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वर्षा -ऋतु(Varsha Ritu) 2026 हिंदी- निबंध लिखने का TRICK

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वर्षा ऋतु निबंध, Varsha Ritu nibandh, rainy season essay, important essay for examination  ऋतुओं की रानी वर्षा, वर्षा का आगमन, वर्षा का प्रकृति पर प्रभाव, वर्षा से लाभ, वर्षा से नुकसान, वर्षा ऋतु में होने वाली बीमारियां, निष्कर्ष यदि बसंत ऋतुओं का राजा है तो वर्षा ऋतुओं की रानी है। वर्षा -ऋतु के आते ही आसमान में काले- काले बादल छा जाते हैं। मेघ घमंडी हाथियों की तरह गरज- गरज कर लोगों को डराने लगता है। घनघोर वर्षा होने लगती है। चारों ओर हरियाली छा जाती है। मानो प्रकृति रानी ने जैसे हरी चादर ओढ़ ली हो। काले- काले बादल देख मोर अपने पंख फैलाकर वनों में नाचने लगते हैं। पपीहे, दादुर, झींगुर की आवाज़ें प्रकृति में गूंज उठती है। ताल तलैया भर जाते हैं।  ग्रीष्म   ऋतु की मार से तपति धरा तृप्त हो जाती है। बागों में झूले लग जाते हैं। नव तरुणियों के मन उल्लसित हो जाते हैं।  नदियों में जल भर जाता है और उनका वेग भी बढ़ जाता है। मानो इतराती हुई अपने प्रियतम सागर से मिलने जा रही हो। और  किसानों की खुशियों की तो बात ही ना पूछो। वह हल बैल के लेकर अपने खेत की ओर निकल पड़ते हैं...

​संत नामदेव का पद , पाठ्य पुस्तक का नाम गंगा, class ninth, Hindi, भावार्थ, प्रश्न उत्तर

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संत नामदेव जी के पद class nine Hindi   कक्षा 9 की नई पाठ्यपुस्तक  'गंगा'  में शामिल  संत नामदेव  का पद ईश्वर की सर्वव्यापकता को दर्शाता है। इस पद में वे बताते हैं कि ईश्वर किसी एक स्थान या वस्तु में सीमित नहीं है, बल्कि वह चराचर जगत के कण-कण में व्याप्त है। ​ यहाँ उनका प्रमुख पद दिया गया है: मैं न होतौ, तुम न हौतो ​ संत नामदेव का पद ​ मै न होतौ, तुम न होतौ, कर्म न होता काया। हम न होते, तुम न होते, कौन कहाँ ते आया? चंद न होता, सूर न होता, पानी पवन मिलाया। शास्त्र न होता, वेद न होता, कर्म कहाँ ते आया? ​ पाँडे तुमरी गायत्री लोधे का खेत खाती थी। लकुटी ठेंगा टगि टगि करै, लँगड़ी लँगड़ी जाती थी। पिंजर के विट्ठा, बाहर के विट्ठा, विट्ठा विट्ठा सब जग भया। नामदेव कहै, विट्ठा के बिना, कोइ ठौर खाली नहीं रह्या।। ​ पद का सरल भावार्थ: ​ सृष्टि की उत्पत्ति: नामदेव जी कहते हैं कि जब न यह शरीर (काया) था, न कर्म थे, न चंद्रमा, न सूर्य और न ही शास्त्र या वेद, तब भी वह परम तत्व (ईश्वर) विद्यमान था। वे पूछना चाहते हैं कि जब कुछ नहीं था, तब इस सृष्टि का आधार क्या था? ...

