हंस और कौआ कहानी , सारांश
हंस और कौआ
उद्देश्य
- अपनी क्षमताओं/सीमाओं का ज्ञान कराना।
- सबके साथ बिना किसी भेदभाव के मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाते हुए अच्छा व्यवहार करने की सीख देना।
- दूसरों के गुणों का सम्मान करना सिखाना।
- अपनी गलती को स्वीकार करने की सीख देना।
- क्षमता से अधिक गुणों का बखान न करने की सीख देना।
एक सरोवर था, समुद्र जैसा बड़ा। उसके किनारे बरगद का एक बहुत बड़ा पेड़ था। उस पर एक कौआ रहता था। कौआ काजल की तरह काला, काना और लँगड़ा था। कौआ 'काँव-काँव' बोला करता था। जब वह उड़ता, तो लगता था कि अब गिरा, तब गिरा। फिर भी उसके घमंड की कोई सीमा ही नहीं थी। उसका दिमाग सदा सातवें आसमान पर रहता था। वह मानता था कि उसकी तरह न तो कोई उड़ सकता है और न कोई उसकी तरह बोल सकता है। कौआ लाल-बुझक्कड़ बनकर बैठता और सब कौओं को डराता रहता।
एक बार वहाँ कुछ हंस आए। आकर सरोवर में रातभर रहे। सवेरा होने पर कौए ने हंसों को देखा। कौआ गहरी सोच में पड़ गया—‘भला ये कौन होंगे? ये नए प्राणी कहाँ के हैं?’ कौए ने अपनी ज़िंदगी में हंस नहीं देखे होते तो वह उनको पहचान पाता। उसने अपना एक पंख घुमाया, एक टाँग उठाई और रौब-भरी आवाज़ में पूछा, "आप सब कौन हैं? यहाँ क्यों आए हैं? बिना पूछे यहाँ क्यों बैठे हैं?"
हंस ने कहा, "भैया, हम हंस हैं। घूमते-फिरते यहाँ आ गए हैं। थोड़ा आराम करने के बाद आगे बढ़ जाएँगे।"
कौआ बोला, "सो तो मैंने सब जान लिया, लेकिन अब यह बताओ कि आप कुछ उड़ना भी जानते हैं या नहीं? या अपना शरीर यों ही इतना बड़ा बना लिया है?"
हंस ने कहा, "हाँ, हाँ उड़ना तो जानते हैं और काफ़ी उड़ भी लेते हैं।"
कौए ने पूछा, "आप कौन-कौन-सी उड़ानें जानते हैं? मुझे तो इक्यावन उड़ानें आती हैं।"
हंस ने कहा, "इक्यावन तो नहीं, लेकिन एकाध उड़ान हम भी उड़ लेते हैं।"
कौआ बोला, "ओहो, एक ही उड़ान! अरे, इसमें कौन-सी बड़ी बात है?"
हंस ने कहा, "हम तो बस इतना ही जानते हैं।"
कौआ बोला, "कौए की बराबरी कभी किसी ने की है! कहाँ इक्यावन और कहाँ एक! कौआ तो कौआ है और हंस, हंस है!"
हंस सुनते रहे। वे मन-ही-मन हँसते भी रहे। लेकिन उन हंसों में एक नौजवान हंस भी था। उससे रहा नहीं गया। उसका खून उबल उठा। वह बोला, "कौए भैया, अब तो हद हो गई। छोटा मुँह बड़ी बात मत करो। आओ, हम कुछ दूर उड़ लें। लेकिन पहले तुम हमें अपनी इक्यावन उड़ानें तो दिखा दो! फिर हम भी उड़ेंगे। हमें पता चलेगा कि कैसे कौआ, कौआ है और हंस, हंस है।"
कौए ने अपनी उड़ानें दिखाना शुरू किया। एक मिनट के लिए वह ऊपर उड़ा और बोला, "यह पहली उड़ान।" फिर नीचे आया और बोला, "यह दूसरी उड़ान।" फिर पत्ते-पत्ते पर उड़कर बैठा और बोला, "यह तीसरी उड़ान।" बाद में दाहिनी तरफ़ उड़ा और बोला, "यह चौथी उड़ान।" फिर बाईं तरफ़ उड़ा और बोला, "यह पाँचवीं उड़ान।"
कौआ अपनी ऐसी उड़ानें दिखाता गया। पाँच, सात, पंद्रह, बीस, पच्चीस, पचास और इक्यावन उड़ानें उसने दिखा दीं। हंस तो टकटकी लगाकर देखते और मन-ही-मन हँसते रहे।
इक्यावन उड़ानें पूरी करने के बाद कौआ मुस्कराते-मुस्कराते आया और बोला, "कहिए, कैसी रही ये उड़ानें?"
