दो बांके कहानी , लेखक भगवती चरण वर्मा, सारांश , प्रश्न उत्तर
दो बांके कहानी , लेखक भगवती चरण वर्मा, सारांश , प्रश्न उत्तर
लखनऊ की गलियों में शाम ढल रही थी। चौक की रौनक अपने शबाब पर थी—एक तरफ़ इत्र और ज़री की दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ थी, तो दूसरी तरफ़ चाट और कबाब की ख़ास महक हवा में तैर रही थी। इसी चहल-पहल के बीच से दो नौजवान बड़ी शान से गुज़र रहे थे—नवाब मुस्तफ़ा अली और मिर्ज़ा सुल्तान बेग।
दोनों ही अपने आप को शहर के सबसे बड़े 'बांके' यानी अनूठे बांकपन और अकड़ वाले शूरवीर समझते थे। सिर पर तिरछी दोपल्ली टोपी, ढीला पायजामा, कंधे पर ज़रीदार अंगोछा और चाल ऐसी जैसे पूरी कायनात उनके कदमों में झुकती हो। बांकपन का पहला नियम था—अपनी बात से पीछे न हटना, चाहे जान भले चली जाए!
चौक के चौराहे पर दोनों का आमना-सामना हुआ। संकरी गली में रास्ता एक ही गाड़ी या इंसान के निकलने लायक था। न मुस्तफ़ा रुके, न मिर्ज़ा। दोनों आकर आमने-सामने खड़े हो गए।
"मिर्ज़ा साहब! ज़रा किनारे हो जाइए, बांकों का रास्ता रोकने की गुस्ताख़ी अच्छी नहीं," मुस्तफ़ा ने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए कहा।
मिर्ज़ा ने अपनी तिरछी टोपी को और थोड़ा सरकाया और ठसक के साथ बोले, "मुस्तफ़ा भाई! लगता है शाम के चिराग़ बुझने से पहले ही आपकी नज़र धुंधला गई है। मिर्ज़ा सुल्तान बेग कभी किसी के लिए अपनी राह नहीं बदलता।"
आस-पास के दुकानदार और राहगीर भांप गए कि कोई बड़ा माजरा होने वाला है। देखते ही देखते वहाँ तमाशबीनों की भीड़ जमा हो गई। दोनों ही अपनी-अपनी जगह पर अडिग खड़े रहे—न एक कदम पीछे, न एक कदम दायें-बायें।
घंटों बीत गए। सूरज पूरी तरह ढल चुका था और चौक की लालटेनें जल उठी थीं। लोग आते, दोनों को बुत बने खड़े देखते और चले जाते। मुस्तफ़ा और मिर्ज़ा के पैर अब अकड़ने लगे थे, प्यास से गले सूख रहे थे, लेकिन 'बांकपन' और 'लखनऊ की आन' का सवाल था! पीछे हटने का मतलब था—पूरे शहर में हमेशा के लिए हंसी का पात्र बन जाना।
आधी रात हो आई। बाज़ार सन्नाटे में डूबने लगा। दुकानों के शटर गिर चुके थे। चौराहे पर केवल वही दो 'बांके' सीना ताने आमने-सामने खड़े थे। थकावट के मारे दोनों की टांगें कांप रही थीं, पर ज़बान की अकड़ कायम थी।
"मुस्तफ़ा! अगर तुम एक कदम पीछे हट जाओ, तो मैं तुम्हें कल सुबह चौक में बेहतरीन मलाई की चाय पिलाऊँगा," मिर्ज़ा ने थककर थोड़ा गिड़गिड़ाने वाले लहजे में रास्ता तलाशना चाहा।
"मिर्ज़ा! बात चाय की नहीं, बांकपन की है। अगर तुम दायें हट जाओ, तो मुग़लई कबाब मेरी तरफ़ से," मुस्तफ़ा ने भी मुस्कुराने की कोशिश करते हुए ज़ोर लगाया।
तभी दूर से गश्त लगाते हुए कोतवाल की भारी आवाज़ गूंजी, "कौन है वहाँ? इस वक़्त चौराहे पर क्या कर रहे हो?"
