Bimal hindi nibandh हिन्दी का निबंध
बिमल हिन्दी निबंध
होली
बसंत के चरमोत्कर्ष का नाम होली है। इसे बसंत उत्सव अथवा मदनोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। बसंत ऋतु की मादकता जब पराकाष्ठा पर पहुंच जाती है तब रंगों का त्योहार होली आती है। चंपा , चमेली , कनेर, गुलाब, जुही, मालती, बेला, की मादक महक, आम्र-अशोक कटहल – जामुन की किसलय कोंपलों की चमक पिंक – पपीहे की पुकार आदि चरमोत्कर्ष पर पहुंच जाता है तब आनंद और अलमस्ती का त्योहार होली आती है।
होली के संबंध में कई पौराणिक कथाएं भारतीय समाज में प्रचलित है। एक कथा के अनुसार असुराधिपति सम्राट हिरण्यकशिपु अपने आप को भगवान मानता था और अपनी प्रजा को भी ऐसा ही करने को विवश करता था। परंतु उसका पुत्र प्रह्लाद श्री विष्णु भगवान का परम भक्त था। इसलिए दोनों पिता-पुत्र एक दूसरे के बैरी बन गए थे। हिरण्यकशिपु अपने पुत्र की हरिभक्ति से तंग आकर उसे मरवाने की बड़ी कोशिशें की, लेकिन ईश्वर कृपा से वह बार-बार बच जाता था। अंत में वह प्रहलाद को मारने का जघन्य कार्य अपनी बहन होलिका को सौंपा। होलिका प्रहलाद को धधकती अग्नि कुंड में लेकर बैठ गई। उसकी योजना प्रहलाद को जला देने की थी। लेकिन परिणाम उसकी योजना के विपरीत हुआ। उल्टे होलिका जल मरी और हरि कृपा से प्रहलाद बच गया। इस प्रकार दुष्टा होलिका के मरने और प्रहलाद के बचने की खुशी में लोगों ने होली का त्योहार मनाया। इस तरह यह पाप और पुण्य की, अधर्म पर धर्म की और अनीति पर नीति की जीत का त्योहार है।
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दूसरी कथा के अनुसार जब भगवान श्री कृष्ण ने दुष्टों का संहार कर गोपिकाओं के साथ रास रचाया था, तब व्रज में होली हुई थी। तभी से होली का त्योहार मनाया जाने लगा।
वस्तुत: होली नवजीवन के संदेश का त्यौहार है। किसानों के मन प्राण आनंद से प्रफुल्लित हो उठते हैं। खेतों में गेहूं जौ, मटर, रहर की बालियों में नवान्न का आगमन होता है। वातावरण नवान्न की खुशबू से महक उठता है। सर्वत्र आशा और हर्षोल्लास का संचार होता है। तब अलमस्त किसान अपने ढोल मंजीरे की ताल पर फाग की सुरीली गीत गा उठते हैं। रंग भरी पिचकारी एक – दूसरे पर छोड़ते हैं। अबीर – गुलाल क पोटलियां खुल जाती हैं । इस दिन स्त्री - पुरुष , बाल – वृद्ध सभी एक-दूसरे के गालों पर गुलाल लगाकर गले मिलते हैं।
आज गांव – गांव में
कुओं की छांव में,
सरसों के फूल खिले, सरसों के फूल।
सज गयी वसुंधरा , ज्योति के सिंगार से,
मंजरी थिरक उठी खिल समीर प्यार से
मंद हो गया पवन फिर सुगंन्धि भार से।
किन्तु लुट गई कली ,प्रीति में गई छली
प्रेम से पगी अली फाग खेलने चली
कुंज में गली – गली ।।
होली के दिन लोग किसी धार्मिक स्थल या फिर ग्राम प्रधान के घर से टोलियां बनाकर फाग के गीत गाते हैं और अपने मित्रो, रिश्तेदार,बंधु – बांधवों के यहां जाकर गले मिलते हैं एवं होली की शुभकामनाएं देते हैं। वे उन्हें गुलाल लगाकर अपना प्रेम स्नेह अर्पित करते हैं। इसके विपरीत कुछ लोग उदंडता करने से भी बाज नहीं आते। न चाहते हुए भी कीचड़, गोबर, पोटिन आदि डालकर रंग में भंग डालते हैं तथा वृद्ध बच्चों को मानसिक पीड़ा पहुंचाते हैं। कुछ लोग तो होली की आड़ में अपनी पुरानी दुश्मनी भी निकालने से बाज नहीं आते। होली – फाग के बहाने सार्वजनिक स्थलों पर अश्लील गीतों का लाउडस्पीकर से प्रसारण करते हैं। यदि इन सब बुराइयों को छोड़ दिया जाय तो होली प्रेम , भाईचारा, खुशी एवं मस्ती का त्योहार है।
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2.सरस्वती पूजा
विद्या,ज्ञान, साहित्य, संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी की आराधना सरस्वती पूजा है। यह माघ शुक्ल पंचमी को मनाया जाता है। मां सरस्वती को आद्या, गिरा, ईश्वरी, भारती, ब्रह्मी, भाषा, महाश्वेता, वाक् वाणी, वागीशा , विधात्री, वागीश्वरी, वीणापाणि, शारदा, जगत व्यापिनी, पुस्तक धारिणी , ब्रह्म विचार सार परमा आदि कई नामों से पुकारा जाता है । ऋतुराज बसंत के शुभ आगमन से प्रकृति की समस्त बल्लरियां नवजीवन को गतिमती हो उठती हैं। आम्र, अशोक के कोमल किसलय की लालिमा युक्त हरियाली वातावरण में नवजीवन का संकेत देती है। कनेर, सेमल, चंपा, पलाश, मटर, तीसी, सरसों, गुलाब आदि के फूलों की सुंदरता और सुगंध चारों ओर मोहनी छटा बिखरती है, तब मां सरस्वती अपने सुंदर और सुकोमल हाथों से वीणा का तान छेड़ते वरदायिनी मुद्रा में भूलोक में निर्मित मंदिरों में पधारती हैं।
माता सरस्वती की कृपा अपरंपार और और अकथनीय है। फिर भी इनका स्वरूप वर्णन करते हुए भक्तजन कहते हैं – “ शुक्ला ब्रह्म विचार सार परमामाद्याम् जगद्व्यापिनीं।
वीणा पुस्तक धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम।।
हस्तें स्फाटिकमालिकां विद्धतीं पद्मासने संस्थिताम्।
वंदे मां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदाम्।।
अर्थात, मैं शुक्ल वर्ण वाली, ब्रह्म विद्या के अंतिम सार ,आद्या शक्ति, जगत में व्याप्त, वीणा पुस्तक धारण करने वाली, अभय देने वाली, जड़ता रूपी अंधकार का विनाश करने वाली, हाथ में स्फटिक की माला धारण करने वाली, पद्मासन पर विराजमान, बुद्धि प्रदान करने वाली इस परमेश्वरी शारदा माता की वंदना करता हूं।
या कुन्देन्दु तुषार हार धवला या शुभ्र वस्त्रावृता।
या वीणा वरदंडमण्डितकरा याश्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिदेवै सदा वंदिता।
हां मां पातु सरस्वती भगवती नि: शेष जाडयापहा।।
अर्थात जो कुंद, चन्द्रमा,हिम, और मुक्ताहार जैसी उज्जवल वर्ण की हैं। जो शुभ्र श्वेत वस्त्रों से आवृत हैं। जिनके सुंदर हाथों में वीणा है, जो श्वेत कमल पर विराजमान हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवगण सदा सर्वदा जिनकी स्तुति में लीन रहते हैं। जो सभी प्रकार की जडताओं का विनाश करने वाली है,वही भगवती सरस्वती मेरी रक्षा करें।
