गलता लोहा ( Galta Loha) 11th hindi Shekhar Joshi


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गलता लोहा कहानी

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गलता लोहा कहानी का सारांश, गलता लोहा कहानी का प्रश्न उत्तर, आरोह भाग 1, 


 "गलता लोहा" शेखर जोशी द्वारा लिखित एक ऐसी कहानी है जिसमें आधुनिक जीवन के यथार्थ का मार्मिक चित्रण है। यहाँ लेखक ने जातीय अभिमान को पिघलते और उसे रचनात्मक कार्य में ढलते दिखाया है। यहाँ कहानी के सारांश के साथ-साथ परीक्षा के लिए उपयोगी प्रश्न के उत्तर दिए गए हैं।


कहानी का सारांश, 

 Summary of galta Loha, 

गलता लोहा कहानी का सारांश


वंशीधर अपने गांव में पुरोहित का काम करते करते बूढ़े हो गए थे। अब उनसे व्रत उपवास नहीं हो पा रहे थे। लेकिन घर चलाने का यही एक साधन था। एक दिन उन्होंने अपने बेटे मोहन को सुनाते हुए कहा, अब मैं चंद दत्त के यहाँ रुद्रपाठ करने नहीं जा रहा हूँ। पुत्र मोहन उनकी बात का मतलब को समझ गया। उसने बिना कुछ कहे अपने पिता का भार हल्का करने के लिए खेती करने का मन बनाकर हंसुआ का धार तेज बनाने धनराम लोहार के साथ चला गया। उसका मन दुखी था। कुछ काम करना चाहता था। कुछ नहीं तो खेती ही करना चाहता था। लेकिन उसके पिछले जीवन की कहानी बड़ी मार्मिक है।

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धनराम मोहन का सहपाठी था। मोहन एक खाली कनस्तर पर बैठ कर धनराम का काम देखने लगा। दोनों अपने स्कूल के मास्टर त्रिलोक सिंह की यादें ताजा करने लगे। कैसे शिक्षक त्रिलोक सिंह मोहन की प्रशंसा करते हैं, उसे ही मौनीटर बनाते हैं और दूसरे लड़के को दंड दिलवाते थे। मोहन के सुनहरे भविष्य की बातें करते थे। धनराम का गणित में कमजोर होना, मास्टर जी से डंडे से पिटने की सारी बातें याद कर हंसने लगे।

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धनराम को तेरह का पहाड़ा याद नहीं था। खूब मार खाने पर भी नहीं सीखा था। तब एक दिन मास्टर जी ने कहा, - तुम्हारे दिमाग में लोहा भरा है, उसमें विद्या के लिए कोई जगह नहीं है। तब  से वह पढ़ाई छोड़कर अपने पिता के साथ धौंकनी चलाने लगा। सान् का काम करते हुए अच्छा कारीगर बन गया।

अब मोहन के संघर्षमय जीवन की कथा सुनिए। प्राइमरी स्कूल पास कर वह आगे की पढ़ाई के लिए अपने गांव से चार मील दूर के स्कूल में जाने लगा। रास्ता में एक नदी थी। मोहन प्रतिदिन स्कूल जाता है। एक दिन वापसी के समय नदी का पानी बढ़ गया। कुछ घसियारे उसे लेकर घर ले आए। इस घटना ने उसके पिता जी को डरा दिया। मोहन का स्कूल जाना रूक गया।

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उन्हीं दिनों रमेश नामक एक युवक लखनऊ से गांव आया था। मोहन के पिता ने मोहन की पढ़ाई के बारे में चिंता प्रकट की। उन्होंने कहा, मोहन को मेरे पास लखनऊ भेज दें , आराम से हमारे साथ रह लेगा, और उसकी पढ़ाई भी ठीक हो जाएगी।

अब मोहन रमेश के साथ लखनऊ आ गया। वहाँ वह सहमा सहमा सा रहने लगा। बहुत कहने पर एक स्कूल में नाम दर्ज करा दिया। रमेश और उसके परिवार के लोग उससे नौकर जैसे व्यवहार करते थे। मोहन अपनी वास्तविक स्थिति किसी से नहीं कहता। आठवीं पास करने के बाद उसने मोहन को तकनीक स्कूल में नाम लिखा दिया। फिर नौकरी की तलाश में मोहन फैक्ट्रीज फैक्ट्रीज भटकने लगा, पर नौकरी नहीं मिली। इधर बंशीधर हर किसी को यह बताता है कि मोहन एक दिन अफसर बनकर लौटेगा।

मोहन और धनराम बचपन की बातों में खो गए। वह धनराम की कारीगरी देखने लगा। वह एक लोहे को मोड़कर गोला बना रहा था लेकिन लोहा ठीक से मूड नहीं रहा था यह देखते हुए मोहन अपनी जगह से उठा उसने कुशलतापूर्वक लोहे को स्थिर किया और नपी तुली चोटों से छड को पीटते पीटते गोला बना दिया। मोहन ने यह काम इतनी कुशलता से किया कि धनराम उसकी इस कुशलता को आश्चर्य से देखता रह गया है। एक ब्रह्मण का लड़का कारीगरी में इतना कुशल। धनराम को आश्चर्य हुआ कि ब्राह्मण के लड़के ने लोहार का काम करना कैसे स्वीकार कर लिया और मोहन इन सब बातों से बेलाग होकर लोहे के छल्ले की गोलाई को जांच रहा था। उसकी आंखों में सृजन की चमक और प्रशंसा पाने का भाव था।


 गलता लोहा पाठ का प्रश्नोत्तर questions answers path galta Loha

1.धनराम मोहन को अपना प्रतिद्वंद्वी क्यों नहीं मानता था? 

