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मार्च, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

रिश्ता, कहानी,चित्रा मुद्गल, Rista story'

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 रिश्ता कहानी का सारांश रिश्ता कहानी का मुख्य पात्र कौन है? रिश्ता कहानी की लेखिका कौन है ? रिश्ता, कहानी,चित्रा मुद्गल, Rista story' रिश्ता कहानी चित्रा मुद्गल द्वारा रचित एक ऐसी लघु कथा है जिसमें मरथा नामक एक नर्स की करूणामयी भाव और कर्तव्यों का हृदय स्पर्शी वर्णन है । दो बैलों की कथा       (क्लिक करें और पढ़ें) अशोक  खंडाला घाट की चढ़ाई पार करते समय दुर्घटना ग्रस्त हो गया था। पूरे बाइस दिनों तक वह कोमा में रहा था। जब उसे होश आया तो उसके सामने थी उसका उपचार करने वाली सिस्टम मारथा मम्मी। मारथा अस्पताल में सिस्टम थी। उसी की देखभाल और तपस्या ने उसे बचाया था। चार महीने बाद जब वह अस्पताल से डिस्चार्ज हुआ तब वह मरथा मम्मी से लिपट लिपट कर खूब रोया था। मरथा ने भी खूब हाथ हिला हिला कर उसे विदाई दी थी। जग जीवन में जो चिर महान  (क्लिक करें और पढ़ें) हम असत्य से बचें, सत्य पर च लें धोबी का कुत्ता, न घर का न घाट का (क्लिक करें और पढ़ें) आज बहुत अरसे बाद वह अस्पताल पहुंचा तो देखा कि मारथा मम्मी किसी मरीज की नाडी देख रही है। वह खुशी से पागल हो उठा और मारथा को बाजूओं में उठा लिया। मारथा मम्मी न

आत्मपरिचय Aatam parichay कवि हरिवंश राय बच्चन, 12वीं हिंदी

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  आत्मपरिचय ( Aatam parichay) कविता , कवि हरिवंश राय बच्चन -------------------------#--------------------------#------------------- आत्मपरिचय कविता का सारांश आत्मपरिचय कविता आत्मपरिचय कविता का शब्दार्थ आत्मपरिचय कविता की व्याख्या आत्मपरिचय कविता के प्रश्नोतर ************************************ आत्मपरिचय कविता के कवि हरिवंश राय बच्चन का जीवन परिचय हालावाद के प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन का जन्म इलाहाबाद में 1907 ई और मृत्यु  मुम्बई में 2003 ई में हुई थी। इनकी प्रमुख रचनाएं हैं -  मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश, निशा निमंत्रण, एकान्त संगीत,मिलनयामिनी, सतरंगिनी, आरती और अंगारे आदि। 1942 से 1952 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, आकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों से संबंधित, विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ रहे। व्यक्तिगत जीवन में घटी घटनाओं की सहज अभिव्यक्ति ही  हिन्दी साहित्य जगत में इनकी लोकप्रियता का आधार है। आत्मपरिचय कविता का सारांश (summery of atamprichay poem) आत्मपरिचय कविता में कविवर बच्चन जी ने अपने प्रेम मय व्यक्तित्व का स्वयं परिचय प्रस्तुत किया  वे कहते हैं, मैं अपने जीवन

धोबी का कुत्ता, न घर का न घाट का

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 धोबी का कुत्ता, न घर का न घाट का Dhobi ka kutta na ghar ka na ghat ka, lokkokotti अर्थ और कहानी कहावत लोकोक्ति किसे कहते हैं ? Kahawat and lokkokotti  “ धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का ' सबसे पहले आप यह जान लें कि यह मुहावरा नहीं कहावत है। लोकोक्ति लोक में प्रचलित उक्ति अथवा लोक में कहीं गई बात। अब इस प्रसिद्ध कहावत का निर्माण कैसे हुआ। इसके पीछे की कहानी क्या है ? कहावत अथवा लोकोक्ति के पीछे की कहानी जान लेने से उसका अर्थ आसानी से याद रहेगा। धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का, कहानी कहानी कुछ इस प्रकार है – एक धोबी था। उसका काम था प्रतिदिन पास की नदी में जाकर कपड़े धोना। इसलिए वह रोज अपने गदहे पर गंदे कपड़ों का गट्ठर और दोपहर का भोजन लेकर नदी किनारे चल देता। उसके पास एक कुत्ता भी था। अपने यहां एक परंपरा है, भोजन करने से पहले गाय माता को और भोजन के बाद कुत्ते को खाना देने की। कुत्ते ने देखा कि उसका मालिक तो अपना भोजन लेकर नदी किनारे जा रहा है। इसलिए घर पर रहने से कोई फायदा नहीं है। जब मालिक वहां खाएगा तो हमें भी वही भोजन मिल जाएगा। धोबी नदी किनारे जाकर गदहे को घास चरने के लिए छोड़ दि

