रामचन्द्र और शेरू कुत्ता की कहानी
रामचन्द्र और शेरू कुत्ता की कहानी
एक छोटे से और शांत गाँव में रामचन्द्र नाम के एक सीधे-सादे और बुजुर्ग व्यक्ति रहते थे। रामचन्द्र जी अकेले ही अपना जीवन बिता रहे थे, क्योंकि समय के चक्र ने उनके परिवार को उनसे दूर कर दिया था। उनका घर गाँव के छोर पर था, जहाँ सुबह की धूप बहुत प्यारी लगती थी और शाम को खेतों की हवा सुकून देती थी।
एक सर्द और ठिठुरती हुई शाम की बात है। रामचन्द्र जी जब अपने घर लौट रहे थे, तो उन्हें दरवाज़े के पास एक कोने में किसी के कांपने की आवाज़ सुनाई दी। उन्होंने पास जाकर देखा, तो वहाँ कुछ हफ़्तों का एक बहुत ही छोटा और कमज़ोर पिल्ला दुबक कर बैठा हुआ था। ठंड से उसकी हालत बहुत खराब थी।
रामचन्द्र जी का दिल पसीज गया। उन्होंने बिना एक पल भी सोचे उसे उठाया, अपने आंचल या चादर में छिपाकर घर के अंदर ले आए। उन्होंने चूल्हे के पास थोड़ी आग जलाकर उसे गर्माहट दी और कटोरी में थोड़ा गुनगुना दूध पिलाया। कुछ ही दिनों की देखभाल से वह पिल्ला चंगा हो गया और उछल-कूद करने लगा।
रामचन्द्र जी ने उसका नाम 'शेरू' रखा। नाम भले ही 'शेरू' था, लेकिन वह बेहद प्यारा और वफादार था।
अनूठा बंधन
समय बीतता गया। शेरू अब एक तगड़ा और समझदार कुत्ता बन चुका था। वह रामचन्द्र जी की हर बात को ऐसे समझता था जैसे कोई इंसान समझता हो।
- सुबह की शुरुआत: रोज़ सुबह सूरज निकलने से पहले जब रामचन्द्र जी अपनी लाठी लेकर टहलने निकलते, तो शेरू हमेशा उनके आगे-आगे चलता, जैसे कोई पहरेदार रास्ता साफ़ कर रहा हो।
- खेतों का साथी: दिनभर रामचन्द्र जी अपने छोटे से खेत में काम करते, और शेरू पेड़ की छाया में बैठकर या खेत की रखवाली करते हुए पहरा देता रहता।
गाँव के लोग कहते थे, "रामचन्द्र का बेटा भले ही शहर में रहता हो, लेकिन असली बेटा तो यह शेरू ही है जो हर पल साये की तरह साथ रहता है।" रामचन्द्र जी भी शेरू को अपने बच्चे की तरह प्यार करते थे और अपनी थाली में से एक हिस्सा उसके लिए ज़रूर निकालते थे।
परीक्षा की घड़ी
एक बार बरसात के दिनों में भयंकर बाढ़ आ गई। लगातार तीन दिनों तक मूसलाधार बारिश होती रही। गाँव के पास की छोटी नदी उफान पर थी और पानी लोगों के घरों तक पहुँचने लगा था।
आधी रात का समय था। चारों तरफ़ सन्नाटा और भयानक अंधकार था। अचानक शेरू जोर-जोर से भौंकने लगा और रामचन्द्र जी के बिस्तर के पास आकर उनके पैर खींचने और चाटने लगा।
रामचन्द्र जी की आँख खुली। उन्होंने देखा कि घर के आँगन तक पानी भर चुका था और बाहर पानी का बहाव बहुत तेज था। शेरू लगातार दरवाजा खटखटा रहा था और उन्हें सुरक्षित ऊंचे स्थान पर चलने का इशारा कर रहा था।
रामचन्द्र जी समझ गए कि खतरा बहुत बड़ा है। उन्होंने अपनी जरूरी पोटली उठाई और शेरू के पीछे-पीछे गाँव के ऊंचे टीले की तरफ़ भागे। शेरू बार-बार पीछे मुड़कर देखता था कि रामचन्द्र जी ठीक से आ रहे हैं या नहीं। उस रात शेरू की समझदारी और वफादारी ने रामचन्द्र जी की जान बचा ली।
सीख
जब बाढ़ का पानी उतरा और जनजीवन सामान्य हुआ, तो रामचन्द्र जी ने शेरू को गले से लगा लिया और उसकी पीठ थपथपाई। उनकी आँखों में खुशी के आँसू थे।
यह कहानी हमें सिखाती है कि बेजुबान जानवर भी प्यार, अपनापन और वफादारी की भाषा बहुत अच्छी तरह समझते हैं। यदि हम उन्हें थोड़ा सा स्नेह दें, तो वे जरूरत पड़ने पर अपनी जान की बाजी लगाकर भी हमारे प्रति वफादारी निभाते हैं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें