Kshitij part 2 Hindi ncert सूरदास के पद पाठ 1 class 10 questions answers

   


 Kshitij part 2 Hindi ncert सूरदास के पद पाठ 1 class 10 ( 2026-27)

यह पाठ दसवीं कक्षा की हिंदी पुस्तक क्षितिज 2 से ली गई है। यहां सूरदास जी द्वारा रचित पद उसके भावार्थ, प्रश्न उत्तर दिए गए हैं जो छात्र छात्राओं के लिए अत्यंत उपयोगी है। ऊधौ, तुम हो अति बड़भागी। मन की मन ही मांझी रही। अर्थ, व्याख्या, प्रश्न उत्तर MCQ 

पठित पदों की सूची 

१.ऊधौ तुम हौ अति बड़भागी ।

२. मन की मन ही मांझी रही।

३. हमारैं हरि हासिल की लकड़ी।

४. हरि हैं राजनीति पढिआए

Kshitij part 2 , 10th class Hindi के छात्र छात्राओं के लिए यहां पाठ 1 से सूरदास के पदों की संपूर्ण व्याख्या , शब्दार्थ, प्रश्न उत्तर विस्तार से दिए जा रहे हैं जिससे विद्यार्थी बंधू भगिनी को लाभ हो। महाकवि सूरदास जी की जीवनी और उनके पद भी दिए गए हैं।

 


सूरदास का जीवन परिचय


सूरदास हिंदी साहित्य के चमकते सूर्य के समान हैं। इनका जन्म मथुरा के समीप रुनकता अथवा रेणुका क्षेत्र में 1478 ई में हुआ था। इनकी पारिवारिक स्थिति के बारे में जानकारी नहीं मिलती। माता पिता अथवा परिवार के अन्य सदस्यों के विषय में जानकारी नहीं है।  सूरदास जी जन्म से अंधा थे। ये विवाद का विषय बना हुआ है। इनके गुरु बल्लभाचार्य थे।

सूरदास जी ने श्रीकृष्ण से संबंधित सवा लाख पदों की रचना की है। लेकिन अभी केवल चार पांच हजार पद ही मिलते हैं। 105 वर्ष की अवस्था में इनकी मृत्यु 1583 ई में हुई। सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी में उनके रचित पद संग्रहित हैं। 
इनके पदों की भाषा ब्रजभाषा है। वात्सल्य और श्रृंगार के ये सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। इनके पदों में उपमा, रूपक, उतप्रेक्षा, वक्रोकति अलंकारों की छटा देखते बनती है।

सूरदास और अकबर

सूरदास जी अकबर के समकालीन थे। सूरदास जी की ख्याति सुनकर अकबर तानसेन के माध्यम से उनसे मथुरा में मिला था। उसने सूरदास जी से अपने बारे में कुछ गाने को कहा। सूरदास जी ने ' नाहिंन रह्यौ मन में ठौर,नंद नन्दन अक्षत कैसे आनिए उर और ।' कहकर अकबर को निराश कर दिया। अकबर समझ गया कि हिन्दू संतों पर हमारी दाल नहीं गलने वाली है।

सूरदास और अष्टछाप

श्री वल्लभाचार्य जी ने जिन पुष्टिमार्गीय भक्ति सम्प्रदाय की स्थापना की , उसका जिन हिन्दी भक्त कवियों ने पल्लवन किया उन्हें अष्टछाप के कवि कहते हैं। इनमें चार वल्लभाचार्य जी के शिष्य और चार विट्ठल नाथ जी के शिष्य थे। सूरदास जी इसके प्रमुख भक्त कवि थे।

