धोबी का कुत्ता, न घर का न घाट का

 धोबी का कुत्ता, न घर का न घाट का Dhobi ka kutta na ghar ka na ghat ka, lokkokotti




अर्थ और कहानी

कहावत लोकोक्ति किसे कहते हैं ? Kahawat and lokkokotti

 “ धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का ' सबसे पहले आप यह जान लें कि यह मुहावरा नहीं कहावत है। लोकोक्ति लोक में प्रचलित उक्ति अथवा लोक में कहीं गई बात।

अब इस प्रसिद्ध कहावत का निर्माण कैसे हुआ। इसके पीछे की कहानी क्या है ? कहावत अथवा लोकोक्ति के पीछे की कहानी जान लेने से उसका अर्थ आसानी से याद रहेगा।

धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का, कहानी

कहानी कुछ इस प्रकार है –

एक धोबी था। उसका काम था प्रतिदिन पास की नदी में जाकर कपड़े धोना। इसलिए वह रोज अपने गदहे पर गंदे कपड़ों का गट्ठर और दोपहर का भोजन लेकर नदी किनारे चल देता।

उसके पास एक कुत्ता भी था। अपने यहां एक परंपरा है, भोजन करने से पहले गाय माता को और भोजन के बाद कुत्ते को खाना देने की। कुत्ते ने देखा कि उसका मालिक तो अपना भोजन लेकर नदी किनारे जा रहा है। इसलिए घर पर रहने से कोई फायदा नहीं है। जब मालिक वहां खाएगा तो हमें भी वही भोजन मिल जाएगा।

धोबी नदी किनारे जाकर गदहे को घास चरने के लिए छोड़ दिया और स्वयं कपड़े धोने में व्यस्त हो गया।

इधर कुत्ते इस फिराक में था कि धोबी इधर खा ले और मुझे यहां खाना मिल जाए तो घर पर भी मालकिन के खाने के समय भी खाना मिल जाए।

चकमा देना मुहावरे


इधर धोबी को काम निपटाने की चिंता में खाने की सुध ही नहीं रही। तब हार कर कुत्ता घर चला गया। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। मालकिन खाना खा चुकी थी।

कुत्ता वहां से निराश होकर फिर नदी किनारे पहुंचा, लेकिन तब तक धोबी भी खाना खा चुका था। कुत्ता घर और घाट के चक्कर में भूखा रह गया। तब कहावत बना, -“ धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का।“ 

अर्थ – कहीं का न रहना।

दुविधा में दोनों गये, माया मिले न राम।

मिलता जुलता अन्य कहावत----

दो नाव पर रहना , पैर चिराकर मरना।

चौबे जी चले छब्बे बनने, दूबे बनकर आ गया।

 धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का  कहावत का वाक्यों में प्रयोग 

1.

रमेश नौकरी के चक्कर में अपना जमा जमाया व्यापार खराब कर दिया, नौकरी तो मिली नहीं, व्यापार भी बर्बाद हो गया। उसकी स्थिति ठीक धोबी के कुत्ते की हुईं , न घर का रहा न घाट का ।

2. देखो भाई ! तैयारी छोड़कर रामबाबू के पीछे पैरवी के लिए दौड़ रहे हो। कहीं तुम्हारा हाल धोबी के कुत्ते वाली न हो जाए। न घर के रहो,  न घाट के।


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लेखक परिचय

डॉ. उमेश कुमार सिंह

भूली नगर, धनबाद झारखंड।

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