प्राय: इसी स्वरूप में देश भर के कलाकार बसंत पंचमी के हफ्तों पूर्व से ही माता की मूर्तियां बनाने में लग जाते हैं।इनका उज्जवल वर्ण ज्योतिर्मय ब्रह्म का प्रतीक है। इनकी चारों भुजाएं चारों दिशाओं में सर्व व्यापित होने का प्रतीक है। इनके एक हाथ में पुस्तक ज्ञान पर्याप्त करने का तो दूसरे हाथ में स्फटिक की माला एकाग्रता का प्रतीक है। वीणा जीवन संगीत है। कमल सृष्टि का प्रतीक है। और हंस गुण – दोष विवेचन सामर्थ्य का प्रतीक है।
सरस्वती पूजा में विद्यार्थी खूब उत्साहित रहते हैं। खासकर विद्यालयों में यह पूजा खूब धूमधाम से मनाई जाती है। तीन – चार दिन पूर्व से ही छात्र मां के मंदिर को सजाने संवारने में तल्लीन हो जाते हैं। छात्र गण मां की मनोहारी मूर्तियां स्थापित कर मनोवांछित वरदान पाने की कामना करते हैं। परन्तु, दुर्भाग्य से आजकल कुछ कलुषित परंपराएं भी विकसित होने लगी है। कुछ कलाकार अपनी दूषित मानसिकता का परिचय देते हुए मां की अनाप शनाप मूर्तियां बनाने लगे हैं।यह ग़लत है। उन्हें शास्त्रों में वर्णित मां के स्वरूप का ध्यान रखना चाहिए। कहीं कहीं कर्ण कटू और भद्दे गीतों का ध्वनि विस्तारक यंत्र से प्रसारण किया जाता है। यह अनुचित है। मां सरस्वती की पूजा बिल्कुल शांत एवं सादगी पूर्ण वातावरण में होनी चाहिए जिससे हमारी सभ्यता और संस्कृति दोषपूर्ण और अक्षुण्ण बनी रहें।
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3.रक्षाबंधन
भाई बहन के पवित्र प्रेम का त्यौहार रक्षाबंधन श्रावणी पूर्णिमा को बड़े धूमधाम और उल्लास पूर्वक मनाया जाता है। बहनों को इस दिन का बड़ा बेसब्री से इंतजार रहता है क्योंकि उनके भाई दूर-दूर से उनके पास रक्षा सूत्र बधवाने के लिए दौड़े - दौड़े चले आते हैं। बहने भाई की कलाई पर राखी बांधती है और मिठाई खिलाती है। राखी के रेशमी धागे प्रेम और त्याग के प्रतीक होते हैं।
रक्षाबंधन प्राचीन त्योहार है। पुराणों में भी इसकी कथा मिलती है। एक बार की बात है धर्मराज युधिष्ठिर ने देवकीनंदन श्री कृष्ण से सांसारिक कष्टों से मुक्ति का उपाय पूछा था। तब देवकीनंदन श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को समझाते हुए कहा, हे धर्मराज युधिष्ठिर ! मैं तुम्हें वही उपाय बताता हूं जो उपाय देवराज इंद्र की रक्षा के लिए इंद्राणी ने किया था। प्राचीन काल में बड़ा भीषण देवासुर संग्राम प्रारंभ हुआ था। युद्ध भूमि में असूरों का पलड़ा भारी पड़ रहा था। देवगन पिछड़ रहे थे। देवेंद्र भी हार की ओर अग्रसर थे। उनकी यह दशा इंद्राणी से देखी नहीं गई। उन्होंने श्रावणी पूर्णिमा के दिन विधिपूर्वक तैयार किया हुआ रक्षा सूत्र देवराज इंद्र की दाहिनी कलाई पर बांधकर श्रद्धापूर्वक युद्ध भूमि में भेजा। इस रक्षा सूत्र का बड़ा ही अद्भुत प्रभाव हुआ। देवेंद्र जीत गए और असुर राज बलि बंदी बना लिए गए। इसलिए कहा गया है कि जो मनुष्य रक्षाबंधन बांधते हैं उनके पास वर्ष भर ना तो कोई रोग आता है और ना ही कोई अशुभ प्रभाव ही पड़ता है।
सर्वरोगोपशमनं सर्वआशउभवइनआशनम् ।
सकृतत्कृतेनाब्दमेकं येन रक्षआकऋतओ भवेत्।।
रक्षाबंधन के दिन ब्राह्मण पुरोहित भी अपने यजमानों और उनके अस्त्र-शस्त्रों में तथा सेठ बनियों की तिजोरियों में रक्षा सूत्र बांधते हुए मंत्र पढ़ते हैं–