पठित पदों की सूची 

१.ऊधौ तुम हौ अति बड़भागी ।

२. मन की मन ही मांझी रही।

३. हमारैं हरि हासिल की लकड़ी।

४. हरि हैं राजनीति पढिआए।

​(1) ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी।

ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी।

अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।

पुरइति पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।

ज्यों जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी।

प्रीति-नदी में पाऊँ न बोरयौ, दृष्टि न रूप परागी।

'सूरदास' अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी।।

शब्दार्थ

शब्दार्थ : बड़भागी—भाग्यवान। अपरस—अलिप्त, अनछुए। तगा—धागा, बंधन। अनुरागी—प्रेम में लिप्त। पुरइति पात—कमल-पत्र। दागी—दाग, धब्बा। प्रीति-नदी—प्रेम की नदी। पाऊँ—पैर। बोरयौ—डुबोया। परागी—मुग्ध होना। अबला—नारी। भोरी—भोली-भाली। गुर चाँटी ज्यौं पागी—गुड़ से चिपटी हुई चींटियों की तरह।


अर्थ: यहाँ गोपियाँ उद्धव से व्यंग्य करते हुए कहती हैं कि आश्चर्य है कि तुम श्रीकृष्ण के निकट रहते हुए भी प्रेम-बंधन में न बँध सके। तुम कैसे भाग्यशाली हो?

​गोपियाँ उद्धव से कहती हैं यह कैसी भाग्य की विडंबना है कि तुम कृष्ण के निकट रहते हुए भी प्रेम-बंधन से मुक्त रहे; उनके प्रति अनुराग उत्पन्न नहीं हुआ। तुम श्रीकृष्ण के समीप रहते हुए भी प्रेम से उसी प्रकार अलग रहे, जिस प्रकार पानी में रहते हुए कमल-पत्र अलग (ऊपर) ही रहता है। पानी की एक बूँद भी उस पर नहीं ठहरती। तेल-युक्त मटकी को जल में डुबोने पर उसके ऊपर पानी की एक भी बूँद नहीं ठहरती। उसी प्रकार तुम भी कृष्ण के अति निकट रहते हुए भी प्रेम से सदा दूर रहे। तुमने प्रेम-नदी में आज तक अपना पैर डुबोया ही नहीं जो प्रेम के महत्व को जानते। तुम किसी के सौंदर्य पर मुग्ध ही नहीं हुए। तुम्हारी दृष्टि कृष्ण पर पड़ी ही नहीं।


एक हम ही ऐसी भोली अबलाएँ हैं जो श्रीकृष्ण के सौंदर्य में वैसे ही उलझ गईं, जैसे चींटियाँ गुड़ के प्रति आसक्त होकर ऐसे चिपट जाती हैं कि फिर अलग होना ही नहीं चाहतीं।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर MCQ 

1. इस पद में गोपियों द्वारा उद्धव को क्या कहा जाता है?

(क) बड़भागी

(ख) अनुरागी

(ग) दागी

(घ) परागी

2. श्रीकृष्ण की विरहाग्नि में किन्हें जलना पड़ रहा है?

(क) उद्धव को

(ख) गोपियों को

(ग) ग्वालों को

(घ) उपर्युक्त सभी को

3. गोपियों ने अपनी तुलना किससे की है?

(क) मधुमक्खियों से

(ख) गुड़ से चिपटी चींटियों से

(ग) कमल के फूल से

(घ) नदी के बहते नीर से

4. कृष्ण की संगति में रहकर भी कौन उनके प्रेम से अछूते रहे?

(क) राधा

(ख) गोपियाँ

(ग) उद्धव

(घ) इसमें से कोई नहीं

5. गोपियाँ स्वयं को क्या समझती हैं?

(क) निर्दयी

(ख) साहसी

(ग) अबला

(घ) डरपोक

6.इस पद के रचयिता कौन हैं ?

क. हनुमानजी 

ख. तुलसीदास 

ग. सूरदास 

घ. हरिशंकर परसाई 


उत्तर- 1. (क) 2. (ख) 3. (ख) 4. (ग) 5. (ग) 6.(ग)


पद

मन की मन ही मांझ रही

​मन की मन ही माँझ रही।

कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही।

अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।

अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।

चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।

'सूरदास' अब धीर धरहिं क्यों, मरजादा न लही।। (पृष्ठ सं. 6)