होली, Holi festival निबंध

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  1. होली का त्योहार 2. बसंत का मुुख्य त्योहार 3. मस्ती    उमंग 4. होलिका दहन 5 हिरण्यकश्यपु की कथा 6. होली के गीत         बसंत ऋतु और होली              Holi होली  बसंत के चरमोत्कर्ष का नाम होली है। इसे बसंत उत्सव अथवा मदनोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। बसंत ऋतु की मादकता जब पराकाष्ठा पर पहुंच जाती है तब रंगों का त्योहार होली आती है। चंपा , चमेली , कनेर, गुलाब, जुही, मालती, बेला, की मादक महक, आम्र-अशोक कटहल – जामुन की किसलय कोंपलों की चमक पिंक – पपीहे की पुकार आदि चरमोत्कर्ष पर पहुंच जाता है तब आनंद और अलमस्ती का त्योहार होली आती है।       होली के संबंध में कई पौराणिक कथाएं भारतीय समाज में प्रचलित है। एक कथा के अनुसार असुराधिपति सम्राट हिरण्यकशिपु अपने आप को भगवान मानता था और अपनी प्रजा को भी ऐसा ही करने को विवश करता था। परंतु उसका पुत्र प्रह्लाद श्री विष्णु भगवान का परम भक्त था। इसलिए दोनों पिता-पुत्र एक दूसरे के बैरी बन गए थे।  हिरण्यकशिपु अपने पुत्र की हरिभक्ति से तंग आकर उसे मरवाने की बड़ी कोशिशें की, लेकिन ईश्वर कृपा से वह बार-बार बच जाता था। अंत में वह प्रहलाद को मारने का जघन

पूजा में कैसा जल का उपयोग करें।

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 पूजा में कैसा जल का उपयोग करें। 1. पूजा का अर्थ 2. पूजा का समय 3. पूजा  करने का स्थान 4 पूजा का जल 5 निष्कर्ष भारत आस्था और विश्वास का देश है। ऐसी आस्था और ऐसा विश्वास की देवी देवताओं की बात और , यहां पेड़ पौधे, ईंट पत्थरों  को भी भगवान मानकर पूजा जाता है। गाय को गो माता और बैल को भगवान की सवारी मानते हैं। यहां भिन्न भिन्न प्रकार के धर्म और धर्मावलंबी रहते हैं और अपने अपने आराध्य देवी देवताओं की पूजा अर्चना करते हैं। पूजा के लिए कितने प्रकार की सामग्री की आवश्यकता होती है, उनमें पूजा का जल सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। तो आइए , पूजा का जल कैसा हो , इस पर विचार करें 1. पूजा का अर्थ  पूजा का क्या अर्थ है। पूजा को अराधना, अर्चना इबादत , वरशिप आदि कितने नाम से जाना जाता है। परन्तु सभी का मूल अर्थ है संपूर्ण भाव से समर्पण और निष्ठा। अपने आप को अपने अराध्य देव को संपूर्ण रूप से समर्पित कर देना। शास्त्रों में नौ प्रकार की भक्ति बताती गई है।।इसे नवढा भक्ति कहा जाता है। 2. पूजा का समय  आपके मन में यह प्रश्न बार बार आता होगा कि वह पूजा का उचित समय कब होना चाहिए। भाई पूजा का कोई निश्चित समय नही

