भल हर, भल हरि, भल तुअ कला। खन पीत वसन खनहि बघ छला।।”
“भल हर, भल हरि, भल तुअ कला।
खन पीत वसन खनहि बघ छला।।”
यह विद्यापति के पद की पंक्तियाँ हैं और यहाँ कवि ईश्वर के हरि और हर (शिव) दोनों रूपों की अद्भुत एकता तथा उनके रूप-परिवर्तन की लीला का वर्णन कर रहे हैं।
संदर्भ एवं प्रसंग
प्रस्तुत पद्यांश प्रसिद्ध मैथिली कवि विद्यापति के पद से लिया गया है। विद्यापति मैथिली भाषा के प्रमुख कवियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध कवि माने जाते हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में ईश्वर के प्रति गहरी भक्ति, प्रेम और समर्पण की भावना व्यक्त की है। प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ईश्वर की अद्भुत शक्ति और उनकी विभिन्न रूपों में प्रकट होने की क्षमता से प्रभावित होकर उनकी प्रशंसा करता है। यहाँ हर और हरि अर्थात् शिव और विष्णु के रूपों की एकता का भाव अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त हुआ है।
व्याख्या
कवि कहता है कि हे प्रभु! आप हर के रूप में भी सुंदर हैं और हरि के रूप में भी सुंदर हैं। आपकी कला और आपकी लीला वास्तव में अद्भुत है। आप अपनी इच्छा के अनुसार अलग-अलग रूप धारण कर लेते हैं। आपके स्वरूप में ऐसी अद्भुत शक्ति है कि एक क्षण में आप शिव दिखाई देते हैं और दूसरे क्षण में विष्णु के रूप में दिखाई देने लगते हैं।
“खन पीत वसन” का अर्थ है कि कभी आप पीले वस्त्र, अर्थात् पितांबर धारण कर लेते हैं। पितांबर भगवान विष्णु के स्वरूप की विशेष पहचान है। इसके विपरीत “खनहि बघ छला” में बाघ की खाल से बने वस्त्र, अर्थात् बाघाम्बर, का संकेत है, जो भगवान शिव के स्वरूप से जुड़ा हुआ है। इस प्रकार कवि बताता है कि ईश्वर कभी विष्णु के रूप में पितांबर धारण करते हैं और तुरंत ही शिव के रूप में बाघाम्बर धारण कर लेते हैं।
इन पंक्तियों का मुख्य भाव यह है कि शिव और विष्णु में मूलतः कोई भेद नहीं है। दोनों एक ही परम सत्ता के अलग-अलग रूप हैं। मनुष्य अपनी सीमित दृष्टि के कारण ईश्वर को अलग-अलग नाम और रूपों में देखता है, लेकिन परमात्मा एक ही है। कभी वह शिव के रूप में दिखाई देता है तो कभी विष्णु के रूप में। उसके लिए किसी एक रूप में बँध जाना आवश्यक नहीं है।
कवि ईश्वर की इसी रूप-परिवर्तन की अद्भुत शक्ति पर मुग्ध है। “भल हर, भल हरि” में वह दोनों रूपों को समान रूप से सुंदर और श्रेष्ठ मानता है। इसमें धार्मिक समन्वय और व्यापक भक्ति-भावना दिखाई देती है। कवि किसी एक देवता को दूसरे से श्रेष्ठ नहीं बताता, बल्कि दोनों को एक ही परम तत्व के रूप मानकर उनकी समान रूप से प्रशंसा करता है।
भावार्थ
हे प्रभु! आप शिव के रूप में भी सुंदर हैं और विष्णु के रूप में भी। आपकी लीला अत्यंत अद्भुत है। कभी आप विष्णु का रूप धारण करके पीले वस्त्र पहन लेते हैं और कभी तत्काल शिव का रूप धारण करके बाघ की खाल पहन लेते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि शिव और विष्णु दोनों एक ही परमात्मा के अलग-अलग स्वरूप हैं।
काव्य-सौंदर्य
इन पंक्तियों की भाषा सरल, मधुर और प्रभावशाली मैथिली है। “भल हर, भल हरि” में पुनरुक्ति के माध्यम से कवि ने दोनों रूपों के प्रति समान श्रद्धा व्यक्त की है। “पीत वसन” विष्णु के स्वरूप का तथा “बघ छला” शिव के स्वरूप का प्रतीक है। दोनों के बाहरी प्रतीकों के माध्यम से कवि ने हरि-हर की अभिन्नता को अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है।
निष्कर्ष
इस प्रकार विद्यापति ने इन पंक्तियों में ईश्वर की सर्वरूपता और शिव-विष्णु की एकता का सुंदर संदेश दिया है। कवि के लिए हर और हरि अलग-अलग नहीं, बल्कि उसी एक परम सत्ता के दो रूप हैं। यही इस पद का प्रमुख आध्यात्मिक और समन्वयवादी संदेश है।
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