शब्दार्थ

  • अवधि: समय
  • आस: आशा
  • अधार: आधार
  • आवन: आगमन
  • बिथा: व्यथा, पीड़ा
  • बिरह: वियोग
  • गुहारि: रक्षा के लिए पुकारना
  • जितहिं तैं: जहाँ से
  • उत तैं: उधर से
  • धार: योग की प्रबल धारा
  • धीर: धैर्य
  • धरहिं: धारण करें, रखें
  • मरजादा: मर्यादा, प्रतिष्ठा
  • न लही: नहीं रही, नहीं रखी।

अर्थ

​गोपियाँ अपने प्रेम को श्रीकृष्ण के समक्ष प्रकट न करने के कारण व्यथित (दुखी) होती हुई कहती हैं कि अभिलाषाएँ मन-की-मन में ही दबकर रह गईं। अपने मन की व्यथा किससे जाकर कहें और प्रेम-पीड़ा को दूसरों के सामने प्रकट भी तो नहीं कर सकतीं। श्रीकृष्ण के लौटने की मन में आशा संजोए हुए उनके आने की अवधि को अपने जीने का आधार बनाकर तन और मन की व्यथा को सहन कर रही थीं, किंतु अब तुम्हारे योग-संदेश सुनकर विरह-पीड़ा अचानक बढ़ गई है। विरह-पीड़ा में जलती हुई हमें अपनी रक्षा का जिनसे सहारा था, रक्षा की आशा थी, जिसे हम पुकार सकते थे, उसी ओर से योग की धारा बहने लगी है। अतः हमें पूर्ण आशा थी कि एक दिन अवश्य ही श्रीकृष्ण आकर हमारी पीड़ा को शांत करेंगे। आशा के विपरीत उन्होंने योग का संदेश भेज दिया। अंत में गोपियाँ व्यथित मन से उद्धव को उलाहना देती हैं कि जिनके कारण हमने अपनी मर्यादाओं को छोड़ दिया था, उन्होंने अपनी मर्यादा का पालन नहीं किया। अब हम कैसे धैर्य धारण करें।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. उद्धव श्रीकृष्ण का कौन-सा संदेश लेकर आए थे?

(क) प्रेम-संदेश

(ख) योग-संदेश

(ग) अनुराग-संदेश

(घ) इनमें से कोई नहीं

2. गोपियाँ क्यों दुखी थीं?

(क) श्रीकृष्ण के समक्ष अपना प्रेम न प्रकट करने के कारण

(ख) उद्धव के आ जाने के कारण

(ग) अपनी मर्यादा का पालन न करने के कारण

(घ) उपर्युक्त सभी

3. श्रीकृष्ण कहाँ चले गए थे?

(क) अयोध्या

(ख) काशी

(ग) प्रयागराज

(घ) मथुरा

4. श्रीकृष्ण ने किस मर्यादा का पालन नहीं किया?

(क) प्रेम की

(ख) कुल की

(ग) संस्कारों की

(घ) इनमें से कोई नहीं

5. विरह की ज्वाला में जलती गोपियों का क्या विश्वास था?

(क) श्रीकृष्ण उन्हें अपने पास ज़रूर बुलाएंगे।

(ख) श्रीकृष्ण उनके पास अवश्य आएंगे।

(ग) श्रीकृष्ण उन्हें छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे।

(घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर— 1. (ख) 2. (क) 3. (घ) 4. (क) 5. (ख)


​(3) हमारे हरि हारिल की लकरी।

हमारे हरि हारिल की लकरी।

मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।

जागत-सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जकरी।

सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यों करुई ककरी।

सु तौ व्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।

यह तौ 'सूर' तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी।।


शब्दार्थ ( हमारे हरि हारिल की लकरी )

  • हारिल— एक ऐसा पक्षी जो अपने पैरों में सदैव एक लकड़ी लिए रहता है।
  • लकरी— लकड़ी।
  • नंद-नंदन— नंद के पुत्र श्रीकृष्ण।
  • दृढ़ करि— मज़बूती से।
  • पकरी— पकड़ी।
  • निसि— रात।
  • जकरी— रटती रहती हैं, जकड़े रहती हैं।
  • करुई— कड़वी।
  • सु— वह।
  • व्याधि— रोग, पीड़ा पहुँचाने वाली वस्तु।
  • तिनहिं— उन्हें।
  • मन चकरी— जिनका मन चक्र के समान घूमता रहता है, जिनका मन स्थिर नहीं रहता है।


