लोसी लैमिनेशन पोस्टर के साथ एक शानदार गोल्डन फ्रेम है। आकार: इसका साइज 30cm x 23cm है। उपयोग: यह दीवार पर लटकाने, घर की सजावट, पूजा स्थल या किसी को उपहार देने के लिए बिल्कुल उपयुक्त है। ऑफर: इस पर 63% की भारी छूट मिल रही है और यह मात्र ₹259 में उपलब्ध है। ********************  दुर्गा पूजा भारत का प्रमुख त्योहार है। संपूर्ण भारत में इसे दशहरा पर्व भी कहा जाता है। यह त्योहार शारदीय नवरात्र के नाम से भी जाना जाता है। वास्तव में यह त्योहार पाप पर पुण्य की जीत का त्योहार है। दुर्गा पूजा नौ दिनों तक चलती है। नवमी को माता दुर्गा ने दानव महिषासुर का वध किया था। वह बड़ा मायावी था। उसके आतंक से भयभीत होकर देवताओं ने मां भगवती की आराधना की। तब मां ने देवी दुर्गा का अवतार लेकर महिषासुर के आतंक से संसार की रक्षा की थी। दु...