येन बद्धो बलि राजा दानवेंद्रो महाबल : ।
तेन त्वां प्रतिबद्ध नामि रक्षे मा चल मा चल ।।
भाई बहन के इस दिव्य और प्रेम भरे त्योहार की अनेक कहानियां सुनी और सुनाई जाती हैं। मुगल सम्राट हुमायूं और बहन कर्णावती की राखी की कहानी कौन नहीं जानता। दुराचारी डाकू - लुटेरे भी राखी की लाज रखने के लिए अपनी जान जोखिम पर लगा देते हैं। सचमुच रेशम के कच्चे धागे में जो अपार शक्ति निहित है , वह लोहे की मजबूत जंजीरों में नहीं है। इसलिए राखी के कच्चे धागे में जो एक बार बंध गया, उसका निकलना जीवन पर्यंत असंभव है। वास्तव में यह भाई -बहन के प्रेम और एक दूसरे की रक्षा के संकल्प का स्मारक पर्व है। एक ओर यह हमें भाई-बहन के प्रेम की याद दिलाता है, तो दूसरी ओर हमें व्यक्तिक , सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्य का भी बोध कराता है।
4. दीपावली
दीपों का त्योहार दीपावली कार्तिक महीने के अमावस्या को संपूर्ण भारतवर्ष में धूमधाम से मनाया जाता है। वर्षा ऋतु की गंदगी को साफ सुथरा करने का अभियान भी दीपावली है। दीपावली के एक महीने पूर्व से हैं लोग अपने-अपने घरों की सफाई करने में लग जाते हैं। भारतवर्ष के प्रत्येक त्योहारों में कोई न कोई पौराणिक अथवा ऐतिहासिक कथा - कहानी अवश्य जुड़ी रहती है। दीपावली से जुड़ी भी कई पौराणिक कथाएं हैं। एक कथा के अनुसार इसी दिन दशरथ - नंदन श्री राम महा पापी रावण का सर्वनाश करके अपने अनुज लक्ष्मण और भार्या सीता माता के साथ अयोध्या आए थे। उनके सकुशल अयोध्या वापस आने की खुशी में अयोध्या वासियों ने दीये जलाए थे और खुशियां मनाई थी। तब से यह त्योहार प्रत्येक वर्ष खूब धूमधाम से मनाया जाने लगा। एक दूसरी कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने इसी दिन पापी राक्षस नरकासुर का वध किया था। इसी दिन भक्त वत्सल भगवान विष्णु ने नरसिंह का अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध किया था एवं प्रहलाद की रक्षा की थी । इसी दिन समुद्र मंथन से लक्ष्मी जी प्रकट हुई थी । सिखों के छठे गुरु हरगोबिंद सिंह को मुगल कारागार से इसी दिन मुक्ति मिली थी। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर महावीर स्वामी तथा स्वामी रामकृष्ण जी का महा निर्वाण इसी दिन हुआ था। इस प्रकार दीपों का त्योहार दीपावली अपने कलेवर में कई कथाएं समेटे हुए हैं।
दीपावली की रात बड़ी मनोहरी होती है। चारों ओर दीपों की कतारें एवं रंग बिरंगी फुलझरियों से सारा वातावरण जगमगा उठता है। विभिन्न रंगों एवं आकार की मोमबत्तियां घर द्वार को नया रूप प्रदान करते हैं। अत्याधुनिक पटाखे एवं बिजली के बल्ब भी दीपावली की सुंदरता में चार चांद लगा देते हैं।
भारत कृषि प्रधान देश है। यहां हर त्योहार में कृषि और कृषक की संपन्नता की झलक समाहित होती है। कार्तिक मास में खरीफ फसलें कट कर घर आंगन में आ जाती हैं। कोठियां चावल की सोंधी खुशबू से गमगामा उठती हैं। इसी समय दीपावली का त्योहार आता है।