अर्थ : गोपियाँ उद्धव को संबोधित करती हुई कहती हैं कि श्रीकृष्ण हमारे लिए हारिल पक्षी की लकड़ी की तरह हैं, जिन्हें हम छोड़ नहीं सकते। हारिल पक्षी अपने पैरों में पकड़ी हुई लकड़ी को किसी स्थिति में नहीं छोड़ता, वैसे ही हम अपने श्रीकृष्ण को छोड़ने में असमर्थ हैं। हम अपने प्रिय कृष्ण को मन, कर्म, वचन से अपने हृदय में बसाए हुए हैं। हम सोते-जागते, स्वप्न में, दिन में, रात में, सदैव श्रीकृष्ण की रट लगाए रहती हैं। तुम्हारे द्वारा दिया गया योग-संदेश कड़वी ककरी की तरह प्रतीत होता है, जिसके प्रति किसी प्रकार की रुचि नहीं होती। योग-साधना तो हमारे लिए ऐसा रोग है, जिसके बारे में न तो पहले कभी देखा न कभी सुना और ना ही कभी भोगा है। हे उद्धव! योग-साधना का संदेश तो उन्हें देना उचित है, जिनका मन चकरी की तरह घूमता रहता है, भटकता रहता है। हमारे लिए श्रीकृष्ण अनन्य हैं। हमारा मन उनके प्रति दृढ़ है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. इस पद में गोपियाँ 'हारिल की लकरी' किसे कहती हैं?

(क) उद्धव को

(ख) श्रीकृष्ण को

(ग) स्वयं को

(घ) इनमें से कोई नहीं

2. गोपियों को उद्धव द्वारा दिया गया योग-संदेश कैसा प्रतीत होता है?

(क) कड़वी ककड़ी के समान

(ख) कड़वे करेले के समान

(ग) कड़वे खीरे के समान

(घ) कड़वी मिर्च के समान

3. हारिल पक्षी अपने पंजे में सदैव क्या दबाए रहता है?

(क) एक पत्ता

(ख) एक लकड़ी

(ग) एक फल

(घ) इनमें से कोई नहीं

4. 'तिनहिं लै सौंपौ' में किसकी ओर संकेत किया गया है?

(क) श्रीकृष्ण की ओर

(ख) उद्धव की ओर

(ग) गोपियों की ओर

(घ) उपर्युक्त सभी

5. 'सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यों करुई ककरी' में कौन सा अलंकार है? [CBQ]

(क) मानवीकरण अलंकार

(ख) रूपक अलंकार

(ग) उत्प्रेक्षा अलंकार

(घ) उपमा अलंकार

उत्तर— 1. (ख) 2. (क) 3. (ख) 4. (ख) 5. (ग)

(4) हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।

हमारे हरि हैं राजनीति पढिआए।

समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।

इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।

बड़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-संदेस पठाए।

ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।

अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।

ते क्यों अनीति करें आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।

राज धरम तौ यहै 'सूर', जो प्रजा न जाहिं सताए।। 


अर्थ : गोपियाँ नि:संकोच उद्धव से कहती हैं कि हे भ्रमर रूप उद्धव! अब तो श्रीकृष्ण ने राजनीति पढ़ ली है। आपके योग-संदेश को सुनकर हम पहले ही समझ गई थीं, किंतु अब समाचार जानकर पूर्ण विश्वास हो गया कि श्रीकृष्ण राजनीति पढ़कर और चतुर हो गए हैं। हे उद्धव! आप पहले ही चतुर थे, उस पर भी आप अपने गुरु श्रीकृष्ण से राजनीति का ग्रंथ पढ़ आए हैं। राजनीति का ही यह प्रभाव है कि बुद्धि-चातुर्य में श्रीकृष्ण इतने कुशल हो गए हैं कि योग का ही संदेश भेज दिया।