बोर्ड परीक्षा में प्रथम आने पर मित्र को बधाई पत्र लिखें। Board exam

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  बोर्ड परीक्षा में प्रथम आने पर मित्र को बधाई पत्र लिखें। Board priksha me Pratham ane per mitra ko badhai Patra . उत्तर --- राजन 338 सी, भूली नगर, धनबाद। दिनांक 5.2.2021 प्रिय मित्र मनोज,        सस्नेह नमस्ते। मैं यहां सकुशल हूं और आशा करता हूं कि तुम भी कुशल से होगे। मित्र ! समाचार पत्र के माध्यम से पता चला है कि तुम बोर्ड परीक्षा में पूरे झारखंड में प्रथम आए हो। इस अभूतपूर्व सफलता के लिए बहुत बहुत बधाई।   मित्र ! इस सफलता के सच्चे हकदार तुम ही थे क्योंकि तुम ने दिन – रात एक करके पढ़ाई जो किया है। बहुत -  बहुत बधाई और शुभकामनाएं। आखिर मेहनत की ही जीत हुई। मेहनत करने वाले को भगवान भी निराश नहीं करते।  चाचा एवं चाची जी की खुशियों का तो ठिकाना नहीं होगा। यहां मां भी खूब खुश हैं। वह तुम्हारे लिए मंदिर में दीपक जलाने गई थी। पिता जी को मेरा प्रणाम और सुमन को ढेर सारा प्यार देना। अपनी परीक्षा भी जून में है, इसलिए अधिक व्यस्त रह रहा हूं। शेष अगले पत्र में। पत्रोत्तर अवश्य देना। तुम्हारा अभिन्न मित्र राजन Popular posts of this blog pradushan essay       ( क्लिक करें और पढ़ें) नेताजी  का चश्म

Ram Lakshman Parasuram Sambad

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सूरदास के पद, जीवन परिचय  राम लक्ष्मण परशुराम संवाद www.bimalhindi.in रामचरितमानस महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित एक उत्कृष्ट महाकाव्य है। इसमें श्रीराम के चरित्र का बहुत सुंदर वर्णन किया गया है। रामचरितमानस के बाद कांड में श्री राम - लक्ष्मण - परशुराम का संवाद एक प्रमुख प्रसंग है। जनकपुर में धनुष भंग होने पर परशुरामजी का आगमन होता है। परशुराम जी श्रीविष्णु के ही अवतार थे। नाथ संभू धनु भंज निहारा । होइहि केऊ एक दास तुम्हारा।। आयसु काह कहिअ किन मोहि । सुनि रिसाइ बोले मुनि कोहि।।  सेवकुसो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करनीकरि क्लिक ललाई।। सुनहु राम जेहि सिव धनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।। सो बिलगाऊ बिहाइ समाजा । न तो मारे जैहहिं सब राजा।। सुनि मुनि बचन लखन मुस्काने। बोले परशु धरहि अवमाने।। बहु धनुहि तोरी लरिकाई। कबहु न असि रिस कीनहि गोसाईं।। येहि धनु पर ममता केहि हेतु। सुनि रिसाइ कह भृगुकुल केतु।।               रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न संभाल।       धनुहि हम त्रिपुरारी धनु बिदित सकल संसार।। प्रश्न 1. परशुराम के अनुसार सेवक और शत्रु में क्या अंतर है ?  उत्तर --  सेवक वह है

1.संपादन ( sampadan) 2. संपादन का अर्थ एवं परिभाषा तथा कार्य 3.संपादन के सिद्धांत

