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वर्षा -ऋतु(Varsha Ritu) हिंदी- निबंध

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वर्षा ऋतु निबंध, Varsha Ritu nibandh, rainy season essay,  ऋतुओं की रानी वर्षा, वर्षा का आगमन, वर्षा का प्रकृति पर प्रभाव, वर्षा से लाभ, वर्षा से नुकसान, वर्षा ऋतु में होने वाली बीमारियां, निष्कर्ष यदि बसंत ऋतुओं का राजा है तो वर्षा ऋतुओं की रानी है। वर्षा -ऋतु के आते ही आसमान में काले- काले बादल छा जाते हैं। मेघ घमंडी हाथियों की तरह गरज- गरज कर लोगों को डराने लगता है। घनघोर वर्षा होने लगती है। चारों ओर हरियाली छा जाती है। मानो प्रकृति रानी ने जैसे हरी चादर ओढ़ ली हो। काले- काले बादल देख मोर अपने पंख फैलाकर वनों में नाचने लगते हैं। पपीहे, दादुर, झींगुर की आवाज़ें प्रकृति में गूंज उठती है। ताल तलैया भर जाते हैं।  ग्रीष्म   ऋतु की मार से तपति धरा तृप्त हो जाती है। बागों में झूले लग जाते हैं। नव तरुणियों के मन उल्लसित हो जाते हैं।  नदियों में जल भर जाता है और उनका वेग भी बढ़ जाता है। मानो इतराती हुई अपने प्रियतम सागर से मिलने जा रही हो। और  किसानों की खुशियों की तो बात ही ना पूछो। वह हल बैल के लेकर अपने खेत की ओर निकल पड़ते हैं। धान की बुवाई प्रारंभ हो जाती है।                          

जब राजा जय सिंह छोटी रानी के प्रेम में---

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                          महाराजा जय सिंह राजा जय सिंह बड़ा प्रतापी राजा थे। कहते हैं, जब उनकी नयी नयी शादी हुई थी, तो वे अपनी छोटी रानी के प्रेम में इतने आसक्त हो गये थे  कि नयीनवेली दुल्हन को छोड़कर कभी रंगमहल से बाहर निकलते ही नहीं थे। नतीजा, राज्य का बुरा हाल हो रहा था।सब कुछ ठप। मंत्री-दरबारी सब बेचैन। अब क्या होगा? परन्तु राजा  के भोग विलास में खलल डालकर मृत्यु को कौन आमंत्रित करें। संपूर्ण राज्य में एक अजीब सी उदासी छाई थी। तभी एक सुप्रसिद्ध कवि बिहारी लाल कहीं से घूमते हुए वहां आ पहुंचे। मंत्रिपरिषद ने उन्हें सब हाल से अवगत करा कर कुछ करने का आग्रह किया। कवि बिहारी ने एक दोहा लिखकर राजा के अंत:पुर में भिजवाया।दोहा था---"नहीं पराग नहीं मधुर मधु, नहीं विलास यही काल।अली कली ही सो बध्यो , आगे कौन हवाल।।" अर्थात यदि भौंरा(राजा) कली (रानी) के प्रेम में ही बंधा  रहे तो फिर आगे क्या होगा ? जादू सा असर इस दोहे का राजा पर हुआ।वे तत्काल रंगमहल से बाहर निकल आए। जैसे गहरी  नींद से जागे, फिर सब कुछ ठीक हो गया।                                                               महाकवि बिह

#भारतवंशी न थकते हैं,न------!

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'भारतवंशी न थकते हैं न-रूकते हैं,न-----! हां भाई! और ,न हार मानते हैं।यही है हमारी विशेषता और हमारी पहचान।अथक परिश्रम--अर्थात् बिना थके,लक्ष्य के प्रति जागरूक और काम में तल्लीन। सामने पहाड़ हो , सिंह की दहाड़ हो। फिर भी ये रूके नहीं,कभी ये झुके नहीं।। बचपन में हिंदी की पुस्तकों में पढ़ी कविताएं आज भी अनवरत आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रही है, क्योंकि सदियों की साधना और  शोध इनका मार्गदर्शन करता है। भारतवंशियो की जब आन पर बनी है तो कैसे इन्होंने अकेले ही सूखे रेगिस्तान का सीना चीरकर अपने और अपने समाज के लिए मीठे जल का सोता बहा दिया है।यह इतिहास जानता है। इसी प्रकार आदरणीय दशरथ मांझी का नाम आज विश्व इतिहास में इसलिए अमर है क्योंकि उन्होंने अकेले ही अपने मार्ग में आने वाले बिकट पहाड़ की छाती दो फाड़ कर अपना राह निकाल लिया था। मन चंचल है।कभी कभी चिन्तित भी होता है, परन्तु निराश नहीं होना है।जब सुबह के आठ बजते हैं तो भिन्न भिन्न वेश भूषा में सजे सड़कों पर स्कूल जाने वाले बच्चों की याद आती है,। बच्चों की किलकारियों से गूंजने वाली सड़कें, कैसी बंजर और उदास लगती है। विद्यालय की कक्षाओं में  देख