दीपावली के आसपास कई और त्योहार भी आते हैं। दीपावली से दो दिन पूर्व धनतेरस आता है। इस दिन नए-नए बर्तन और गहने जेवर खरीदने का प्रचलन है। दीपावली के एक दिन बाद गोवर्धन पूजा एवं दूसरे दिन भैया दूज का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र की कामना करती हैं।
दीपावली का त्योहार व्यापारी वर्ग के लिए विशेष महत्वपूर्ण है। व्यापारी वर्ग अपने दुकानों की साफ सफाई के बाद मां लक्ष्मी की आराधना बड़ी निष्ठा से करते हैं। आज के दिन वह अपने नए खाता का आरंभ भी करते हैं। घर के दरवाजों पर शुभ लाभ लिखकर कल्याण का प्रतीक स्वास्तिक का चित्र भी बनाया जाता है। बहनें घरौंदा बनाकर लक्ष्मी की पूजा करती है।
दीपावली का त्योहार हमें खूब सूझबूझ से मनाना चाहिए। यह त्योहार हमारी सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक निष्ठा का प्रतीक है। एक ओर यह हमारी विजय गाथा का बखान करता है तो दूसरी और हमारी आर्थिक संपन्नता का बोध भी कराता है। यह त्योहार मानव जाति को अंधकार से प्रकाश , असत् से सत् तथा मृत्यु से जीवन की ओर ले जाने वाला त्योहार है। सारी पृथ्वी’ तमसो मा ज्योतिर्गमय ,असतोमा सद्गमय मृत्योर्मामृत गमय’ पुकार उठाती है।
5.दशहरा
दशहरा भारत का प्रमुख त्योहार है। बंगाल सहित पूर्वी भारत में इसे दुर्गा पूजा भी कहा जाता है। यह त्योहार शारदीय नवरात्र के दशमी को बड़े धूमधाम और उल्लास पूर्वक मनाया जाता है। वास्तव में यह त्योहार पाप पर पुण्य की जीत का प्रतीक है।
दशहरा से संबंधित कई कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है दशरथ - नंदन श्री राम ने महा पापी दशानन रावण पर विजय इसी दिन प्राप्त की थी। इसके पूर्व श्री राम ने नौ दिनों तक शक्ति की अधिष्ठात्री मां भगवती देवी दुर्गा की पूजा - अर्चना बड़े मनोयोग से की थी। इसके पश्चात ही उन्हें यह विजय श्री प्राप्त हुई थी। इसी खुशी में भारतवासी दशहरा का त्योहार खूब धूमधाम से मनाते हैं।
कहा जाता है - ‘ हरते दश पापानि तस्मात दशहरा स्मृति ‘ , अर्थात दस पापों जैसे - अनवधानता , समर्थता ,आत्मवंचकता, अक्रमान्यता , दीनता, भीरूता ,परमुखापेक्षिता, शिथिलता, संकीर्णता तथा स्वार्थ परता का नाश ही दशहरा है। दसों महाविधाओं और दसों इंद्रियों पर विजय ही विजयादशमी है।
दूसरी कथा के अनुसार इसी दिन ( नवमी) माता दुर्गा ने दुष्ट मायावी दानव महिषासुर का वध किया था। कहा जाता है कि महिषासुर के आतंक से भयभीत होकर देवताओं ने मां भगवती की आराधना की। तब मां भगवती ने देवी दुर्गा का अवतार लेकर महिषासुर के आतंक से इस संसार की रक्षा की थी। दुर्गा - दुखेन गमयते प्राप्यते वा , मां दुर्जेय एवं दुर्गति नाशिनी है।
