शांति दूत श्री कृष्ण , महाभारत प्रसंग, श्री कृष्ण शांति दूत बनकर हस्तिनापुर पहुंचे तो क्या हुआ?

 


    शांति दूत श्री कृष्ण , महाभारत प्रसंग, श्री कृष्ण शांति दूत बनकर हस्तिनापुर पहुंचे तो क्या हुआ?

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शांति की बातचीत करने के उद्देश्य से श्री कृष्णा हस्तिनापुर गए। उनके साथ-सात्यकि भी गए थे । रास्ते में कुशस्थल नामक स्थान में वह एक रात विश्राम करने के लिए ठहरे । हस्तिनापुर में जब यह खबर पहुंची कि श्री कृष्ण पांडवों की ओर से दूत बन कर संधि चर्चा के लिए आ रहे हैं तो धृतराष्ट्र ने आज्ञा दी कि नगर को खूब सजाया जाए । पुरवासियों ने द्वारकाधीश के स्वागत की धूमधाम से तैयारी की । दु:शासन का भवन दुर्योधन के भवन से अधिक ऊंचा और सुंदर था , इसलिए धृतराष्ट्र ने आज्ञा दी कि इस भवन में श्री कृष्ण को ठहरने का प्रबंध किया जाए। 


 श्री कृष्ण हस्तिनापुर पहुंच गए । पहले श्री कृष्णा धृतराष्ट्र के भवन में गए।  फिर धृतराष्ट्र से विदा लेकर वह विदुर के भवन में गए । कुंती वही श्री कृष्ण की प्रतीक्षा कर रही थी । श्री कृष्ण को देखते ही उन्हें अपने पुत्रों का स्मरण हो आया । श्री कृष्ण ने उन्हें मीठे वचनों से सांत्वना दी और उनसे विदा लेकर दुर्योधन के भवन में गए।  दुर्योधन ने श्री कृष्ण का शानदार स्वागत किया और उचित आदर सत्कार करके भोजन का न्योता दिया । श्री कृष्ण ने कहा राजन जिस उद्देश्य को लेकर मैं यहां आया हूं वह पूरा हो जाए तब मुझे भोजन करना उचित होगा । यह कहकर वे विदुर के यहां चले गए और वहां भोजन करके विश्राम किया इसके बाद श्री कृष्णा और विदुर में आगे के कार्यक्रम के बारे में सलाह हुई । विदुर ने कहा , उनकी सभा में आपका जाना भी उचित नहीं है।  दुर्योधन के स्वभाव से जो परिचित थे उनका भी यही कहना था कि वह लोग कोई ना कोई कुचक्र रचकर श्री कृष्ण के प्राणों तक को हानि पहुंचाने की चेष्टा करेंगे । विदुर की बातें ध्यान से सुनने के बाद श्री कृष्णा बोल,  मेरे प्राणों की चिंता आप ना करें। 


 दूसरे दिन सवेरे दुर्योधन और शकुनि ने आकर श्री कृष्ण से कहा,  महाराज धृतराष्ट्र आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं । इस पर विदुर को साथ लेकर श्री कृष्णा धृतराष्ट्र के भवन में गए। वासुदेव के सभा में प्रविष्ट होते हैं सभी सभासद उठ खड़े हुए । श्री कृष्ण ने बड़ों को विधिवत नमस्कार किया और आसन पर बैठे । राजदूत और सम्राट अतिथि सा उनका सत्कार किया गया।  इसके बाद श्री कृष्णा उठे और पांडवों की मांग सभा के सामने रखें । फिर वह धृतराष्ट्र की ओर देखकर बोले,  राजन! पांडव शांति चाहते हैं। वह शांतिप्रिय है परंतु साथ ही यह भी समझ लीजिए, वह युद्ध के लिए भी तैयार है । पांडव आपको पिता स्वरूप मानते हैं । ऐसा उपाय करें , जिससे आप भाग्यशाली बने।  यह सुनकर धृतराष्ट्र ने कहा,  सभासदों मैं भी वही चाहता हूं जो श्री कृष्ण को प्रिय है । 


इस पर श्री कृष्णा दुर्योधन से बोले , मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि पांडवों को आधा राज लौटा दो और उनके साथ संधि कर लो।  यदि यह बात स्वीकार हो गई तो स्वयं पांडव तुम्हें युवराज और धृतराष्ट्र को महाराज के रूप में सहर्ष स्वीकार कर लेंगे ।भीष्म और द्रोण ने भी दुर्योधन को बहुत समझाया, फिर भी दुर्योधन ने अपना हठ नहीं छोड़ा । वह श्री कृष्ण का प्रस्ताव स्वीकार करने पर राजी ना हुआ । धृतराष्ट्र ने दोबारा पुत्र से आग्रह किया कि श्री कृष्ण का प्रस्ताव मान ले नहीं तो कुल का सर्वनाश हो जाएगा।  दुर्योधन ने अपने आप को निर्दोष सिद्ध करने की जो चेष्टा की थी उससे श्री कृष्ण को हंसी आ गई । तभी श्री कृष्ण ने दुर्योधन को उन सब अत्याचारों का विस्तार से स्मरण दिलाया जो उसने पांडवों पर किए थे । 


