इसे जगाओ (कविता,) कवि - भवानी प्रसाद मिश्र ise jagao, bhawani Prasad Mishra



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भई, सूरज
जरा इस आदमी को जगाओ !
भई, पवन
जरा इस आदमी को हिलाओ !
यह आदमी जो सोया पड़ा है,
जो सच से बेखबर
सपनों में खोया पड़ा है।

भई , पंछी
इसके कानों पर चिल्लओ ।
भई , सूरज , 
जरा इस आदमी को जगाओ।
वक़्त पर जगाओ,
नहीं तो जब बेवक्त जगेगा यह
तो जो आगे निकल गए हैं
उन्हें पाने ---
घबरा के भागेगा यह।

घबरा के भागना अलग है,
क्षिप्र गति अलग है,
क्षिप्र तो वह है
जो सही क्षण में सजग है।
सूरज, इसे जगाओ,
पवन, इसे हिलाओ,
पंछी, इसके कानों पर चिल्लाओ।

शब्दार्थ

पवन - हवा। बेखबर - अनजान। पंछी - पक्षी। जरा - कुछ, थोड़ा।
वक्त - समय। क्षिप्र - तेज, गतिशील। बेवक्त - असमय। सजग - सचेत, जगा हुआ। क्षण - पर, समय।


भावार्थ एवं व्याख्या

कवि भवानी प्रसाद मिश्र कहते हैं, सवेरा हो गया है और यह आदमी अभी तक सोया हुआ है। संसार का नियम है कि सूर्योदय से पहले सभी नींद त्याग कर अपने दैनिक जीवन के कार्य में लग जाते हैं। परन्तु, यह व्यक्ति संसार से बेखबर है और सपनों की दुनिया में खोया पड़ा है। यह स्थिति किसी भी व्यक्ति के लिए अच्छी नहीं है। हमें अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए अपना काम करते रहना चाहिए। सूर्य अपना समय कभी नहीं बदलता, तो हम क्यों अपने सोने जगने के समय में फेर बदल करें। सुबह की ठंडी हवा का आनंद लेने के लिए सभी जग गये हैं, इसलिए हे पवन , यह आदमी अपनी जिम्मेदारियों को भूलकर सपनों की दुनिया में खोया पड़ा है। इसे अपने कर्तव्य का ज्ञान नहीं है, जीवन की सच्चाई से बेखबर है,  पवन, इस बेखबर व्यक्ति को जगाओ।

   कवि आगे लिखते हैं, समय पर जगना ही सच्चे अर्थों में जगना है। यदि समय पर नहीं जगे, समय पर नहीं संभले तो दुनिया आगे निकल जाएगी और आप पीछे रह जाएंगे। इसलिए कवि कहते हैं, हे पंछी, इस सोये , सपनों में खोए व्यक्ति के कानों में ज़ोर ज़ोर से चिल्लाओ, हे सूरज, इस आदमी को वक्त पर ही जगाओ। यदि यह समय पर नहीं जगा तो जगने के बाद आगे निकल गए लोगों को पाने के लिए बहुत तेज दौड़ लगाएगा। ऐसे में इसे रास्ता भटकने अथवा गिरने का डर बना रहेगा। इसलिए समय को न खोये, अतः इसे जगाओ। क्योंकि, बीता हुआ समय कभी वापस मुड़कर नहीं देखता।

कवि भवानी प्रसाद मिश्र कहते हैं, भाई, घबराकर भागना अलग बात है और तेज़ गति से चलना अलग बात है। घबराहट में गलती पर गलती हो सकती है। आप मार्ग भूलकर गलत मार्ग पर जा सकते हैं। लेकिन सोच समझकर , लक्ष्य का निर्धारण कर तेज गति से चलना हानिकारक नहीं, बल्कि लाभकारी होता है। कवि कहते हैं कि क्षिप्र वह  है जो सजग है। तेज चल रहा है अर्थात, वह लक्ष्य पाने के लिए सजग है। इसलिए हे सूरज, हे पवन, हे पंछी इस सोये, सपनों में खोए व्यक्ति को जगाओ।

