ग़ज़ल, कवि दुष्यंत कुमार 11th Hindi

1. दुष्यंत कुमार: जीवन परिचय २.गजल और भावार्थ, ३.प्रश्नोतर

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१.दुष्यंत कुमार: जीवन परिचय - 

दुष्यंत कुमार का जन्म सन् १ ९ ३३, राजपुर नवादा गाँव (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। प्रमुख रचनाएँ - सूर्य का स्वागत ध्वनियों के घेरे, साये में धूप, जलते हुए वन का वसंत, एक कंठ विषपयी, छोटे छोटे सवाल, आंगन में एक पेड़ और दोहरी जिंदगी। इनकी मृत्यु सन् 1975 में हुई।

दुष्यंत कुमार का इलाहाबाद से बहुत गहरा लगाव है क्योंकि उनका साहित्यिक जीवन उसी से प्रारंभ हुआ। आकाशवाणी और मध्यम प्रदेश राजभाषा से भी इनका अच्छा संबंध था।ग़ज़ल की विधा को हिंदी में प्रतिष्ठित करने का श्रेय दुष्यंत कुमार को ही है।

                गज़ल

कहां तो तय था चिरांगा हरेक घर के लिए
  यहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए ।।

यहाँ दरख्तों के साए मैं धूप लगती है,
चलो यहाँ से चल रहा हूँ और उम्र भर के लिए ..

ना हो कमीज तो पाव से पेट ढक लेंगे,
यह लोग कितने मुनासिब हैं इस यात्रा के लिए ..

खुदा नहीं ना सही आदमी का ख्वाब सही,
कोई हसीन नजारा तो नजर के लिए है ।।

वे मुमताइन है कि पत्थर पिघल नहीं सकते,
मैं बे तेज हूँ आवाज में असर के लिए ..

तेरा निजाम है सील दे जुबान शायर की,
ये एहतियात जरूरी है इस निकासी के लिए ..

जिएं तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले,
मरे तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए ।। 

       भावार्थ

कवि समाज की कुव्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं - हमने सपना देखा था कि स्वतंत्र भारत में हर घर में दीपक की माला जले। गाँव- गाँव रोशन होगा और चारों ओर खुशियाँ होंगी, लेकिन यहाँ तो शहरों में भी दीपक दिखाई नहीं दे रहा है। सब जगह अंधेरा ही अंधेरा है। विकास का कहीं नामोनिशान नहीं है।

यहाँ के पेड़ ही ऐसे हैं कि उनके साए में भी धूप लगती है। अर्थात यहाँ शासन व्यवस्था में ऐसे लोग हैं जिनके आश्रय में रहने से सुख के बदले दुख ही दुख मिलता है। अब तो मन यही कहता है कि यह देश छोड़कर कहीं और चला गया।

भारत के लोग ऐसे दबे- कुचले और गरीब हैं कि वह सब कुछ सहकर अभाव में जीना स्वीकार कर रहे हैं। वे कभी अपने अधिकारों के लिए सिर नहीं उठाते बस वे अपने पावों को समेटकर पेट ढकने का प्रयास करते हैं। इस तरह कहीं से कोई विद्रोह नहीं होता है और शासन व्यवस्था आराम से चलती है।

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यहां के लोग खुदा को भी इसलिए मानते हैं की की नजरों के सामने समय गुजारने के लिए कोई मनमोहक नारेबाजी हो रही है। यहां के धार्मिक लोगों का भगवान भी सच नहीं है क्योंकि उनका संसार भी सपने का संसार है।

समाज के शोषित पीड़ित लोगों का वर्ग पूरी तरह से यह विश्वास रखता है कि शोषक वर्ग, अर्थात सत्ताधारी वर्ग के सीने में पत्थर का दिल है, वह पिघल नहीं सकता। लेकिन मेरा विश्वास है कि यदि संघर्ष हो, विद्रोह हो तो उन पर भी निश्चित असर पड़ेगा। कवि आगे कहते हैं कि तेरा शासन है, सबकी आवाज़ बंद कर सकती है, लेकिन जब तक शायर की आवाज़ में दम है तब तक आशा की किरण जीवित है। इसलिए समाज में बदलाव लाने के लिए संघर्ष जरूरी है।

हमारा यह धर्म है कि हम अपने बगीचे में जिया तो इसी गुलमोहर के लिए और अगर दूसरों की गलियों में मरे तो इसी तरह गुलमोहर के लिए। अर्थात समाज कल्याण ही हमारा धर्म होना चाहिए। हम समाज के लोगों के हित के लिए आवाज बुलंद करते रहे, यही हमारा कर्म हो।

कवि का इन पंक्तियों में या विश्वास है कि यदि संघर्ष हो तो परिवर्तन संभव है। वह सामाजिक क्रांति लाने के लिए पूरी तरह से आकुल दीख रहा है। उनकी भाषा ओजमयी, साहस से परिपूर्ण है।

प्रश्न उत्तर


1 . आखिरी शेर में गुलमोहर की चर्चा हुई है । क्या उसका आशय एक खास तरह के फूल दार वृक्ष से है या उसमें कोई सांकेतिक अर्थ निहित है ?

उत्तर - गुलमोहर एक तरह का वृक्ष है। परन्तु यहां यह कवि के सपनों का भारत का प्रतीक बनकर आया है। कवि ऐसे भारत में जीना चाहता है जहां सुख , शांति और समृद्धि हो। इसके लिए वह कुछ भी न्योछावर करने को तैयार हैं। ज़ुल्म और अत्याचार से वह लड़ते हुए मर मिटना चाहता है।

2.कवि असंतुष्ट क्यों है ? 
 उत्तर - कवि असंतुष्ट हैं, इसके दो कारण हैं
१. व्यवस्था में सुविधा का अभाव। 
२.लोगों में  परिवर्तन की इच्छा शक्ति का अभाव।

3. कमीज़ न होने पर लोग पांवों से पेट क्यों  ढक लेते हैं ?

 उत्तर - यहां के लोग इतने दीन हीन और यथास्थिति वाली है कि वे अपने अधिकारों के लिए कुछ नहीं करते। उनमें संघर्ष की कोई कामना नहीं है।



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