नौबतखाने में इबादत' (लेखक: यतीन्द्र मिश्र) का संपूर्ण सारांश और परीक्षा-उपयोगी प्रश्न-उत्तर
'नौबतखाने में इबादत' (लेखक: यतीन्द्र मिश्र) का संपूर्ण सारांश और परीक्षा-उपयोगी प्रश्न-उत्तर
पाठ का सारांश (Summary)
'नौबतखाने में इबादत' प्रसिद्ध लेखक यतीन्द्र मिश्र द्वारा लिखा गया एक व्यक्तिचित्र (संस्मरण) है, जो प्रसिद्ध शहनाई वादक भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के जीवन, उनकी सादगी, संगीत साधना और धार्मिक सौहार्द पर आधारित है।
- प्रारंभिक जीवन और डुमरांव संबंध: बिस्मिल्लाह खान का जन्म बिहार के डुमरांव में हुआ था। डुमरांव का शहनाई से गहरा संबंध है क्योंकि शहनाई बजाने के लिए इस्तेमाल होने वाली 'रीड' (पत्ती) जिस 'नरकट' घास से बनती है, वह डुमरांव में सोन नदी के किनारे पाई जाती है। उनके परदादा और पिता डुमरांव रियासत में शहनाई बजाते थे।
- काशी का माहौल और रियाज़: 6 वर्ष की उम्र में वे काशी (वाराणसी) अपने मामा अली बख्श 'विलायती' के पास आ गए। काशी के बालाजी और मंगला गौरी मंदिर में वे घंटों शहनाई का रियाज़ करते थे।
- संगीत प्रेरणा: उन्हें संगीत की प्रेरणा अपने मामाओं के अलावा रसूलनबाई और बतूलनबाई नामक दो बहनों के गाए गीतों (ठुमरी, टप्पा, दादरा) से मिली, जिनके घर के रास्ते से वे रोज़ रियाज़ के लिए गुज़रते थे।
- साम्प्रदायिक सौहार्द के प्रतीक: बिस्मिल्लाह खान एक सच्चे मुस्लिम होने के साथ-साथ बाबा विश्वनाथ और माँ सरस्वती के अनन्य भक्त थे। वे मुहर्रम के दिनों में 8 दिनों तक शहनाई नहीं बजाते थे और आठवीं तारीख को नंगे पाँव रोते हुए नौहा बजाते थे। वहीं, जब भी काशी से बाहर जाते, तो सबसे पहले बाबा विश्वनाथ और संकटमोचन मंदिर की दिशा में मुँह करके बैठते और थोड़ी देर शहनाई ज़रूर बजाते।
- सादगी और सच्ची इबादत: उन्हें भारत रत्न जैसा सर्वोच्च सम्मान मिला, फिर भी वे फटी तहमत (लुंगी) पहनकर जीवन बिताते रहे। ईश्वर से वे हमेशा धन-दौलत नहीं, बल्कि 'सच्चा सुर' माँगते थे। उनका मानना था कि संगीत का कोई धर्म नहीं होता।
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मुख्य प्रश्न-उत्तर (Important Questions & Answers)
प्रश्न 1: शहनाई की दुनिया में डुमरांव को क्यों याद किया जाता है?
उत्तर: शहनाई की दुनिया में डुमरांव का महत्त्व दो मुख्य कारणों से है:
- भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का जन्म डुमरांव में ही हुआ था और उनके पूर्वज डुमरांव नरेश के दरबार में शहनाई बजाया करते थे।
- शहनाई बजाने के लिए जिस 'रीड' (पत्ती) की आवश्यकता होती है, वह 'नरकट' (एक प्रकार की घास) से बनती है, जो डुमरांव में सोन नदी के कछार में प्रचुर मात्रा में पाई जाती है।
प्रश्न 2: बिस्मिल्लाह खान को 'शहनाई की मंगलध्वनि का नायक' क्यों कहा गया है?
उत्तर: शहनाई को मांगलिक अवसरों (जैसे शादी-विवाह, त्यौहारों और धार्मिक आयोजनों) पर बजाया जाने वाला वाद्य यंत्र माना जाता है। बिस्मिल्लाह खान ने अपने अनूठे वादन से शहनाई को केवल मांगलिक आयोजनों तक सीमित न रखकर शास्त्रीय संगीत के सर्वोच्च मंचों पर प्रतिष्ठित किया। उनकी शहनाई से निकलने वाली धुनें हर मन में मंगल भावना जगाती थीं, इसलिए उन्हें 'शहनाई की मंगलध्वनि का नायक' कहा गया है।
प्रश्न 3: मुहर्रम से बिस्मिल्लाह खान के जुड़ाव को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: बिस्मिल्लाह खान और उनके परिवार के लिए मुहर्रम का महीना अत्यंत श्रद्धा और शोक का समय होता था:
- मुहर्रम के 10 दिनों में उनके परिवार का कोई भी सदस्य न तो शहनाई बजाता था और न ही किसी संगीत कार्यक्रम में भाग लेता था।
- आठवीं तारीख उनके लिए सबसे विशेष होती थी। इस दिन खान साहब खड़े होकर लगभग 8 किलोमीटर की दूरी नंगे पाँव रोते हुए तय करते थे और दालमंडी में 'फ़ातिहा' पढ़ते हुए नौहा (शोक गीत) की धुन बजाते थे।
प्रश्न 4: "बिस्मिल्लाह खान काशी की साझी संस्कृति के प्रतीक थे" — स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: बिस्मिल्लाह खान धार्मिक सद्भाव की अनूठी मिसाल थे:
- वे एक पक्के नमाजी मुस्लिम थे, जो पाँचों वक्त की नमाज़ अदा करते थे।
- इसके साथ ही वे बाबा विश्वनाथ, माँ गंगा और संकटमोचन हनुमान के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे। वे बालाजी मंदिर के प्रांगण में बैठकर रियाज़ करते थे।
- काशी से बाहर रहने पर भी वे सबसे पहले विश्वनाथ मंदिर की ओर मुँह करके बैठते और शहनाई बजाकर नमन करते थे। उनका जीवन यह संदेश देता है कि कला और ईश्वर एक हैं, धर्म उन्हें बाँट नहीं सकता।
प्रश्न 5: बिस्मिल्लाह खान ईश्वर से क्या माँगते थे और क्यों?
उत्तर: बिस्मिल्लाह खान भारत रत्न मिलने के बाद भी अत्यंत सरल जीवन जीते थे। जब उनकी शिष्या ने उनसे फटी लुंगी (तहमत) न पहनने का आग्रह किया, तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा कि ईश्वर मुझे कपड़ा न दे, पर 'सच्चा सुर' बख्श दे। वे ईश्वर से हमेशा यही दुआ माँगते थे: "मालिक, मुझे सच्चा सुर बख्श दे। सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनमोल आँसू निकल आएँ।"
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