सूखा कुआं और किसान का धैर्य
सूखा कुआं और किसान का धैर्य
गांव के किनारे एक किसान का खेत था। खेत के बीचोबीच एक पुराना कुआं था। उसी से उसकी फसलों की सिंचाई होती थी। एक बार गर्मी में कुआं सूख गया। किसान ने कुएं में झांका। वहां सिर्फ मिट्टी दिखाई दे रही थी। पड़ोसी बोले, 'अब तुम कोई दूसरा खेत ढूंढ लो।'
किसान ने उनकी बात नहीं मानी। उसने कुएं के आसपास की जमीन को ध्यान से देखना शुरू किया। उसने देखा कि बारिश का पानी पास की पहाड़ी से बहकर गांव के बाहर चला जाता है। उसने एक योजना बनाई।
अगले दिन से उसने छोटी-छोटी नालियां खोदनी शुरू कर दीं। काम कठिन था। लोग हंसते भी थे— 'सूखे कुएं में पानी लाने चला है!'
किसान चुपचाप काम करता रहा। कुछ दिनों बाद बारिश हुई। पहाड़ी से बहता पानी उन्हीं नालियों से होकर कुएं के पास की जमीन तक पहुंचने लगा। पहली बारिश में कुआं नहीं भरा। किसान ने नालियां और गहरी कर दीं। कुछ महीनों बाद कुएं के तल में पानी दिखाई देने लगा। किसान का बेटा खुशी से बोला, 'आपने सूखे कुएं को फिर से जिंदा कर दिया!'
किसान बोला, 'कुआं सूखा था, रास्ता नहीं। मुझे पानी पैदा नहीं करना था, बस उसका रास्ता खोजना था।' बेटा समझ गया कि हर बंद रास्ता अंत नहीं होता। कई बार समस्या को बदलने के बजाय समाधान तक पहुंचने का अपना तरीका बदलना पड़ता है।
साभार
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डॉ उमेश कुमार सिंह, पी-एच डी, भूली नगर धनबाद।

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