वृक्षारोपण अथवा वन महोत्सव

 

वृक्षारोपण अथवा वन महोत्सव 

वन महोत्सव की उपयोगिता 


वृक्ष धरती के श्रृंगार है। पृथ्वी को धरती यदि किसी ने बनाया है तो वह वृक्ष हैं। वृक्षों के समूह से वन बनते हैं। यदि हम कहें कि वन रूपी साम्राज्य के वृक्ष राजकुमार है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। वृक्ष अभाव में धरती केश विहीन सिर की तरह तो लगेगी है जीव विहीन हो जाएगी । इसलिए धरती पर वृक्षों का संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक। 


वन से हमें फल, फूल, लड़कियां, जड़ी - बूटियां औषधीय आदि तो मिलती ही हैं, जीवन दाहिनी प्राण वायु ऑक्सीजन के स्रोत वृक्ष ही है । वृक्षों से ही धरती पर वातावरण का संतुलन बना रहता है। कल कारखाने और जीव जंतु वातावरण में जहरीले और दमघोंटू गैस उत्सर्जित करते हैं। इन सबसे प्राणी जगत की रक्षा वृक्ष और वन हीं करते हैं।


मानव सभ्यता और संस्कृति वृक्ष की ही देन है । आदिमानव वनों में ही निवास करते थे। मानव जगत की सभ्यता संस्कृति का आरंभ वनों से ही है। मानव के लिए जब वृक्ष से उतरकर झोपड़ी बनाने की बात आई होगी तो वृक्ष की लड़कियां और पत्ते ही काम आए होंगे। प्राचीन काल में गुरुकुल का उद्भव और विकास वनों से ही हुआ था। आज ही बड़े-बड़े भवनों का निर्माण और सजावट में वृक्षों की लड़कियों का ही उपयोग किया जाता है। कुर्सी , मेज, किवाड़ और अलमारी, पलंग आदि सामान लकड़ी के ही बनते हैं। वृक्ष जल संरक्षण और मिट्टी संरक्षण में भी हमारी मदद करते हैं । जहां वृक्ष होंगे वहां बादल मंडराएंगे । वृक्ष बादलों को आकर्षित कर बरसात करवाते हैं। इतना ही नहीं, बड़े बड़े वृक्ष अपने जड़ों के माध्यम से धरती के गर्भ में समाहित जल कणों को अपने शरीर में खींचते हैं और फिर पत्तियों के रोम छिद्रों से बाहर वातावरण में पहुंचा देते हैं। इससे वातावरण में आद्रता बढ़ती है। बादल बनते हैं और वर्षा होती है । वृक्ष होने से मिट्टी का कटाव नहीं होता है। मिट्टी का अपक्षरण नहीं होता है। 


प्राचीन काल से ही लोग वनों को ईश्वर का वरदान मानते हैं और उनकी पूजा करते हैं। पीपल, बरगद, नीम तुलसी आदि वृक्षों की आज भी पूजा होती है । इन वृक्षों में अपार औषधीय गुण हैं, इसलिए प्राचीन काल से हैं वृक्षारोपण एक महान कार्य माना जाता है। वन महोत्सव में प्रति वर्ष नये नये वृक्ष लगाए जाते हैं । सरकार भी इस दिशा में काफी जागरूक हो गई है । विभिन्न योजनाएं बनाकर गांव और शहरों में वृक्षारोपण किया जाता हैं, परंतु हमें वृक्ष लगाकर निश्चिंत नहीं बैठना चाहिए। उचित देखभाल के बिना वृक्षारोपण का सही उद्देश्य पूरा होना असम्भव है। यदि हम चाहते हैं कि धरती और मानव जाति का अस्तित्व युगों युगों तक बना रहे तो हमें काटे गए वृक्षों के अनुपात से अधिक पेड़ लगाने की आवश्यकता है। अनावश्यक वन कटाव को रोककर और नवीन पौधे लगाकर ही मानव सभ्यता को समाप्त होने से बचाया जा सकता है। 



फैशन 



फैशन किसी देश के सभ्यता और संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग होता है। इससे किसी देश की सभ्यता और संस्कृति की वास्तविक जानकारी मिलती है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि किसी देश का फैशन वहां के निवासियों के रहन-सहन और सभ्यता संस्कृति का दर्पण होता है। 


प्राचीन काल से भारतीय पहनावे की धूम दूर-दूर तक फैली हुई है । भारत निर्मित वस्त्र और गहनों की मांग बहुत पहले से ही विदेशों में होती है । संपूर्ण विश्व के लोग भारतीय रंगरेजों के वस्त्र रंगने की कला के कायल हैं । पक्के रंग बनाने की कला का विकास सर्वप्रथम भारत में ही हुआ है। भारत निर्मित वस्त्र आकर्षक , टिकाऊ और आरामदायक होते हैं। प्राचीन काल में लोग करघे के बने कपड़े पहनते थे जिनमें सिलाई की उपयोगिता बहुत कम होती थी। 


भारत विभिन्नताओं में एकता का देश है। यहां भिन्न-भिन्न प्रदेशों के वस्त्र एवं पहनावे अलग-अलग प्रकार के होते हैं । पूर्व में स्थित बंगाल के लोग धोती साड़ी पहनना पसंद करते हैं तो पश्चिम में पंजाब के लोगों का पसंदीदा परिधान कुर्ता और चूड़ीदार पजामा तथा सलवार सूट है। विभिन्न अवसरों और उत्सवों पर तरह-तरह के वस्त्र और गहने पहनना यहां का फैशन ही नहीं रिवाज भी है । धार्मिक अनुष्ठानों पर अधिकांश लोग धोती- साड़ी पहनना पसंद करते हैं । रंग-बिरंगे, अलग-अलग डिजाइनों के जूते एवं चप्पल पहनना यहां की खास शौक है। भारतीय स्त्रियां आभूषण की खूब शौकीन होती हैं। उन्हें गहनों से बड़ा प्रेम है । संभवतः इसीलिए भारत में स्वर्णाभूषणों की मांग सर्वाधिक है । स्त्रियां संपूर्ण शरीर पर रंग-बिरंगे गहने धारण करती हैं । पुरुष भी इस फैशन में ज्यादा पीछे नहीं हैं । विवाहित स्त्रियां कुंवारी कन्याओं की अपेक्षा ज्यादा गहनें पहनती हैं। विवाह के शुभ अवसर पर वधुओं को वस्त्र के साथ-साथ गहने देने का प्रचलन बहुत पुराना है। इसी तरह रंग बिरंगी चूड़ियां भारतीय फैशन की अलग पहचान है। 


वर्तमान समय में फैशन अति आधुनिकता के दौर से गुजर रहा है। पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति का प्रभाव वर्तमान भारतीय फैशन पर कुछ अधिक ही छा गया है । फिल्मी सितारों और टीवी के प्रभाव ने फैशन को एक नई दिशा प्रदान की है । जींस और शर्ट पहनने का प्रचलन पुरुषों और स्त्रियों में समान रूप से देखा जा सकता है। 


फैशन के प्रति बढ़ती रुझान ने रोजगार के नए दौर का श्री गणेश किया है। आज फैशन उद्योग दिन प्रतिदिन प्रगति के पथ पर अग्रसर है। अच्छी सोच और कल्पनाशील फैशन डिजाइनर की मांग काफी बढ़ गई है । यही कारण है कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैशन अकादमी की स्थापना होने लगा है जहां फैशन की अच्छी शिक्षा प्रदान की जाती है। 



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