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मृतिका कविता, भावार्थ, प्रश्न उत्तर, शब्दार्थ, कवि नरेश मेहता,miritika, question answer,summary

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लोहे का स्वाद कविता            मृतिका कविता  Naresh mehta  मृतिका कविता, भावार्थ, प्रश्न उत्तर, शब्दार्थ, कवि नरेश मेहता,miritika, summary , explanation answers  मृतिका कविता, मृतिका कविता का भावार्थ, मृतिका का अर्थ, मृतिका कब अंतरंग प्रिया बन जाती है ? मृतिका कब मातृरूपा बन जाती है। मैं तो मात्र मृतिका हूं, ऐसा कहने का क्या तात्पर्य है ? नरेश मेहता की कविता मृतिका। Miritika poem, miritika poem summary, miritika meaning, miritika question answer, naresh Mehta poem. मृतिका कविता नरेश मेहता रचित प्रसिद्ध कविता है जिसमें कवि ने मनुष्य के पुरुषार्थ के महत्व को बताने का सफ़ल प्रयास किया है। मृतिका का अर्थ मिट्टी है। मिट्टी स्वयं में कुछ नहीं है, वह मनुष्य के मेहनत से तरह तरह का रूप प्राप्त करती है। यहां मृतिका कविता, भावार्थ, शब्दार्थ और प्रश्न उत्तर देखा जा सकता है। मैं तो मात्र मृतिका हूं-- जब तुमने  मुझे पैरों से रौंदते हो तथा हल के फाल से विदीर्ण करते हो तब मैं-- धन धान्य बनकर मातृरूपा  हो जाती हूं। जब तुम  मुझे हाथों से स्पर्श ...

वन की शोभा, कवि गोपाल सिंह नेपाली wan ki shobha, poem, poet Gopal Singh Nepali

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 वन की शोभा, कवि गोपाल सिंह नेपाली wan ki shobha, poem, poet Gopal Singh Nepali 'वन की शोभा' कविवर गोपाल सिंह नेपाली द्वारा रचित एक सुंदर कविता है जिसमें वन कानन का मनोहारी चित्र उपस्थित किया गया है। यह कविता चौथी कक्षा में पढ़ाई जाती है। यहां कविता, भावार्थ एवं व्याख्या दी गई है जो छात्रों के लिए लाभ दायक है। उस विशाल विस्तृत कानन में रम्य अनेकों वन थे, हरे - भरे तरूवर जिनमें उस कानन के धन थे। रच रच नीड़ बसाकर दुनिया खग आनंद मगन थे, थे निर्झर , थी सर - सरिताएं , फल थे , सरस सुमन थे।। इस कानन के मध्य भाग में सुन्दर पल्लव वन था, कानन भर में यही एक ही पल्लव का उपवन था। तरह तरह के पल्लव थे, अति कोमल जिनका तन था, छन छन उड़कर जिनपर जाकर चिपका रहता मन था।। चारों ओर घिरा था वह वन - सरिताओं के जल से, होता था मुखरित सारा वन जल के मृदु कल-कल से। फूट पड़ी है अमृत धारा मीठी पृथ्वी तल से, ऐसा सोच वहां आते थे, पंछी तरूवर दल से।। जगह जगह थे झील सरोवर जिनमें निर्मल जल था, जहां नहाता , पानी पीता वन का पंछी दल था। क्यारी क्यारी में वैसे तो लगा न जल का नल था, फिर भी क्या जाने क्यों उनमें जल बहता ...

कर्ण की पीड़ा bhawarth , question answer Karn ki pida

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        कर्ण की पीड़ा , कविता, रश्मि रथी, रामधारी सिंह दिनकर         Karn ki pida रश्मि रथी नामक पुस्तक कविवर राम धारी सिंह दिनकर द्वारा रचित प्रसिद्ध पुस्तक है। यहां रश्मि रथी शूरवीर, दानवीर कर्ण को कहा गया है। कर्ण शूरवीर योद्धा थे फिर भी दुर्भाग्य उनका जीवन संगिनी थी। यहां रश्मि रथी पुस्तक का अंश दिया गया, जहां। कर्ण के बारे में बताया गया है कि वह महावीर था।  हाय कर्ण तू क्यों जन्मा था? जन्मा तो क्यों वीर हुआ ? कवच और कुंडल भूषित भी तेरा अधम शरीर हुआ। धंस जाय वह देश अतल में गुण की जहां नहीं पहचान, जाति गोत्र के बल से ही आदर पाते हैं, जहां सुजान।। नहीं पूछता है कोई तुम व्रती, वीर या दानी हो ? सभी पूछते मात्र यही तुम किस कुल के अभिमानी हो ? मगर , मनुज क्या करें? जन्म लेना तो उसके हाथ नहीं। चुनना जाति और कुल, अपने वश की तो बात नहीं।। मैं कहता हूं, अगर विधाता नर को मुट्ठी में भर कर। कहीं छिट दे ब्रह्म लोक से ही नीचे भू-मंडल पर। तो भी विविध जातियों में ही मनुज यहां आ सकता है। नीचे है क्यारियां बनी तो बीज कहां जा सकता है ? अवश्य पढ़ें क्लिक...