पूजा में कैसा जल का उपयोग करें।

 पूजा में कैसा जल का उपयोग करें।



1. पूजा का अर्थ 2. पूजा का समय 3. पूजा  करने का स्थान 4 पूजा का जल 5 निष्कर्ष


भारत आस्था और विश्वास का देश है। ऐसी आस्था और ऐसा विश्वास की देवी देवताओं की बात और , यहां पेड़ पौधे, ईंट पत्थरों  को भी भगवान मानकर पूजा जाता है। गाय को गो माता और बैल को भगवान की सवारी मानते हैं। यहां भिन्न भिन्न प्रकार के धर्म और धर्मावलंबी रहते हैं और अपने अपने आराध्य देवी देवताओं की पूजा अर्चना करते हैं। पूजा के लिए कितने प्रकार की सामग्री की आवश्यकता होती है, उनमें पूजा का जल सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। तो आइए , पूजा का जल कैसा हो , इस पर विचार करें
1. पूजा का अर्थ 
पूजा का क्या अर्थ है। पूजा को अराधना, अर्चना इबादत , वरशिप आदि कितने नाम से जाना जाता है। परन्तु सभी का मूल अर्थ है संपूर्ण भाव से समर्पण और निष्ठा। अपने आप को अपने अराध्य देव को संपूर्ण रूप से समर्पित कर देना। शास्त्रों में नौ प्रकार की भक्ति बताती गई है।।इसे नवढा भक्ति कहा जाता है।
2. पूजा का समय 
आपके मन में यह प्रश्न बार बार आता होगा कि वह पूजा का उचित समय कब होना चाहिए। भाई पूजा का कोई निश्चित समय नहीं है , अपने कर्तव्य का पालन करते हुए जब समय मिल जाए पूजा कर लें। लेकिन सुबह और शाम दो बार , अर्थात सूर्योदय और सूर्यास्त के समय पूजा करने का उत्तम समय रहता है।
3. पूजा का स्थान 
अब इसी के साथ साथ यह प्रश्न आता है कि पूजा कहां करें। तो भाई यह जान लो कि भगवान सभी जगह है। लेकिन मंदिर अथवा पूजा घर में पूजा करने से मन एकाग्र करने में मदद मिलेगी।
4. पूजा का जल
पूजा के लिए तरह तरह की समाग्री होती है उनमें जल का विशेष महत्व है। गंगाजल को सर्वोत्तम माना जाता है। यदि गंगा का जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न हो तो  फिर किसी नदी , तालाब अथवा कुएं के साफ सुथरा जल से पूजा करें । परन्तु उसमें गंगा जल की दो बूंदें अवश्य डालें। साफ सुथरा पीतल , तांबे अथवा मिट्टी के पात्र में जल लेकर आम्र पल्लव से जल छिडकें। भगवान शिव के लिंग पर जलाभिषेक से सभी पाप का नाश हो जाता है। पूजा के बाद आचमन अवश्य करें।

सभी को अपने घर में गंगा जल अवश्य रखना चाहिए। जहां गंगा जल होता है वहां दुर्भिक्ष नहीं होता।

5. संक्षेप में यह जान लें कि स्नेह और समर्पण के भाव से जो सहज उपलब्ध हो उस जल का पूजा में उपयोग करें। भगवान भाव के भूखे हैं, बस्तुओं के नहीं। कहा भी गया है यथा शक्ति तथा भक्ति।


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