कोतवाल के हाथ में मोटा लट्ठ था और उसके साथ दो सिपाही भी थे। लखनऊ के बांके नवाबों से तो नहीं डरते थे, पर पुलिस के लट्ठ से बांकपन का भूत उतरने में देर नहीं लगती थी।
जैसे ही कोतवाल की लालटेन का उजाला उन पर पड़ा, मुस्तफ़ा ने आहिस्ते से कहा, "मिर्ज़ा, वक़्त नज़ाकत का है। एक साथ पीछे मुड़ते हैं, वरना ये कोतवाल हमारी सारी ऐंठ निकाल देगा।"
"क़बूल है!" मिर्ज़ा तुरंत बोले।
"तीन गिनने पर... एक... दो... तीन!"
दोनों बांके एक साथ पलटे और बिना पीछे मुड़कर देखे, अपनी-अपनी हवेली की तरफ़ दुम दबाकर सरपट दौड़ पड़े।
अगली सुबह चौक में जब लोग जमा हुए, तो कल रात का कोई निशान वहाँ नहीं था। दोपहर को मुस्तफ़ा और मिर्ज़ा फिर उसी चौराहे पर मिले। इस बार दोनों ने एक-दूसरे को बड़े अदब से सलाम किया और एक ही दुकान पर बैठकर चाय पी। बांकपन की शान भी बच गई थी और कोतवाल का डंडा भी टल गया था!
यहाँ कहानी 'दो बांके' पर आधारित महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके उत्तर दिए गए हैं:
प्रश्न 1: कहानी 'दो बांके' के मुख्य पात्र कौन-कौन हैं और उनका व्यक्तित्व कैसा था?
उत्तर: कहानी के मुख्य पात्र नवाब मुस्तफ़ा अली और मिर्ज़ा सुल्तान बेग हैं। दोनों ही स्वयं को लखनऊ का सबसे बड़ा 'बांका' (अकड़ और आन-बान-शान वाला व्यक्ति) मानते थे। वे अपनी बात से पीछे न हटने और व्यर्थ की ऐंठ दिखाने को ही अपनी शान समझते थे।
प्रश्न 2: चौक के चौराहे पर दोनों बांकों के बीच विवाद किस बात पर हुआ?
उत्तर: संकरी गली के चौराहे पर जब दोनों का आमना-सामना हुआ, तो कोई भी एक-दूसरे को रास्ता देने के लिए तैयार नहीं हुआ। दोनों का मानना था कि रास्ता देने के लिए कदम पीछे हटाना या बगल होना उनके 'बांकपन' और आन का अपमान होगा। इसी बात पर दोनों के बीच विवाद खड़ा हो गया।
प्रश्न 3: दोनों बांके घंटों तक चौराहे पर क्यों खड़े रहे?
उत्तर: दोनों में से कोई भी अपनी हार स्वीकार नहीं करना चाहता था। उन्हें डर था कि यदि वे एक कदम भी पीछे हट गए या झुक गए, तो पूरे लखनऊ शहर में उनका मज़ाक उड़ेगा। इसलिए प्यास, थकावट और पैर कांपने के बावजूद वे अपनी झूठी शान में घंटों चौराहे पर डटे रहे।
प्रश्न 4: दोनों बांकों की अकड़ और जिद अंत में कैसे टूटी?
उत्तर: आधी रात को जब गश्त लगाता हुआ कोतवाल हाथ में लट्ठ लेकर वहाँ पहुँचा, तो पुलिस के डर से दोनों की अकड़ ढीली पड़ गई। बांकपन की झूठी शान के चक्कर में पुलिस के लट्ठ से पिटने के डर से दोनों ने समझदारी दिखाई और तीन गिनकर एक साथ उल्टे पाँव अपने-अपने घर की ओर भाग निकले।
प्रश्न 5: इस कहानी से क्या संदेश या सीख मिलती है?
उत्तर: यह कहानी झूठी शान, व्यर्थ के अहंकार और दिखावे पर करारा व्यंग्य करती है। इससे यह संदेश मिलता है कि व्यावहारिक जीवन में समय और परिस्थिति के अनुसार लचीलापन होना ज़रूरी है; केवल झूठी ऐंठ और मूंछ की लड़ाई के चक्कर में अपनी ऊर्जा व समय बर्बाद करना मूर्खता है।


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