उत्तर - धनराम स्वयं को नीची और मोहन को उच्च जाति का मानता था। दूसरा, मोहन उससे पढ़ने में बहुत तेज था। मास्टर त्रिलोक सिंह मोहन को मौनीटर बनाते थे। तीसरे, लोग समझते हैं कि मोहन पढ़ा-लिखा कर एक दिन बड़ा आदमी बनेगा। ये सभी बातें धनराज मोहन से प्रतिस्पर्धा नहीं करती थीं।

2 धनराम को मोहन के किस बात पर आश्चर्य होता है और क्यों ?

उत्तर - धनराम को मोहन के हथौड़ा चलाने और लोहे को गोल करने की कला पर आश्चर्य हुआ। मोहन के पास एक दम से अभिमान नहीं था। वह ब्रह्मण का लड़का था फिर भी लोहार का काम करने में नाकाम नहीं था। धनराम को इसी बात पर आश्चर्य हुआ कि ब्रह्मण होने साथ-साथ भी वह लोहे का काम सहज भाव से कर रहा था।

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3. कहानी के उस प्रसंग का उल्लेख करें जिसमें किताबों की विद्या और घन चलाने की विद्या का जिक्र आया है।

उत्तर -- धन राम लोहार पिता का बालक था। उसके दिमाग में गणित नहीं बैठता था। मास्टर त्रिलोक सिंह उसे 13 का पहाड़ा याद कराते कराते थक गए और नहीं याद करने पर संटी से पीटते थे। धन राम के पिता गंगाराम उसे लोहार का काम सिखा रहे थे। शान चढ़ाना भोकना हथौरा चलाना जैसे काम उसके पिता सिखा रहे थे। इस तरह धनाराम एक साथ दो दो विद्याएं सीख रहा था , पढ़ाई की विद्या और लोहार काम की विद्या।


4. मोहन के लखनऊ आने के बाद के समय को लेखक ने उसके जीवन का एक नया अध्याय क्यों कहा है?

उत्तर -- लखनऊ आने के बाद मोहन के जीवन में परिवर्तन आ गया। यहां उसे अपने घर से दूर रहना था। गांव में रहने पर उसकी शिक्षा के दरवाजे बंद थे लेकिन यहां आने पर उसके सारे रास्ते खुले थे। उसे पढ़ने का अवसर भी मिला, लेकिन उसे नौकरों की तरह रहने के लिए विवश होना पड़ा। चाहे यह अध्याय सुखद नहीं था लेकिन था तो नया।


5. गांव और शहर दोनों जगहों पर चलने वाले मोहन के जीवन संघर्ष में क्या फर्क है?

उत्तर - मोहन के जीवन में संघर्ष ही संघर्ष  था । गांव के जीवन में उसे गरीबी साधन हीनता, बाधाएं मिलती गई। पढ़ाई के लिए उसे रोज 2 मील पैदल चलना पड़ता था और नदी भी पार करना पड़ता था। शहर में आकर यह बाधाएं तो दूर हो गई लेकिन उसका रूप बदल गया। संघर्ष और कड़े हो गए। उसे दिन भर नौकरों की तरह काम करना पड़ता था। रमेश बाबू के घरवालों की हर बात माननी पड़ती थी। जिस पढ़ाई के लिए वह शहर आया था वह छूट गया।


6. एक अध्यापक के रूप में मास्टर त्रिलोक सिंह का व्यक्तित्व कैसा था?

उत्तर - मास्टर त्रिलोक सिंह एक परंपरावादी अध्यापक हैं। बच्चों को मारपीट कर पढ़ाने में विश्वास रखते हैं। बच्चों को डांटना पीटना जैसे उनके अधिकार हो। धनाराम पर वे यह सब कुछ आजमाते हैं।

मास्टर जी के मन में जातिगत ऊंच-नीच का भाव भी भरा हुआ है इसलिए वह मोहन को प्रेम करते हैं और धन राम को तिरस्कार देते हैं हालांकि त्रिलोक सिंह एक कर्तव्यनिष्ठ अध्यापक हैं जो अपने शिक्षा कर्म में गहरा विश्वास रखते हैं।

7. मोहन ने पुरोहित का धंधा क्यों नहीं अपनाया?

उत्तर - इस कहानी में मोहन ने पुरोहित के प्रति कोई इच्छा या अनिच्छा प्रकट नहीं किया है लेकिन लगता है कि उसे इस धंधे में कोई रुचि नहीं है। वह जानता था की इस धंधे से उसका गुजारा नहीं होने वाला है।

8. त्रिलोक सिंह के किस कथन को लेखक ने ज़बान के चाबुक के रूप में कहा है। और क्यों?

उत्तर - मास्टर त्रिलोक सिंह ने धनराम को कहा, - तेरा दिमाग में लोहा भरा है रे! विद्या का ताप कहाँ होगा।

लेखक ने इस बात को जुबान का चाबुक कहा है क्योंकि ऐसी बातें मन को अधिक घायल करतीं हैं।लेखक परिचय=

डॉ उमेश कुमार सिंह हिन्दी में पी-एच.डी हैं और आजकल धनबाद , झारखण्ड में रहकर विभिन्न कक्षाओं के छात्र छात्राओं को मार्गदर्शन करते हैं। You tube channel educational dr Umesh 277, face book, Instagram, khabri app पर भी follow कर मार्गदर्शन ले सकते हैं।


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