हे उद्धव! पहले के लोग कितने भले थे जो दूसरों की भलाई के लिए भागे चले आते थे। इतना सब जान लेने पर तो हम इतनी तो आशा करती ही हैं कि हमारे मन को श्रीकृष्ण ने जाते समय चुरा लिया था, उसे हम पुन: प्राप्त कर लेंगी। आश्चर्य यह है कि जो (श्रीकृष्ण) दूसरों को अन्याय करने से रोकते रहे, वे स्वयं अनीति के रास्ते पर क्यों चल पड़े। वे प्रेम के स्थान पर योग-संदेश भेजकर हमारे ऊपर क्यों अन्याय कर रहे हैं? उनको राजधर्म नहीं भूलना चाहिए। राजधर्मानुसार प्रजा को न सताकर उसकी भलाई का ध्यान रखना चाहिए।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. गोपियाँ किसके प्रेम में आसक्त हो गई हैं?

(क) संगीत के प्रेम में

(ख) कृष्ण के प्रेम में

(ग) उद्धव के प्रेम में

(घ) इनमें से कोई नहीं

2. श्रीकृष्ण का योग-संदेश लेकर कौन आए थे?

(क) सिपाही

(ख) उद्धव

(ग) बलराम

(घ) ग्वाल-बाल

3. पहले के लोग कैसे होते थे?

(क) परोपकारी

(ख) निडर

(ग) नास्तिक

(घ) कृपालु

4. 'हरि हैं राजनीति पढ़ि आए'। इस कथन के पक्ष में निम्नलिखित कथनों को ध्यान से पढ़ें। [CBQ]

(i) श्रीकृष्ण ने प्रेम के स्थान पर योग-संदेश भेज दिया।

(ii) बुद्धि-चातुर्य में श्रीकृष्ण कुशल हो गए हैं।

(iii) गोपियों के मन को श्रीकृष्ण ने चुरा लिया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/कौन-से कथन सही है/हैं?

(क) केवल (i)

(ख) केवल (ii)

(ग) (i) और (ii)

(घ) (i), (ii) और (iii)

5. गोपियों के अनुसार सच्चा राजधर्म क्या है?

(क) प्रजा को बिलकुल नहीं सताना

(ख) प्रजा के कष्टों का निवारण करना

(ग) प्रजा के हित में कार्य करना

(घ) उपर्युक्त सभी

उत्तर— 1. (ख) 2. (ख) 3. (क) 4. (ग) 5. घ


प्रश्न-अभ्यास (पाठ्यपुस्तक से)  ऊधौ तुम हो अति बड़भागी, हमारे हरि हारिल 

1. गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में क्या व्यंग्य निहित है? [CBQ]

अथवा

सूरदास की गोपियों ने उद्धव को 'बड़भागी' किस उद्देश्य से कहा है? [CBQ] (CBSE 2024)

उत्तर— गोपियाँ उद्धव पर व्यंग्य करती हैं कि तुम्हारे भाग्य की कैसी विडंबना है कि श्रीकृष्ण के निकट रहते हुए भी तुम उनके प्रेम से वंचित रहे। श्रीकृष्ण के निकट रहकर भी उनके प्रति अनुराग नहीं हुआ, वह तुम जैसा ही भाग्यवान हो सकता है। इस तरह गोपियों उनको भाग्यवान कहकर यही व्यंग्य करती हैं कि तुमसे बढ़कर दुर्भाग्य और किसका हो सकता है।

2. उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किस से की गई है?

उत्तर— उद्धव के व्यवहार की पहली तुलना ऐसे कमल-पत्र से की गई है जो पानी में रहते हुए भी पानी से गीला नहीं होता। उद्धव की दूसरी तुलना तेल से युक्त ऐसे घड़े से की गई है जो जल में डुबोने पर भी पानी से नहीं भीगता।

3. गोपियों ने किन-किन उदाहरणों के माध्यम से उद्धव को उलाहने दिए हैं?

