भल हर, भल हरि, भल तुअ कला। खन पीत वसन खनहि बघ छला।।”
“भल हर, भल हरि, भल तुअ कला। खन पीत वसन खनहि बघ छला।।” यह विद्यापति के पद की पंक्तियाँ हैं और यहाँ कवि ईश्वर के हरि और हर (शिव) दोनों रूपों की अद्भुत एकता तथा उनके रूप-परिवर्तन की लीला का वर्णन कर रहे हैं। संदर्भ एवं प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश प्रसिद्ध मैथिली कवि विद्यापति के पद से लिया गया है। विद्यापति मैथिली भाषा के प्रमुख कवियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध कवि माने जाते हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में ईश्वर के प्रति गहरी भक्ति, प्रेम और समर्पण की भावना व्यक्त की है। प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ईश्वर की अद्भुत शक्ति और उनकी विभिन्न रूपों में प्रकट होने की क्षमता से प्रभावित होकर उनकी प्रशंसा करता है। यहाँ हर और हरि अर्थात् शिव और विष्णु के रूपों की एकता का भाव अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त हुआ है। व्याख्या कवि कहता है कि हे प्रभु! आप हर के रूप में भी सुंदर हैं और हरि के रूप में भी सुंदर हैं। आपकी कला और आपकी लीला वास्तव में अद्भुत है। आप अपनी इच्छा के अनुसार अलग-अलग रूप धारण कर लेते हैं। आपके स्वरूप में ऐसी अद्भुत शक्ति है कि एक क्षण में आप शिव दिखाई देते हैं औ...