कवि भवानी प्रसाद मिश्र का परिचय

कवि भवानी प्रसाद मिश्र का जन्म मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में टिमरिया नामक गांव में हुआ था। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण तीन वर्ष तक जेल में बंद रहे।  महात्मा गांधी से ये बहुत प्रभावित थे। गीत फरोश, शतदल, बुनी हुई रस्सी, त्रिकाल संध्या आदि इनकी प्रमुख रचनाएं हैं। 
 साहित्य अकादमी, पद्म श्री, गालिब पुरस्कार आदि से इन्हें सम्मानित किया गया है। 1985 में इनका निधन हो गया।

प्रश्न उत्तर

* कवि ने मनुष्य को जगाने का अनुरोध किस किस से किया है ?
उत्तर - कवि सूरज से, पंछी से और पवन से मनुष्य को जगाने का अनुरोध किया है। ये सब समय से जगकर अपना काम करते हैं।

* आदमी सच से बेखबर कब हो जाता है ?
उत्तर - जब आदमी झूठे सपने में खो जाता है, सच से बेखबर हो जाता है। संसार की सच्चाई और अपनी जिम्मेदारी से बेखबर होकर कल्पनाओं के झूठे महल बनाने वाले लोग जीवन की सच्चाई से बेखबर हो जाते हैं।

* कवि पंछी को किसके कानों में चिल्लाने को कहता है और क्यों ?
उत्तर - कवि पंछी से कहते हैं कि सोये हुए और सपनों में खोए हुए व्यक्ति के कान में चिल्लाओ और उसे जगाओं। पंछी की आवाज सुनकर सभी जग गये, परन्तु यदि यह सोया व्यक्ति नहीं जगा तो बहुत पीछे हो जाएगा। फिर बेवक्त जगेगा और घबराकर भागेगा।

* जब आदमी बेवक्त जगेगा तो क्या करेगा?
उत्तर - जब आदमी बेवक्त जगेगा तो आगे निकल गए लोगों को पाने के लिए घबराकर भागेगा। ऐसे में उसे ठोकर खाकर गिरने और रास्ता भटकने का डर बना रहेगा।

* घबराकर भागना और क्षिप्र गति दोनों में अन्तर बताओं।
उत्तर - घबराकर भागने से गिरने और मार्ग भटकने का डर बना रहता है। घबराया हुआ व्यक्ति लक्ष्य हीन भागता है, जबकि क्षिप्र चलने वाले सजग होकर अपने लक्ष्य की ओर चलते हैं। क्षिप्र चलने वाले वक्त के प्रति सजग होते हैं।

* कवि ने क्षिप्र किसे माना है और क्यों ?
उत्तर - जो सजग है और सही समय पर सजग है वही क्षिप्र है। जो लक्ष्य के प्रति जागरूक है, वही क्षिप्र है। क्योंकि क्षिप्र कभी भटकते नहीं है।

* कविता का मूल भाव क्या है ?
उत्तर - कविता का मूल भाव समय का पालन करना है। हमें अपने दायित्वों का समय से पालन करना चाहिए। समय बीत जाने पर कुछ भी नहीं मिलता। इसलिए हमें सूरज की तरह समय का पालन करना चाहिए। 

भाव स्पष्ट करें

यह आदमी जो सोया पड़ा है,
जो सच से बेखबर
सपनों में खोया पड़ा है।

भाव --  दिन - दुनिया और आसपास की परिस्थितियों से बेखबर रहना नाइंसाफी है। हमें समय के अनुसार चलना चाहिए। हमें दीवा स्वप्न में नहीं खोना चाहिए।  हमें सजग रहना चाहिए। 


घबरा के भागना अलग है
क्षिप्र गति अलग है
क्षिप्र तो वह है
जो सही क्षण में सजग है।

भाव - सोये रहो और अचानक से दौड़ पड़ो , यह अच्छी बात नहीं है। समय पर सजग रहना चाहिए।यह अच्छी बात है। इसलिए समय को पहचानो, इसे व्यर्थ नहीं गंवाओ। समय पर सब काम करो।

भाषा अध्ययन

वाक्य पूरा करो

पंछी चिल्लाता है।
सूरज उगता है।
पवन चलता है।
हाथी चिग्घाड़ता है।
मेंढक टरटराता है।

दो - दो पर्यायवाची शब्द लिखें

पवन -- हवा, वायु।
सूरज - रवि, भास्कर।
चंदा - शशि, राकेश।
आदमी - मानव, मनुष्य।
धरती - पृथ्वी, धरा।


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लेखक

डॉ उमेश कुमार सिंह, भूली धनबाद झारखंड।

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