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन से ही दुर्गा पूजा प्रारंभ हो जाता है । जगह-जगह भव्य पंडालों में कलश स्थापना हो जाती है। इस दिन से ही भक्तजन बड़े ही सात्विक तरीके से मां की पूजा में तल्लीन हो जाते हैं। पंडालों में सिंह वाहिनी महिषासुर मर्दिनी मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती है । दसों हाथों में त्रिशूल , खड्ग ,चक्र, बाण, शक्ति गदा, धनुष , पास , अंकुश तथा फलसा जैसे अस्त्र-शस्त्र होते हैं। इनके आसपास लक्ष्मी , सरस्वती , गणेश , कार्तिकेय की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं। सप्तमी से दशमी तक लोगों की भीड़ पराकाष्ठा पर होती है। इस दिन नर - नारी , बाल वृदध सभी नए-नए वस्त्रों से सुसज्जित होकर मां दुर्गा के दर्शन करने जाते हैं। दसवीं के दिन लंका दहन एवं रावण वध का कार्यक्रम आयोजित होता है। इस दिन शाम को देश के विभिन्न हिस्सों में लंका दहन के पश्चात रावण , कुंभकरण और मेघनाथ की विशाल मूर्तियां स्थापित कर जलाई जाती हैं। इस तरह यह बुराई पर अच्छाई की जीत का त्योहार है। दशहरा हमें निष्ठा, पवित्रता, भाईचारा , प्रेम और मेल मिलाप का संदेश देता है। हम सभी भारतवासी इसे मिलजुल कर मनाएं जिससे हमारी सभ्यता संस्कृति सुरक्षित रह सके।
6. सरहुल
सरहुल आदिवासी जाति का मुख्य त्योहार है। जिस प्रकार हिंदू होली, मुसलमान ईद, इसाई क्रिसमस का त्योहार मनाते हैं , इसी तरह आदिवासी भाई - बंधु सरहुल का त्योहार खूब धूमधाम और हर्षोलाश से मनाते हैं। यह सारना पूजन का त्योहार है जिसमें मुर्गे की बलि और हडिया चावल से बनाया मद्य पदार्थ का अर्घ प्रदान किया जाता है।
भारत कृषि प्रधान देश है । यहां की अधिकांश जनता कृषि कार्य पर निर्भर है। इतना ही नहीं यहां के पर्व त्योहार , रीति रिवाज आदि भी कृषि पर ही आधारित हैं। वास्तव में सरहुल भी कृषि कार्य प्रारंभ करने का त्योहार है। इस दिन वहां पुरोहित साल वृक्ष के पवित्र कुंजन में पूजा अर्चना करते हैं।
सरहुल आदिवासी भाई बंधुओं की हंसी-खुशी उमंग उत्साह और आनंद का त्योहार है। इसकी तैयारी महीनों पहले से प्रारंभ हो जाती है। आजीविका की खोज में दूर-दूर गए आदिवासी भाई बहाने सरहुल का महीना शुरू होते ही अपने-अपने घरों को वापस आने लगते हैं। इतना ही नहीं आदिवासी बहनें भी ससुराल से मायके आ जाती हैं। उनके घरों की साफ सफाई होने लगती है। सभी लोग लाल - पीली मिट्टी से घरों की लिपाई पुताई प्रारंभ कर देते हैं। जब घरों की दीवारें रंग पुत जाती हैं तब उन पर विभिन्न प्रकार के पशु- पक्षी , फल- फूल के चित्र बनाए जाते हैं। ढोल - मंजीरा की मरम्मत हो जाती है । खेलकूद , नाच - गान की योजनाएं बन जाती हैं। चारों तरफ नाच- गान , चहल-पहल का वातावरण बन जाता है। घर-घर में स्वादिष्ट पारंपरिक भोजन और पकवान बनते हैं। खा- पीकर घंटों नाच गान का कार्यक्रम चलता है। नर - नारी, बाल- वृद्धि ,सभी नगाडे , मृदंग, बांसुरी के सूरों पर झूम-झूम कर नाचते- नाचते आनंद विभोर हो जाते हैं । इस मनोहारी दृश्य को देखकर कविवर भवानी प्रसाद मिश्र की यह पंक्तियां बरबस याद आ जाती हैं -
इन वनों के खूब भीतर
चार मुर्गी चार तीतर
पालकर निश्चिंत बैठे
विजन बन के बीच बैठे
झोपड़ी पर फूल डालें
गोंड तगड़े और काले
जबकि होली पास आती
सरसराती घास गाती
और महुए से लपकती ,
मस्त करती बास आती
गूंज उठते ढोल उनके
गीत इनके बोल इनके।
आदिवासी जितने सरल , निश्चल , परिश्रमी और सहृदय होते हैं , उतने ही इनके पर्व त्योहार और गीत संगीत भी। हमें भी सरहुल के त्योहार पर उनकी खुशियों में शामिल होना चाहिए।