उत्तर— गोपियाँ उद्धव को निम्नलिखित उलाहने देकर उनको आहत करती हैं—

(i) हम गोपियाँ तुम्हारी तरह उस कमल-पत्र और तेल की मटकी नहीं हैं जो श्रीकृष्ण के पास रहकर भी उनके प्रेम से अछूती रह सकें।

(ii) हम तुम्हारी तरह निष्ठुर नहीं हैं जो समीप बहती हुई प्रेम-नदी का स्पर्श तक भी न करें।

(iii) तुम्हारे योग-संदेश हम गोपियों के लिए उपयुक्त नहीं हैं।

(iv) हमने कृष्ण को मन, वचन और कर्म से हारिल की लकड़ी की तरह जकड़ रखा है।

(v) हमें योग-संदेश कड़वी ककड़ी तथा व्याधि के समान प्रतीत हो रहा है।

4. उद्धव द्वारा दिए गए योग के संदेश ने गोपियों की विरहाग्नि में घी का काम कैसे किया?

उत्तर— गोपियाँ श्रीकृष्ण के चले जाने पर, उनसे अपने मन की प्रेम-भावना प्रकट न कर पाने के कारण विरहाग्नि से दग्ध हो रही थीं। उन्हें आशा थी कि श्रीकृष्ण लौटकर आएंगे, किंतु वे नहीं आए। जब उनका योग-संदेश उद्धव के द्वारा प्राप्त हुआ, तो उनकी विरहाग्नि और तीव्रतर हो गई। इस तरह योग-संदेश ने विरहाग्नि में घी का काम किया।

5. 'मरजादा न लही' के माध्यम से कौन-सी मर्यादा न रहने की बात की जा रही है?

उत्तर— गोपियाँ कह रही थीं कि श्रीकृष्ण के प्रति उनका प्रेम था और उन्हें पूर्ण विश्वास था कि उनके प्रेम की मर्यादा का निर्वाह श्रीकृष्ण की ओर से भी वैसा ही होगा जैसा उनका है। इसके विपरीत कृष्ण ने योग-संदेश भेजकर स्पष्ट कर दिया कि उन्होंने प्रेम की मर्यादा को नहीं रखा। जिसके लिए गोपियों ने अपनी सभी मर्यादाओं को छोड़ दिया, उसी ने प्रेम-मर्यादा का पालन नहीं किया।

6. कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को गोपियों ने किस प्रकार अभिव्यक्त किया है?

अथवा

गोपियों ने श्रीकृष्ण के प्रति अपने एकनिष्ठ प्रेम को किन उदाहरणों के द्वारा स्पष्ट किया है? (CBSE Sample Paper 2023-24) Important question answer 

उत्तर— गोपियों ने श्रीकृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को प्रकट करते हुए कहा कि—

(i) हमारा श्रीकृष्ण के प्रति स्नेह-बंधन गुड़ से चिपटी हुई चींटियों के समान है।

(ii) श्रीकृष्ण उनके लिए हारिल की लकड़ी के समान हैं।

(iii) हम गोपियाँ मन-कर्म-वचन सभी प्रकार से श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित हैं।

(iv) हम सोते-जागते, दिन-रात उन्हीं का स्मरण करती हैं।

(v) हमें योग-संदेश तो कड़वी ककड़ी की तरह प्रतीत हो रहा है। हम योग संदेश नहीं बल्कि श्रीकृष्ण का प्रेम चाहती हैं।

7. गोपियों ने उद्धव से योग की शिक्षा कैसे लोगों को देने की बात कही है? [CBSE 2020, 2022 Term-2]

उत्तर— गोपियों ने योग-शिक्षा के बारे में परामर्श देते हुए कहा कि ऐसी शिक्षा उन लोगों को देना उचित है, जिनका मन चकरी के समान अस्थिर है, चित्त में चंचलता है और जिनका कृष्ण के प्रति स्नेह-बंधन अटूट नहीं है।

8. प्रस्तुत पदों के आधार पर गोपियों का योग-साधना के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट करें।

उत्तर— प्रस्तुत पदों के आधार पर गोपियों का दृष्टिकोण स्पष्ट है कि प्रेमासक्त और स्नेह-बंधन में बँधे हृदय पर अन्य किसी उपदेश का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। चाहे वे उपदेश अपने ही प्रिय के द्वारा क्यों न दिए गए हों। यही कारण था कि अपने ही प्रिय श्रीकृष्ण के द्वारा भेजा गया योग-संदेश उनको प्रभावित नहीं कर सका।

9. गोपियों के अनुसार राजा का धर्म क्या होना चाहिए?

