पांयनि नूपुर मंजु बजैं, कक्षा दसवीं, सवैया, कवि देव


 1.कवि देव का जीवन परिचय 2.पायनि नुपूर मंजु बजैं -- सवैया कविता 3.शब्दार्थ 4. भावार्थ 5.प्रश्न उत्तर

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1. कवि देव का जीवन परिचय

हिन्दी साहित्य के रीति काल के प्रमुख कवियों में महाकवि देव का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा में सन् 1673 में हुआ था। इनका पूरा नाम देवदत्त द्विवेदी था और वे औरंगजेब के पुत्र आलमशाह के समकालीन थे। वे कुछ दिनों तक आलमशाह के दरबारी कवि भी रहे।
राजा भोगीलाल के आश्रय में रहकर उन्होंने " रास विलास " पुस्तक की रचना की।  महाकवि देव अनेक राजाओं और नवाबों के विलासितापूर्ण जीवन को नजदीक से देखा था, इसलिए उनकी कविताओं में दरबारी संस्कृति का अधिक चित्रण हुआ है। उनके सबसे बड़े
 आश्रयदाता राजा भोगीलाल ने उनकी कविताओं पर खुश होकर उन्हें लाखों की जायदाद दान में थी। उनका देहांत 1767 में हुआ।

महाकवि देव की रचनाएं

महाकवि देव की रचनाएं 52 से 72 मानी जाती हैं, जिनमें निम्नलिखित प्रमुख हैं --  रस विलास, भाव विलास, काव्य रसायन, अष्टयाम, प्रेम तरंग,सुख सागर तरंग आदि।

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काव्यगत विशेषताएं

देव की कविताओं में श्रृंगार रस की प्रधानता है, लेकिन उनकी कविताओं में भक्ति और वैराग्य भावना का भी सुन्दर चित्रण किया गया है। उन्होंने अलंकार और श्रृंगारिकता का भी सुन्दर समायोजन किया है। दरबारी संस्कृति के चित्रण और प्रकृति चित्रण में वे माहिर कवि माने जाते हैं। उनकी कविताओं की भाषा ब्रजभाषा है। सवैया और कवित्त छंद उन्हें बहुत प्रिय है। देव रीतिकालीन भाषा के शिल्पी माने जाते हैं।

"माता का आंचल"  कहाानीीपढ़ें। 

सवैया ( कविता )


पांयनि नूपुर मंजु बजैं, कटि किंकिंन कै धुनि की मधुराई ।
सांवरे अंग लसै पट पीत, हिये हुलसै बनमालसुहाई।
माथे किरीट बड़े दृग चंचल,मंद हंसी मुखचंद जुन्हाई।
जै जंग मंदिर दीपक सुंदर, श्रीब्रजदूलह ' देव ' सहाई।।

शब्दार्थ

पांयनि - पैरों में। नुपूर - पायल ।मंजु - सुंदर। कटि - कमर । किंकिंनी- करघनी। कै - की । धुनि - आवाज । सांवरे - सांवले । लसै - सुशोभित । पट - वस्त्र , पीत - पीला । हिये- हृदय । हुलसे- प्रसन्न । सुहाई - शोभा पाना। किरीट- मुकुट । दृग - नेत्र ।जुन्हाई - चांदनी ।


भावार्थ

प्रस्तुत सवैया में महाकवि देव जी ने श्री कृष्ण के रूप सौंदर्य का सुन्दर वर्णन करते हुए उनके लौकिक सामंती ठाट बाट का चित्रण किया है। कवि कहते हैं,- श्री कृष्ण जी के पैरों में सुन्दर पायल बज रही है। कमर में करघनी बंधी हुई है, जिससे मधुर ध्वनि निकलती हैं। उनके शरीर पर पीले वस्त्र सुशोभित है तथा हृदय पर वनमाल शोभायमान है। माथे पर सुन्दर मुकुट है। उनके नेत्र विशाल है। उनके मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर हैं, जिससे चांदनी की आभा निकल रही है। कवि कहते है कि श्रीकृष्ण इस संसार रूपी मंदिर में दीपक की तरह हैं। उनकी सदा जय हो।
 यहां श्री कृष्ण जी को ब्रज का दूल्हा बताया गया है।
 ब्रजभाषा में सवैया छंद है। 
मुख चन्द्र और जंग मंदिर में रूपक अलंकार है।
पट पीत, कटि किंकिंनि , हिय हुलसे में अनुप्रास अलंकार का सुन्दर प्रयोग किया गया है। गुण माधुर्य है।



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प्रश्नोत्तर

1. श्रीकृष्ण ने क्या क्या आभूषण पहने हुए है ?
उत्तर - श्रीकृष्ण पैरों में सुन्दर पायल,कमर में करघनी, हृदय में वनमाल और माथे पर मुकुट पहने हुए है।


2. श्रीकृष्ण को दीपक क्यों कहा गया है ?