7. क्रिसमस
क्रिसमस ईसाइयों का प्रमुख त्योहार है। हिंदुओं के लिए होली, मुसलमानों के लिए ईद का जो महत्व है , वही महत्व ईसाइयों के लिए क्रिसमस का है। वे प्रतिवर्ष 25 दिसंबर को इसे हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। इसी दिन ईश्वर पुत्र ईशा का जन्म इस धरा पर हुआ था। कहते हैं, उस समय यहूदी समाज घोर संकट से जूझ रहा था। लोग ईश्वर से एक ऐसे मसीहा को भेजने की प्रार्थना कर रहे थे जो उसे शोषण, संकट और उत्पीड़न से मुक्ति दिला सके। ईश्वर ने उनकी प्रार्थना सुन ली और एक ऐसे मसीह को पृथ्वी पर भेज दिया जो मनुष्य के हृदय से ईर्ष्या और घृणा के कीचड़ को धोकर प्रेम और भाईचारा का बीज बोने में सफल हुआ । उन्ही की याद में ईसाई समाज प्रतिवर्ष 25 दिसंबर को क्रिसमस का त्योहार मनाते हैं।
महाप्रभु ईसा मसीह की जन्म कथा इस प्रकार है- रोम के बादशाह द्वारा दंडित होकर युसूफ अपनी पत्नी मारिया के साथ पूर्वजों के घर जा रहे थे। उन्हें बहुत दूर पैदल चलना पड़ा था । रात्रि विश्राम के लिए कहीं जगह न थी। उन्होंने थक हार कर एक पहाड़ी गुफा में शरण ली। यूसुफ की पत्नी मारिया ने वहीं अपने मसीह पुत्र ईशा को जन्म दिया। जाड़े की ठिठुरती रात थी। कहते हैं, इस समय पहाड़ियों पर भेड़ें चराते गड़ेरियों को आकाश में एक चमकीला तारा दिखाई दिया। इस समय कई देवदूत आकाश से नीचे उतरे और उन गड़ेरियों को यह शुभ संदेश दिया कि पास ही में ईश्वर पुत्र ईशा ने जन्म लिया है। वही हमारे मुक्तिदाता हैं। देवदूतों ने उन्हें एक चिह्न भी प्रदान किया जिससे वे अपने मुक्तिदाता को पहचान सकें। वे देवदूतों ने ईसा के बताए मार्ग का अनुसरण करते हुए शिशु ईसा तक पहुंचे और उनके प्रथम दर्शन किए। उन्होंने शिशु ईसा की नाना प्रकार से स्तुति भी की। शिशु ईसा को वे कुछ उपहार देना चाहते थे परंतु वे इतने दीन थे कि चाहते हुए भी कुछ नहीं दे पाए। आगे चलकर प्रभु ईसा ने अपने अनुयायियों को दया, त्याग, तपस्या, परोपकार और दीन सेवा का संदेश दिया। उन्होंने जीवन में सत्ता और संपत्ति की अपेक्षा आत्मिक स्वच्छता और दीन सेवा को अधिक महत्वपूर्ण बताया। उनके आह्वान पर लाखों लाख ईसाइयों ने धन संपत्ति का त्याग कर ईसा मसीह के संदेशों का अनुसरण किया। ईसा के संदेशों से प्रेरित होकर फ्रांसिस ने अपनी सारी संपत्ति गरीबों में बांट दी। उनके द्वारा प्रचलित क्रिसमस चरनी आज संपूर्ण विश्व में प्रचलित है।
स्वर्ग का राज दीन दुखियों का है । नम्र व्यक्ति ही धन्य है। इस पृथ्वी के वही अधिकारी हैं। शुद्ध हृदय वाले ही ईश्वर को पा सकते हैं। धर्म और न्याय के निमित्त कष्ट सहने वाले लोगों के लिए स्वर्ग की निधियां सुरक्षित हैं। यह बातें ईशा के जीवन दर्शन का सार तत्व है। मनुष्य वही महान है जो आत्म- त्यागी है। दीन सेवा ही दीनानाथ की सेवा है। ईशा पाप से घृणा करते थे, पापियों से नहीं । उनके अनुसार विनम्रता और सादगी से बढ़कर अन्य कोई आभूषण नहीं होता है। ईशा के जीवन से प्रेरणा लेकर और उनके द्वारा बताएं मार्ग पर चलकर हमें मानव कल्याण के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए।