हंस ने कहा, "उड़ानें तो गज़ब की थीं! लेकिन अब आप हमारी भी एक उड़ान देखेंगे न?"
कौआ बोला, "अरे, एक उड़ान को क्या देखना है! यों पंख फड़फड़ाए और यों कुछ उड़ लिए, इसमें क्या देखना क्या है?"
हंसों ने कहा, "बात तो ठीक है, लेकिन इस एक ही उड़ान में हमारे साथ कुछ दूर उड़ना हो, तो चलो, ज़रा उड़कर देख लो। ज़रा तुम्हें पता तो चलेगा कि यह एक उड़ान भी कैसी होती है और कौन कितने पानी में है!"
कौआ बोला, "चलो, मैं तो तैयार हूँ।"
हंस ने कहा, "लेकिन आपको साथ में ही रहना होगा। आप साथ रहेंगे, तभी तो अच्छी तरह देख सकेंगे न!"
कौआ बोला, "साथ की क्या बात है, मैं तो आगे उड़ूँगा। आप और क्या चाहते हैं?"
इतना कहकर कौए ने फटाफट पंख फड़फड़ाए और उड़ना शुरू कर दिया। बिलकुल धीरे-धीरे पंख फड़फड़ाता हुआ हंस भी पीछे-पीछे उड़ता रहा। इस बीच कौआ पीछे को मुड़ा और बोला, "कहिए, आपकी यही एक उड़ान है न, या और कुछ दिखाना बाकी है?"
हंस ने कहा, "भैया, थोड़े उड़ते चलो, उड़ते चलो, अभी आपको पता चल जाएगा।"
कौआ बोला, "हंस भैया, आप पीछे-पीछे क्यों आ रहे हैं? इतनी धीमी चाल से क्यों उड़ रहे हैं? लगता है, आप उड़ने में बहुत ही कच्चे हैं!"
हंस ने कहा, "ज़रा उड़ते रहिए। धीरे-धीरे उड़ना ही ठीक है।"
कौए के पंखों में अभी ज़ोर बाकी था। कौआ आगे-आगे और हंस पीछे-पीछे उड़ रहा था।
कौआ बोला, "कहो भैया, यही उड़ान दिखानी थी न! चलो, अब हम लौट चलें। तुम थक गए होगे। इस उड़ान में दम नहीं है। हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और।"
हंस ने कहा, "ज़रा आगे तो उड़िए। अभी उड़ान दिखाना तो बाकी है।"
कौआ आगे उड़ने लगा। लेकिन अब वह थक चुका था। तब तक आगे था, पर अब पीछे रह गया।
हंस ने पूछा, "कौए भैया, पीछे क्यों रह गए? उड़ान तो अभी बाकी है।"
कौआ बोला, "तुम उड़ते चलो, मैं देखता आ रहा हूँ और उड़ भी रहा हूँ।" लेकिन कौए भैया अब ढीले पड़ते जा रहे थे। उसमें अब उड़ने की ताकत नहीं रही थी। उसके पंख अब पानी छूने लगे थे।
हंस ने पूछा, "कौए भैया, कहिए, पानी में चोंच छुआकर उड़ने का यह कौन-सा तरीका है?"
कुछ दूर और उड़ने के बाद कौआ पानी में गिर पड़ा।
हंस ने पूछा, "कौए भैया, आपकी यह कौन-सी उड़ान है? बावनवीं या तिरपनवीं?"
लेकिन कौआ तो पानी में डुबकियाँ खाने लगा था और आखिरी साँस लेने की तैयारी कर रहा था। हंस को दया आ गई। वह फुरती से कौए के पास पहुँचा और कौए को पानी में से निकालकर अपनी पीठ पर बैठा लिया। फिर उसे लेकर ऊपर आसमान की ओर उड़ चला।
कौआ बोला, "ओ भैया! यह तुम क्या कर रहे हो? मुझे तो चक्कर आ रहे हैं। तुम कहाँ जा रहे हो? नीचे उतरो, नीचे उतरो।" वह थर-थर काँप रहा था।
हंस ने कहा, "अरे, ज़रा देखो तो सही! मैं तुमको अपनी यह एक उड़ान ही तो दिखा रहा हूँ।"
सुनकर कौआ खिसिया गया। उसको अपनी बेवकूफ़ी का पता चल गया। वह गिड़गिड़ाने लगा। यह देखकर हंस नीचे उतरा और कौए को बरगद की डाल पर बैठा दिया। तब कौए की जान में जान आई।
लेकिन, उस दिन से कौआ समझ गया कि उसकी बिसात कितनी है।
(लोककथा)
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