भीष्म द्रोण आदि प्रमुख वृद्धो ने भी श्री कृष्ण के इस बातो का समर्थन किया।  यह देखकर दुशासन क्रोधित हो गया और दुर्योधन से बोला , भाई , मालूम होता है , यह लोग आपको कैद करके कहीं पांडवों के हवाले ना कर दें । इसलिए चलिए यहां से निकल चले । इस पर दुर्योधन उठा और अपने भाइयों के साथ बाहर चला गया। 


इसी बीच धृतराष्ट्र ने विदुर से कहा , तुम जरा गांधारी को सभा में ले आओ । उसकी समझ बहुत स्पष्ट है और वह दूर की सोच सकती है।  हो सकता है उसकी बातें दुर्योधन मान ले।  यह सुनकर विदुर ने सेवकों को आज्ञा देकर गांधारी को बुला लाने को भेजा । गांधारी राज सभा में आई और धृतराष्ट्र दुर्योधन को भी सभा में फिर से बुलाया । दुर्योधन सभा में लौट आया । क्रोध के कारण उसकी आंखें लाल हो रही थी।  गांधारी ने भी उसे कई तरह से समझाया परंतु दुर्योधन यह बातें मानने वाला कब था? अपनी मां को भी उसने मना कर दिया और दोबारा सभा से निकाल कर चला गया । बाहर जाकर दुर्योधन ने अपने साथियों के साथ मिलकर एक षड्यंत्र रचा और राजदूत श्री कृष्ण को पकड़ने का प्रबंध किया।  श्री कृष्ण ने तो पहले ही से इन बातों की कल्पना कर ली थी।  दुर्योधन की धृष्टता देखकर वह हंस पड़े।  श्री कृष्णा उठे । सात्यकी और विदुर उनके दोनों और हो गए । सब सभासदों ने विधिवत आजा ली । सभा से चलकर श्री कृष्ण सीधे कुंती के पास पहुंचे और उनको सभा का सारा हाल सुनाया । कुंती बोली है, कृष्णा! अब तुम ही मेरे पुत्रों के रक्षक हो। श्री कृष्ण रथ पर आरूढ़ होकर उपलब्य की ओर तेजी से रवाना हो गए।  युद्ध अवश्य संभाली हो गया । श्री कृष्ण के हस्तिनापुर से लौटते ही शांति स्थापना की जो थोड़ी बहुत आशा थी ,वह भी लुप्त होगई।


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       यही तो जीवन है !

                                Story 


यही तो जीवन है



एक कवि  बाग में टहल रहे थे।  बाग में हजारो फूल खिले थे।  बाग का नजारा स्वर्ग के जैसा था। कवि महोदय एक फूल के पास गये और बोले, मित्र , तुम कुछ दिनों में मुरझा जाओगे। फिर भी इतना मुस्कुरा रहे हो ? इतना खिले रहते हो ? तुम्हें दुख नहीं होता ?

फूल कुछ नहीं बोला। तभी एक तितली कहीं से उड़ती हुई आई और फूल पर बैठ गई। काफी देर तक तितली ने फूल के सुगंध का आनंद लिया और फिर उड़ गई। ।

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कुछ देर बाद एक भंवरा आया। उसने फूल के चारों ओर चक्कर लगाते हुए संगीत सुनाया। फूल पर बैठ कर रस पीया और चलता बना। धीमी गति से हवा चलती रही और फूल खुशियों से झूमता रहा। 

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एक मधुमक्खी आयीं और फूल का ताजा, मधुर पराग लेकर मधु बनाने चली दी। मधुमक्खी भी खुश, फूल भी खुश। तभी एक बच्चा आया। वह फूल को देखकर उसके पास गया। उसने अपने नन्हें और कोमल हाथों से फूल का स्पर्श किया और खेल में रम गया। 

अब फूल ने कवि से कहा, यह सच है कि मेरा जीवन छोटा है , लेकिन इस छोटे से जीवन से ही मैंने बहुत सारे लोगों के जीवन में मुस्कान बिखेरी है। मुझे पता है कि मुझे कल इस मिट्टी में मिल जानीं है, लेकिन इस मिट्टी ने ही मुझे ताजगी और सुगंध दी है। तो मुझे इसमें मिलने में कोई शिकायत नहीं है। 

फूल ने आगे कहा , मैं मुस्कराता हूं, क्योंकि मैं मुस्कुराना जानता हूं। मेरे बाद कल फिर इस मिट्टी में नया फूल खिलेगा। और यह बाग महक उठेगा। न ही यह ताजगी कम होगी और नहीं यह मुस्कुराहट। यही तो जीवन है। जीवन ऐसे ही चलता रहता है।


साभार 




डॉ उमेश कुमार सिंह हिन्दी में पी-एच.डी हैं और आजकल धनबाद , झारखण्ड में रहकर विभिन्न कक्षाओं के छात्र छात्राओं को मार्गदर्शन करते हैं। You tube channel educational dr Umesh 277, face book, Instagram, khabri app पर भी follow कर मार्गदर्शन ले सकते हैं।

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