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8.गणतंत्र दिवस
गणतंत्र दिवस हमारा सबसे महत्वपूर्णराष्ट्रीय पर्व है। यह प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को खूब धूमधाम से देश भर में मनाया जाता है। इसी दिन 1950 ई को हमारा देश भारत सर्वप्रथम सर्व प्रभुत्व संपन्न गणतंत्र राष्ट्र घोषित हुआ था। इसी दिन हमारे देश में अपना संविधान लागू हुआ था।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में 26 जनवरी का महत्व बहुत पहले से है। 1929 ई की बात है। लाहौर के रावी नदी के तट पर कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हो रहा था। इस अधिवेशन की भनक अंग्रेजों को लग गई थी। उन्होंने सभा करने और जुलूस निकालने पर प्रतिबंध लगा दिया। इन प्रतिबंधों की परवाह न करते हुए आधी रात के समय रावी नदी के तट पर पंडित नेहरू ने तिरंगा झंडा लहराते हुए हजारों देशभक्तों के साथ यह प्रतिज्ञा ली थी कि जब तक हम पूर्ण स्वतंत्रता नहीं हो जाएंगे हम चैन से नहीं बैठेंगे। तभी से प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह , चंद्रशेखर आजाद, डॉ राजेंद्र प्रसाद, सरदार वल्लभभाई पटेल ,जयप्रकाश नारायण जैसे लाखों वीर सपूतों की मेहनत और कुर्बानियां रंग लाई और 15 अगस्त 1947 को हमारा देश भारत आजाद हुआ। तब से 15 अगस्त को हम स्वतंत्रता दिवस और 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं।
महा प्रलय की प्रति ध्वनियों में भी जो जनता सोती है,
यह 26 जनवरी आज उनको दे रही चुनौती है ,
नहीं जगे तो नहीं जागे यह किस्मत पर रोने वाले ,
नहीं जगे तो नहीं जगे घर फूंक हवन करने वाले ,
जिन बेशर्मों पर शर्मिंदा शर्म स्वयं भी होती है,
यह 26 जनवरी आज उनको दे रही चुनौती है। ।
कविवर डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन की यह पंक्तियां उनके लिए खास महत्वपूर्ण है जो आज भी अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए अपने देश और देशवासियों के पीठ में खंजर भोंकने का काम कर रहे हैं। यह 26 जनवरी वास्तव में प्रतिज्ञाओं और तपस्याओं की स्मृति का पर्व है। इसकी तैयारी देश भर में महीनों पहले से होने लगती है। समारोह का मुख्य आकर्षण देश की राजधानी दिल्ली का लाल किला होता है। यहां राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय ध्वजारोहण तीनों सेनाओं तथा अर्ध सैनिक बलों की परेड, विभिन्न प्रदेशों की लोक संस्कृति पर आधारित विकास सूचक झांकियां एवं गीत नृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं। इस अवसर पर कोई विदेशी मेहमान भी उपस्थित रहते हैं। तीनों सेनाओं का आयुष प्रदर्शन भी यहां होता है। प्रातः काल से ही लोगों का आना प्रारंभ हो जाता है।
राजधानी दिल्ली के अलावा देश के प्रत्येक नगर- नगर ,गांव-गांव में यह उत्सव खूब धूमधाम से मनाया जाता है ।
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