उत्तर - श्रीकृष्ण इस संसार को ज्ञान का प्रकाश देते हैं। इसलिए उन्हें इस संसार रूपी मंदिर का दीपक कहा गया है।

3.ब्रजदूलह किसे कहा गया है और क्यों ?

उत्तर - श्रीकृष्ण को ब्रज दूलह कहा गया है। जिस प्रकार दूल्हा परिवार में प्रिय होता है ,उसी प्रकार श्री कृष्ण ब्रज में प्रिय थे।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न उत्तर
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1.प्रश्न - देव किस काल के कवि हैं ? 
क. आधुनिक काल          ग रीति काल
      ख  आदि काल                              घ वीरगाथाकाल।              उत्तर - ग रीति काल

2. संसार रूपी मंदिर में कौन अलंकार है ?

- क रूपक ख. उपमा ग.दीपक घ. यमक
उत्तर - क. रूपक

3 यह सवैया किस भाषा में रचित है

क.अवधी ख. ब्रजभाषा 3. ग. खोरठा घ. इनमें से कोई नहीं।

उत्तर -- ख. ब्रजभाषा

4. ब्रज दूलह किसे कहा गया है ? 

क.श्रीराम ख. सूरदास ग. देव घ. श्रीकृष्ण

उत्तर - घ . श्रीकृष्ण

5. कटि शब्द का अर्थ है

क.नाक ख. कमर ग. गला घ. हृदय

उत्तर -- ख. कमर

 (  Click करें और इसे भी पढ़ें ) Republic Day Essay 


डार द्रूम पालना बिछौना नव पल्लव के,
सुमन झिंगूला सोहै तन छवि भारी दै।
पवन झुलावै, केकी कीर बतरावै 'देव',
कोकिल हलावै - हुलसावै कर तारी दै।।
पूरित पराग सों उतारो करै राई नोन,
कंजकली नायिका लतान सिर सारी दै।
मदन महीप जू को बालक बसंत ताहि,
प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दै।।

शब्दार्थ

डार - डाली, द्रुम -  पेड़, पल्लव - पत्ते, झिंगूला - बच्चे का ढीला ढाला कुर्ता , केकी - मोर , कीर - तोता , बतरावै- बात करते हैं. हलावे- हिलाती है,  हुलसावै -प्रसन्न करती हैं , तारी - ताली, नोन - नमक, पूरित- भरे हुए, कंज कली - कमल की कली, लतान - लताओं की ,सारी - साड़ी ,महीप- राजा, चकारी दे- चुटकी बजाकर।



व्याख्या

इन काव्य पंक्तियों में कवि देव ने बसंत को बालक के रूप में चित्रित किया है। बसंत ऋतु शिशु के लिए पेड़ की डालियां पालना है जिन पर नए नए पत्ते का बिछौना लगा है। सुंदर फूल उसका झिंगोला है और हवा शिशु रूपी बसंत को पालना झूला रही है । मोर तोता उससे बात करते हैं और कोयल उसे हिलाती है और ताली बजा कर खुशी प्रकट कर रही है। कमल कली रूपी नायिका अपने सिर को लताओं की साड़ी से ढक कर पराग उड़ाते हुए मानो राई नमक से उस बालक की नजर उतार रही है। राजा कामदेव के बालक बसंत को चुटकी बजाकर गुलाब सुबह जगा रहा है।

 भाव सौंदर्य -- इस कविता में कवि ने बसंत को उद्दीपन के रूप में प्रस्तुत किया ,है‌ । यहां कवि ने बसंत की कल्पना शिशु के रूप में की है।  लताओं को स्त्री के रूप में भी कल्पना की गई है जो शिशु की नजर उतार रही है। नायक नायिका के प्रेम के स्थान पर शिशु के प्रति वात्सल्य प्रकट होता है।

 काव्य सौंदर्य  -- ब्रजभाषा का सुंदर प्रयोग है और प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। पूरित पराग , सिर सारी में अनुप्रास अलंकार है । रूपक अलंकार का प्रयोग कंजकली रूपी नायिका लता रूपी साड़ी, पराग रूपी नोन इत्यादि में किया गया है।






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