लिंग (Gender) के सामान्य नियम TGT/PGT NET exam special

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  लिंग (Gender) ​लिंग का सामान्य अर्थ है चिह्न । व्याकरण में लिंग का अर्थ भेद से है जिससे स्त्री अथवा पुरुष जाति का पता चलता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि शब्द के जिस रूप से स्त्री अथवा पुरुष जाति का बोध होता है उसे लिंग कहते हैं। ​ जैसे: ​नर — नारी ​मर्द — औरत ​बैल — गाय ​सिंह — सिंहनी ​कुत्ता — कुतिया ​मोर — मोरनी आदि। ​हिन्दी में लिंग दो प्रकार के होते हैं— ​ पुल्लिंग (Masculine Gender) ​ स्त्रीलिंग (Feminine Gender) ​ 1. पुल्लिंग — पुरुष जाति का बोध कराने वाले शब्द पुल्लिंग होते हैं। ​ जैसे — नर, लड़का, छात्र, घोड़ा, हाथी, बालक, मोर, वृक्ष, फल, भवन, देश, बंदर, पुत्र, भाई, देवर, पति, धोबी, दास, नौकर, शिक्षक आदि। ​ 2. स्त्रीलिंग — स्त्री जाति का बोध कराने वाले शब्द स्त्रीलिंग कहे जाते हैं। ​ जैसे — नारी, लड़की, बालिका, खिड़की, गाय, भैंस, बकरी, चिट्ठी, माता, साली, बंदरिया, मामी, चिड़िया, दासी, देवरानी, शिक्षिका आदि। ​ पहचान — ​शब्दों के लिंग की पहचान तीन तरह से होती है — ​ 1. प्राकृतिक रूप से: नर, बाघ, घोड़ा, कुत्ता, शेर, बैल, हाथी आदि प्राक...

पर्यायवाची / समानार्थी शब्द

  पर्यायवाची / समानार्थी शब्द ​ — BY Dr. Umesh HINDI Academy ​लगभग एक समान अर्थ प्रदान करने वाले शब्दों को पर्यायवाची अथवा समानार्थी शब्द कहते हैं। प्रमुख पर्यायवाची शब्दों की सूची — ​ अमृत — अमिय, सोम, सुधा, पीयूष, जीवनोदक, अमी। ​ अग्नि — आग, पावक, दाहक, ज्वाला, वह्नि, वायुसखा, दहन। ​ अम्ब — अम्बा, माँ, माता, जननी, धात्री, अम्बिका। ​ अनुपम — अतुल, अपूर्व, अद्वितीय, अनोखा, अद्भुत, अनन्य। ​ असुर — दैत्य, दनुज, दानव, राक्षस, यातुधान, निशिचर, रजनीचर, तमीचर। ​ अम्बर — आकाश, नभ, द्यौ, व्योम, गगन, शून्य, अंतरिक्ष, आसमान, अनन्त, अभ्र। ​ अचल — भूधर, गिरि, पहाड़, पर्वत, नग, कूट। ​ अच्छा — शुभ, उचित, उपयुक्त, शोभन। ​ अनिल — हवा, मारूत, वात, समीर, पवन, वायु, बयार, प्रकम्पन। ​ अश्व — घोड़ा, घोटक, हय, सैन्धव, तुरंग, वाजि। ​ अनुचर — नौकर, दास, सेवक, भृत्य, परिचारक, चाकर, किंकर। ​ अन्य — दूसरा, भिन्न, पृथक। ​ अमर — देवता, अनिमेष, सुर, निर्जर, विबुध, देव, त्रिदश, गीर्वाण, आदित्य।

Kshitij part 2 Hindi ncert सूरदास के पद पाठ 1 class 10 questions answers

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     Kshitij part 2 Hindi ncert सूरदास के पद पाठ 1 class 10 ( 2026-27) By - Dr. Umesh Kumar Singh, Dhanbad Jharkhand  यह पाठ ( सूरदास के पद) दसवीं कक्षा की हिंदी पुस्तक क्षितिज 2 से ली गई है। यहां सूरदास जी द्वारा रचित पद उसके भावार्थ, प्रश्न उत्तर दिए गए हैं जो छात्र छात्राओं के लिए अत्यंत उपयोगी है। ऊधौ, तुम हो अति बड़भागी। मन की मन ही मांझी रही। अर्थ, व्याख्या, प्रश्न उत्तर MCQ  पठित पदों की सूची  १.ऊधौ तुम हौ अति बड़भागी । २. मन की मन ही मांझी रही। ३. हमारैं हरि हासिल की लकड़ी। ४. हरि हैं राजनीति पढिआए Kshitij part 2 , 10th class Hindi के छात्र छात्राओं के लिए यहां पाठ 1 से सूरदास के पदों की संपूर्ण व्याख्या , शब्दार्थ, प्रश्न उत्तर विस्तार से दिए जा रहे हैं जिससे विद्यार्थी बंधू भगिनी को लाभ हो। महाकवि सूरदास जी की जीवनी और उनके पद भी दिए गए हैं।   सूरदास का जीवन परिचय सूरदास हिंदी साहित्य के चमकते सूर्य के समान हैं। इनका जन्म मथुरा के समीप रुनकता अथवा रेणुका क्षेत्र में 1478 ई में हुआ था। इनकी पारिवारिक स्थिति के बारे में जानकारी नहीं मिलती। माता...