सफलता का रहस्य,सफल होने के मंत्र

''मरे हुए चूहे बेच बना महासेठ'' हां भाई , हां। यह बात बिल्कुल सत्य है। यह असंभव कार्य संभव कर दिखाया है आप जैसे ही किसी व्यक्ति ने। महत्त्व इस बात का नहीं है कि किसने किया, महत्त्व इस बात का है कि कैसे किया। किसके बलबूते पर किया। ऐसे कठिन और जटिल काम कोशिश,सोच और विश्वास के बलबूते संभव होता है। कोशिश का तात्पर्य अपने भविष्य को संवारने, सुन्दर बनाने और सुरक्षित करने का प्रयास से है।अब प्रश्न यह उठता है कि भाई, भविष्य क्या है, यह संवरता है कैसे। तो इस संबंध में विद्वानों ने यह मत प्रदान किया है कि हमें प्रतिदिन दिन भर के कार्यों का लिस्ट बनाकर करणीय कार्यों की सूची तैयार करनी चाहिए और फिर ईमानदारी से उसे पूरा करने का प्रयास करना चाहिए। आप देखते हैं न, डायरी के पन्नों पर वर्ष के दिन, तारिख अंकित रहते हैं। इसका उद्देश्य यही है। इसी तरह हफ्ते, महिने,साल ही नहीं वल्कि संपूर्ण जीवन का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। और फिर जीवन पर्यन्त उसे प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।सोच भी कार्य सिद्धि का एक बड़ा महत्व पूर्ण हिस्सा है।एक कामयाब व्यक्ति सदैव अपने काम के प्रति साकारात्मक सोच

मित्रता : एक अनमोल खजाना, अचूक औषधि friendship.

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Mitrta kya hai, सच्चे मित्र कैसे होते हैं ? मित्रता किससे करनी चाहिए। मित्रता अनमोल निधि है,"निज दुःख गिरि सम रज करि जाना। मित्र के दुःख रज मेरू समाना।जे न मित्र दुःख होहि दुखारि।तिनहि विलोकत पातक भारि।। अर्थात, अपना दुख बड़ा हो फिर भी उसे छोटा समझो और मित्र का दुख छोटा हो फिर भी उसे बड़ा समझो। श्रीराम नरोत्तम हो कर भी बेसहारा सुग्रीव से मित्रता की।सुग्रीव के दुख के सामने अपने दुःख को थोड़ी देर के लिए भूल से गये।और फिर उन्होंने किस प्रकार सुग्रीव की सहायता की ,यह सभी जानते हैं। दुःख में मित्र की भरपूर सहायता करनी चाहिए। गोस्वामी तुलसीदास जी ने तो यहां तक लिख दिया है कि"धीरज धर्म मित्र अरू नारी। आपत काल परेखहु चारि। भाई, मित्रता की परीक्षा तो आपत्ति विपत्ति में ही होती है।सुख और आनंद की मित्रता को क्या नाम दें, विचार करना होगा।अब जरा कुमित्रो या कपटी मित्रों की भी चर्चा कर ली जाए।   कौवे ,हिरण और सियार की कहानी याद करें,कपटी मित्र कैसे मारने तथा सच्चा मित्र कैसे बचाने का प्रयत्न करता है। और अंततः बचाने वाले छोटे कौवे की जीत होती है।तो भाई, विपत्ति परेशानी तो आती ही है परीक्षा

मन की स्वतंत्रता

तन का मन से बहुत गहरा और अन्योनाश्रित संबंध है। कहते हैं,मन स्वस्थ , सुंदर और स्वतंत्र तो तन भी स्वस्थ, सुंदर और स्वतंत्र रहेगा, इसमें थोड़ा भी संसय नहीं करना चाहिए।आप देखिएगा, बड़े बड़े जानलेवा और घातक बीमारियों से मनुष्य तब बचा रहता है जब तक उसे बीमारी का पता नहीं चलता, लेकिन जैसे ही उसे यह अहसास हो जाता है कि उसे तो बड़ी भयंकर और घातक बीमारी ने धर दबोचा है तो उसे बचाना बड़े बड़े चिकित्सक के लिए भी कठिन हो जाता है। तात्पर्य बिल्कुल साफ है,मन सुदृढ़ और सही तो तन भी ठीक। इसीलिए विद्वानों ने तन की पराधीनता से अधिक खतरनाक मन की पराधीनता को माना है। मनुष्य मन से परतंत्र रहेगा तो वह स्वतंत्रता की बात भी सोच नहीं सकेगा।इस तरह वह युगों युगों तक, पीढ़ी दर पीढ़ी गुलामी की इन जंजीरों में जकड़ा हुआ रहेगा। इस संदर्भ में एक बड़ी रोचक कहानी याद आ रही हैं। एक सांप और मेंढक में बहस छिड़ गई। मैं तो मैं। मेंढक ने कहा, तुम्हारे बिष से नहीं,वल्कि तुम्हारे बिष के भय से लोग मर जाते हैं। सांप मेंढक की इस बात को मानने को तैयार नहीं था। उधर से एक आदमी आ रहा था, हाथ कंगन को आरसी क्या, हुआ कि आजमा लिया जाए।तय ह