Udbodhan, Bhart - Bharti उद्बोधन कविता, मैथिली शरण गुप्त
उद्बोधन कविता , मैथिली शरण गुप्त, भारत भारती कक्षा सात संसार की समर स्थली में धीरता धारण करो, कविता, भावार्थ, कविता का मूल भाव, शब्दार्थ, प्रश्न उत्तर, काव्य सौंदर्य, अलंकार, भाषा, प्रेरणा, संदेश, sansar ki samar asthli me dhirata Dharan kro,poet Maithili Sharan Gupt, Rashatra Kavi, samari, akankar. उद्बोधन कविता udbodhan poem संसार की समर स्थली में धीरता धारण करो, संसार की समर स्थली में धीरता धारण करो चलते हुए निज इष्ट पथ में संकटों से मत डरो जीते हुए भी मृतक सम रहकर न केवल दिन भरो, वर वीर बनकर आप अपनी विघ्न - बाधाएं हरो।। बैठे हुए हो व्यर्थ क्यों ? आगे बढ़ो , ऊंचे चढो, है भाग्य की क्या भावना ? अब पाठ पौरूष का पढ़ो। हैं सामने का ग्रास भी मुख में स्वयं जाता नहीं, हा ! ध्यान उद्यम का तुम्हें तो कभी भी आता नहीं।। रखो परस्पर मेल मन से छोड़कर अविवेकता मन का मिलन ही मिलन है , होती उसी से एकता। तन मात्र के ही मेल से मन भला मिलता कहीं, है बाह्य बातों से कभी अंतः करण खिलता नहीं।। जड़ दीप तो देकर हमें आलोक जलता आप है पर एक हममें दूसरे को दे रहा संताप है। क्या हम जड़ों से भी जगत...