संदेश

जनवरी, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पुनर्मुषिकोभव कहानी, पंचतंत्र की कथा, फिर चुहिया की चुहिया, punarmushiko bhaw, phir chuhiya ki chuhiya, panchtantra story

चित्र
पुनर्मुषिकोभव कहानी, पंचतंत्र की कथा, फिर चुहिया की चुहिया, ऋषि और चुहिया की कहानी  punarmushiko bhaw, phir chuhiya ki chuhiya, panchtantra story, Rishi aur chuhiya ki kahani प्राचीन कथा साहित्य में पंचतंत्र की कहानियों का विशेष महत्व है। पुनर्मुषिकोभव पंचतंत्र की प्रमुख कहानी है जो विभिन्न कक्षाओं में पढ़ाई जाती है। इस कहानी में एक सिद्ध योगी साधू और चुहिया से लड़की बनी युवती की कहानी है जिसमें फिर से लड़की को चुहिया बनना पड़ता है। इस तरह इस कहानी का शीर्षक पुनर्मुषको भव अथवा फिर चुहिया की चुहिया दिया गया है। बहुत पहले समय की बात है गंगा नदी के तट पर कई साधु आश्रम में रहते थे। उनके गुरु बहुत विद्वान और सिद्ध पुरुष थे । एक दिन की बात है। गुरुजी गंगा में स्नान कर नदी तट पर प्रार्थना कर रहे थे । तभी आकाश में उड़ते हुए बाज के पंजों से छूटकर एक छोटी सी चुहिया उनके हाथों में आ गिरी । वह चुहिया भूरे रंग की लंबी मूछों वाली और चमकीली आंखों वाली थी जो देखने में बहुत सुंदर लग रही थी। तपस्वी को चुहिया बहुत अच्छी लगी उन्होंने अपने मंत्र बल से चुहिया को एक सुंदर बालिका बना दिया । उस कन्या को वह...

Kanyadaan poem, poet Rituraj, कन्यादान कविता, कवि ऋतुराज, भावार्थ, व्याख्या, प्रश्न उत्तर

चित्र
  Kanyadaan poem, poet Rituraj, कन्यादान कविता, कवि ऋतुराज, भावार्थ, व्याख्या, प्रश्न उत्तर , कवि ऋतुराज का जीवन परिचय, पाठ का सारांश, ऋतुराज की काव्यगत विशेषताएं, दसवीं कक्षा  कन्यादान कक्षा दसवीं में पढाई जाने वाली एक प्रेरणादाई कविता है जिसमें बालिका शोषण और उत्पीड़न के प्रति लोगों को आगाह किया गया है। इस कविता में एक मां अपनी बेटी को परंपरागत आदर्शों से हटकर कुछ उपयोगी शिक्षा दे रही है। यहां कवि ने मां - बेटी की घनिष्ठता को एक नया परिभाषा देने का प्रयास करता है। पिता बेटी की विवाह के समय बेटी का कन्यादान करता है। वहां बेटी को भावी जीवन की कुछ सीख दी जाती है। मां बेटी की सबसे निकटतम सहेली होती है। सामाजिक व्यवस्था में स्त्री के कुछ प्रतिमान गढ़ लिए जाते हैं, कवि उन्हीं प्रतिमानों को तोड़ने का प्रयास करता है। पाठ का सार अथवा सारांश कविता कन्यादान में मां बेटी को परंपरागत आदर्श रूप से हटकर सीख दे रही है । कवि ने मां बेटी के संबंध की घनिष्ठता दर्शाते हुए नए सामाजिक मूल्य की परिभाषा देने का प्रयास किया है । सामाजिक व्यवस्था में स्त्री के आचरण के कुछ प्रतिमान गढ लिए गए हैं।...

हे मेरे जूही के फूल जैसे ईश्वर, अक्का देवी, he mere Juhi ke phul jaise ishwar, akka devi

चित्र
 हे मेरे जूही के फूल जैसे ईश्वर, कविता, कवयित्री अक्का देवी, कविता, 11 वीं हिन्दी, भावार्थ, काव्य सौंदर्य, अलंकार, प्रश्न उत्तर, कर्नाटक की मीरा अक्का देवी, अक्का देवी भगवान शिव की आराधिका,         हे मेरे जूही के फूल जैसे ईश्वर हे मेरे जूही के फूल जैसे ईश्वर मंगवाओ मुझको भीख और कुछ ऐसा करो कि भूल जाऊं अपना घर पूरी तरह झोली फैलाऊ और न मिले भीख कोई हाथ बढ़ए  कुछ देने को तो वह गीर जाए नीचे और यदि मैं झुकूं उसे उठाने तो कोई कुत्ता आ जाए और उसे झपटकर छीन ले मुझसे। व्याख्या और भावार्थ प्रस्तुत वचन कर्नाटक की सुप्रसिद्ध कवयित्री अक्का देवी द्वारा रचित है। यहां वह स्वयं को भगवान शिव जी के चरणों में समर्पित करती हुई कहती हैं -- हे जूही के फूल जैसे कोमल और  मनोरम ईश्वर ! तुम मेरा सबकुछ छीन लो। कुछ ऐसा करो कि मुझे भीख मांगनी पड़े। मैं अपना घर , गृहस्थी सब कुछ भूल जाऊं। काश ! ऐसा हो कि मैं दूसरे के सामने झोली फैलाऊं। परन्तु मुझे भीख भी न मिले। कोई मुझे कुछ देने के लिए हाथ बढ़ाए और वह मुझे न मिलकर नीचे गिर जाए। और इतना ही नहीं, मैं उसे उठाने के लिए नीचे झुकूं...