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संपादन, sampadan  1.संपादन 2. संपादन का अर्थ एवं परिभाषा तथा कार्य 3.संपादन के सिद्धांत Sampadan kya hai, duty of sampadak, editor, edition, , definition of sampadan, sampadan ke Siddhant, fareness,aqurity, ballence, sources, journalism,media,print media. जनसंचार माध्यमों में द्वारपाल की भूमिका निभाना संपादन कहलाता है। संपादक, समाचार संपादक, सहायक संपादक एवं उप संपादक की यही जिम्मेदारी होती है। रिपोर्टर द्वारा लायी गई खबरें तथा अन्य स्रोतों से प्राप्त जानकारी को त्रुटि मुक्त करके प्रकाशन के लायक बनाने का दायित्व इन लोगों की ही होती है। 2.संपादन का अर्थ, परिभाषा एवं  संपादक के कार्य, sampadan ke tatparya, sampadan in English  संपादन ( editing ) का अर्थ है किसी सामग्री को त्रुटि मुक्त करके उसे पढ़ने लायक बनाना। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि जो भी खबरें रिपोटिंग टीम द्वारा लाई जाती है , उन्हें शुद्ध करके प्रकाशित करने का कार्य संपादन कहलाता है। जब कोई रिपोर्टर कोई समाचार लाता है तब उपसंपादक अथवा संपादक उसे ध्यान से पढ़ता है और उसमें व्याकरण, भाषा शैली, अथवा वर्तनी संबंधित जो अशुद्धिय

पांयनि नूपुर मंजु बजैं, कक्षा दसवीं, सवैया, कवि देव

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 1.कवि देव का जीवन परिचय 2.पायनि नुपूर मंजु बजैं -- सवैया कविता 3.शब्दार्थ 4. भावार्थ 5.प्रश्न उत्तर Payani nupur Manju bajai, Kavi deo, NCERT solutions, sawaiya 10th hindi solutions 1. कवि देव का जीवन परिचय हिन्दी साहित्य के रीति काल के प्रमुख कवियों में महाकवि देव का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा में सन् 1673 में हुआ था। इनका पूरा नाम देवदत्त द्विवेदी था और वे औरंगजेब के पुत्र आलमशाह के समकालीन थे। वे कुछ दिनों तक आलमशाह के दरबारी कवि भी रहे। राजा भोगीलाल के आश्रय में रहकर उन्होंने " रास विलास " पुस्तक की रचना की।  महाकवि देव अनेक राजाओं और नवाबों के विलासितापूर्ण जीवन को नजदीक से देखा था, इसलिए उनकी कविताओं में दरबारी संस्कृति का अधिक चित्रण हुआ है। उनके सबसे बड़े  आश्रयदाता राजा भोगीलाल ने उनकी कविताओं पर खुश होकर उन्हें लाखों की जायदाद दान में थी। उनका देहांत 1767 में हुआ। महाकवि देव की रचनाएं महाकवि देव की रचनाएं 52 से 72 मानी जाती हैं, जिनमें निम्नलिखित प्रमुख हैं --  रस विलास, भाव विलास, काव्य रसायन, अष्टयाम, प्रेम तरंग,सुख सागर तरं

कपट मृग, रामचरितमानस, तुलसी दास

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कपटी मृग,kapti Mrig 1.कपट मृग(श्रीराम चरित मानस ) कविता का प्रसंग 2. कपट मृग कविता 3. शब्दार्थ 4.कपट मृग कविता का भावार्थ 5.प्रश्न उत्तर राम चरित मानस के अरण्य कांड में कपटी मृग का वर्णन है। यह प्रसंग राम कथा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ है जहां से लंका के महाविनाश का बीजारोपण प्रारंभ हो जाता है। राक्षसराज रावण जगजननी माता सीता के अपहरण की योजना बनाकर अपने मामा मारीच नामक दैत्य के पास पहुंच कर अपनी योजना की सफलता के लिए उसे सोने का मृग बनकर पंचवटी में सीता जी के सामने विचरण करने को विवश कर देता है। वह ताड़का राक्षसी का पुत्र बड़ा मायावी था। कविता की भाषा अवधी और छंद चौपाई है। महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी उसी कपटी मृग का वर्णन करते हुए क्या लिखते हैं। इससे पहले कविता की चौपाई और कुछ कठिन शब्दों के अर्थ जानते हैं, साथ-साथ भावार्थ और प्रश्नोतर भी देखें। चौपाई तेहि वन निकट दशानन गयऊ। तब मारीच कपट मृग भयऊ‌।। अति विचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई।। सीता परम रुचिर मन देखा। अंग - अंग सुमनोहर बेसा।। सुनहु देव रघुवीर कृपाला। एहि मृग कर अति सुन्दर छाला।। सत्यसंध प्रभु बधि करि एहि। आनहु