उत्तर- गोपियाँ अपनी राजनीतिक प्रबुद्धता का परिचय देती हुई राजा का धर्म बताती हैं कि राजा का कर्तव्य है कि वह किसी भी स्थिति में अपनी प्रजा को संतस्त न करे, अपितु उसे अन्याय से मुक्ति दिलाए तथा उसकी भलाई के लिए सोचे।

10. गोपियों को कृष्ण में ऐसे कौन-से परिवर्तन दिखाई दिए, जिनके कारण वे अपना मन वापस पा लेने की बात कहती हैं?

उत्तर- श्रीकृष्ण द्वारा प्रेषित योग-संदेश को उद्धव से सुनकर गोपियाँ अवाक् रह गईं और उन्हें लगा कि श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने पर उनकी सोच में परिवर्तन हो गया है। वे प्रेम के प्रतिदान के बदले योग-संदेश देने लगे हैं। श्रीकृष्ण पहले जैसे न रहकर एक कुशल राजनीतिज्ञ हो गए हैं, जो छल-प्रपंच का भी सहारा लेने लगे हैं। राजधर्म की उपेक्षा कर अनीति पर उतर आए हैं। इन परिवर्तनों को देख वे अपना मन वापस पाने की बात कहती हैं।

11. गोपियों ने अपने वाक्चातुर्य के आधार पर ज्ञानी उद्धव को परास्त कर दिया, उनके वाक्चातुर्य की विशेषताएँ लिखिए। [CBQ]

उत्तर- उद्धव जैसे ज्ञानी को गोपियों की वाक्पटुता चुप रहने के लिए विवश कर देती है और वे गोपियों के वाक्चातुर्य से प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। उनके वाक्चातुर्य की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

  • स्पष्टता- गोपियाँ अपनी बात को बिना किसी लाग-लपेट के स्पष्ट कह देती हैं। उद्धव के द्वारा बताए गए योग-संदेश को बिना संकोच के कड़वी ककड़ी बता देती हैं।
  • व्यंग्यात्मकता- गोपियाँ व्यंग्य करने में प्रवीण हैं। उनकी भाग्यहीनता को भाग्यवान कहकर व्यंग्य करती हैं कि तुमसे बढ़कर और कौन भाग्यवान होगा जो कृष्ण के समीप रहकर उनके अनुराग से वंचित रहे।
  • सहृदयता- उनकी सहृदयता उनकी बातों में स्पष्ट झलकती है। वे कितनी भावुक हैं—इसका ज्ञान तब होता है जब वे गदगद होकर कहती हैं कि हम अपनी प्रेम-भावना को उनके सामने प्रकट ही नहीं कर पाईं।

​इस तरह उनका वाक्चातुर्य अनुपम था।

12. संकलित पदों को ध्यान में रखते हुए सूर के भ्रमरगीत की मुख्य विशेषताएँ बताइए। [CBQ]

उत्तर- सूरदास जी का भ्रमरगीत जिन विशेषताओं के आधार पर अप्रतिम बन पड़ा है, वे इस प्रकार हैं—

​(i) सूरदास जी के भ्रमरगीत में निर्गुण ब्रह्म का विरोध और सगुण ब्रह्म की सराहना है।

(ii) वियोग श्रृंगार का मार्मिक चित्रण है।

(iii) गोपियों की स्पष्टता, वाक्पटुता, सहृदयता, व्यंग्यात्मकता सर्वथा सराहनीय है।

(iv) एकनिष्ठ प्रेम का दर्शन है।

(v) गोपियों का वाक्चातुर्य उद्धव को मौन कर देता है।










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