Ram Lakshman Parasuram Sambad

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सूरदास के पद, जीवन परिचय  राम लक्ष्मण परशुराम संवाद www.bimalhindi.in रामचरितमानस महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित एक उत्कृष्ट महाकाव्य है। इसमें श्रीराम के चरित्र का बहुत सुंदर वर्णन किया गया है। रामचरितमानस के बाद कांड में श्री राम - लक्ष्मण - परशुराम का संवाद एक प्रमुख प्रसंग है। जनकपुर में धनुष भंग होने पर परशुरामजी का आगमन होता है। परशुराम जी श्रीविष्णु के ही अवतार थे। नाथ संभू धनु भंज निहारा । होइहि केऊ एक दास तुम्हारा।। आयसु काह कहिअ किन मोहि । सुनि रिसाइ बोले मुनि कोहि।।  सेवकुसो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करनीकरि क्लिक ललाई।। सुनहु राम जेहि सिव धनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।। सो बिलगाऊ बिहाइ समाजा । न तो मारे जैहहिं सब राजा।। सुनि मुनि बचन लखन मुस्काने। बोले परशु धरहि अवमाने।। बहु धनुहि तोरी लरिकाई। कबहु न असि रिस कीनहि गोसाईं।। येहि धनु पर ममता केहि हेतु। सुनि रिसाइ कह भृगुकुल केतु।।               रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न संभाल।       धनुहि हम त्रिपुरारी धनु बिदित सकल संसार।। प्रश्न 1. परशुराम क...

Bhai Bhai Ka Prem (भाई- भाई का प्रेम)

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 संसार में भाई-भाई का प्रेम अनमोल और अनुपम है। संसार में सब कुछ खो कर पुनः पाया जा सकता है, परन्तु भाई को खोकर दुबारा पाना नामुमकिन है। रामायण हो या महाभारत अथवा विश्व का कोई अन्य महाकाव्य, या विश्व का कोई भी भाग, भाई - भाई के बीच प्यार को संसार की अमूल्य निधि माना  गया है। परन्तु आधुनिक युग में इस अनमोल प्रेम के बीच कई कारणों से दरार और दूरियां भी देखी जा रही है।                         श्रीराम -भरत   मिलाप                     राा    दोस्तों! भारत में कहीं भी जाइए, जब भातृ - प्रेम की बात आती है तो राम चरित मानस की यह पंक्तियां  मुख से अनायास ही निकल आती है-                                    सुत वित्तनारि भवन परिवारा।होहि जाहि जंग बारहिबारा। अस विचार जियंजागहु ताता।मिलेन जगत सहोदर भ्राता।    पुत्र,धन,स्त्री, घर और परिवार-- ये सभी जगत में मि...

हम करेंगे आज भारत देश का जयगान, ( 2026-27)HM karenge aaj bharat

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  जयगान Jaygan poem question answer ( 2026-27) हम करेंगे आज भारत देश का जयगान। द्वेध दुख का अंत होगा, अब न त्रास दुरंत होगा,  अब फहरेगा हमारा एक विजय निशान! हम करेंगे आज भारत देश का जयगान ! यश का गान ! रजत श्रंग तुषार शेखर, तुंग यह हिमवान गिरिवर, हम यहां निर्दवंद्व होकर, बनेंगे गतिवान ! हम करेंगे आज भारत भूमि का जयगान ! यश का गान ! पोत – दल शत शत तरेंगे, पश्चिमी सागर भरेंगे, गर्जना में ध्वनित होगा, देश गौरव मान ! हम करेंगे आज भारत देश का जयगान ! यश का गान! बने विद्या भवन शोभन, देव मंदिर से सुपावन हम करेंगे देश भारत, ज्ञान वृद्ध महान ! हम करेंगे आज भारत देश का जयगान ! यश का गान !  कवि सुब्रमण्यम भारती। मेरे youtube channel Dr.Umesh Hindi Academy भी देखें। शब्दार्थ द्वेध – दो प्रकार के ‌। अंत – समाप्त ।  त्रास – दुख । दुरंत – प्रबल, प्रचंड । गिरि – पर्वत । गति – चाल । तुषार शेखर – बर्फ का घर , हिमालय। जग जीवन में जो चिर महान (क्लिक करें और पढ़ें) हम असत्य से बचें, सत्य पर चलें (क्लिक करें और पढ़ें) यश – प्रसिद्धि। पोत दल – नौकादल । शत – सौ । ध्वनित – गुंजायमान। सुपावन...

