#भारतवंशी न थकते हैं,न------!




भरत



'भारतवंशी न थकते हैं न-रूकते हैं,न-----! हां भाई! और ,न हार मानते हैं।यही है हमारी विशेषता और हमारी पहचान।अथक परिश्रम--अर्थात् बिना थके,लक्ष्य के प्रति जागरूक और काम में तल्लीन। सामने पहाड़ हो , सिंह की दहाड़ हो। फिर भी ये रूके नहीं,कभी ये झुके नहीं।। बचपन में हिंदी की पुस्तकों में पढ़ी कविताएं आज भी अनवरत आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रही है, क्योंकि सदियों की साधना और  शोध इनका मार्गदर्शन करता है। भारतवंशियो की जब आन पर बनी है तो कैसे इन्होंने अकेले ही सूखे रेगिस्तान का सीना चीरकर अपने और अपने समाज के लिए मीठे जल का सोता बहा दिया है।यह इतिहास जानता है। इसी प्रकार आदरणीय दशरथ मांझी का नाम आज विश्व इतिहास में इसलिए अमर है क्योंकि उन्होंने अकेले ही अपने मार्ग में आने वाले बिकट पहाड़ की छाती दो फाड़ कर अपना राह निकाल लिया था।

मन चंचल है।कभी कभी चिन्तित भी होता है, परन्तु निराश नहीं होना है।जब सुबह के आठ बजते हैं तो भिन्न भिन्न वेश भूषा में सजे सड़कों पर स्कूल जाने वाले बच्चों की याद आती है,। बच्चों की किलकारियों से गूंजने वाली सड़कें, कैसी बंजर और उदास लगती है। विद्यालय की कक्षाओं में  देखने से मन में यह प्रश्न उठता है कि कब इन कक्षाओं में पढ़ते लिखते शोरगुल करते बच्चे देखने का सौभाग्य प्राप्त होगा। लेकिन चिन्ता और निराशा के बादल अब जल्दी ही छटेंगे। क्योंकि हम भारत माता के वीर सपूत है।डरना,थकना क्या जाने  ?

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