Phuta prabhat (poem) (2026 - 27 ) question answer फूटा प्रभात कविता का भाव सौंदर्य, प्रश्न उत्तर

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  फूटा प्रभात ( कविता )  phuta prabhat poem summary,  questions answers , phuta prabhat poem ke poet Bharat Bhushan Agarwal, फूटा प्रभात कविता का सप्रसंग व्याख्या  फूटा प्रभात कवि भारत भूषण अग्रवाल की प्रकृति चित्रण संबंधित रचना है। इस कविता में कवि ने सुबह सवेरे के प्राकृतिक सुषमा का सुंदर चित्रण किया है। यहां कविता , व्याख्या और प्रश्न उत्तर दिया गया है। फूटा प्रभात, फूटा विहान  बह चले रश्मि के प्राण, विहग के गान, मधुर निर्झर के स्वर  झर - झर , झर - झर। प्राची का अरुणाभ क्षितिज, मानो अंबर की सरसी में  फूला कोई रक्तिम गुलाब, रक्तिम सरसिज। धीरे-धीरे, लो, फैल चली आलोक रेख  घुल गया तिमिर, बह गयी निशा, चहुं ओर देख , धुल रही विभा, विमलाभ कांति। अब दिशा - दिशा  सस्मित  विस्मित खुल गये द्वार , हंस रही उषा। क्रोध पर नियंत्रण कैसे करें।  क्लिक करें और पढ़ें  खुल गये द्वार, दृग खुले कंठ  खुल गये मुकुल  शतदल के शीतल कोषों से निकला मधुकर गुंजार लिये खुल गये बंध, छवि के बंधन। जागी जगती के सुप्त बाल! पलकों की पंखुड़ियां खोलो, खोलो...

नदी का रास्ता कविता का भावार्थ,( 2026-27)शब्दार्थ और प्रश्न उत्तर,नदी को रास्ता किसने दिखाया,Nadi ka rasta poem, explain,poet Balkrishan rao

  नदी का रास्ता कविता का भावार्थ, शब्दार्थ और प्रश्न उत्तर,नदी को रास्ता किसने दिखाया,Nadi ka rasta poem, explain,poet Balkrishan rao 2026-27 विषय सूची Question answer  नदी का रास्ता कविता नदी का रास्ता कविता का शब्दार्थ नदी का रास्ता कविता का भावार्थ नदी का रास्ता कविता का प्रश्न उत्तर Nadi ka rasta poem question answer, poem explanation 2026  -27 exam special poem question answer  Nadi ka rasta poem, नदी का रास्ता कविता, कवि बाल कृष्ण राव नदी को रास्ता किसने दिखाया  सिखाया था उसे किसने कि अपने भावना के वेग को उन्मुक्त बहने दे, कि वह अपने लिए खुद खोज लेगी सिंधु की गंभीरता स्वच्छंद बहकर ? इसे हम सुनते आए युगों से, और सुनते ही युगों से आ रहे उत्तर नदी का -- मुझे कोई कभी आया नहीं था राह दिखलाने, बनाया मार्ग मैंने आप ही अपना  । ढकेला था शिलाओं को, गिरी निर्भीकता से मैं कई ऊंची प्रपातों से, वनों से कंदराओं में भटकती भूलती मैं फूलती उत्साह से प्रत्येक बाधा विघ्न को ठोकर लगाकर ठेलकर बढ़ती गई आगे निरंतर एक तट को दूसरे से दूरतर करती। बढ़ी सम्पन्नता के साथ और अपने द...