विघटित भारतीय परिवेश और रागदरबारी, शोध प्रबंध, मगध विश्वविद्यालय, बोधगया
विघटित भारतीय परिवेश और रागदरबारी
शोधकर्ता - डॉ उमेश कुमार सिंह
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अध्याय |
विषय विवरण |
पृ. सं. |
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प्रथम अध्याय : |
सामाजिक विघटन के कारण आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक। |
1 — 16 |
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द्वितीय अध्याय : |
समाज और परिवार का अन्तर्द्वन्द्व व्यक्तिवाद का व्यापक प्रभाव, पारिवारिक जीवन में स्वच्छन्दता, द्वेष और ईर्ष्या का अभ्युदय, आर्थिक संकट आदि। |
17 — 50 |
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तृतीय अध्याय : |
विघटित समाज और रागदरबारी — वस्तु नियोजन पर विघटन का प्रभाव। |
51 — 64 |
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चतुर्थ अध्याय : |
व्यंग्यमूलक दृष्टि और रागदरबारी व्यंग्यमूलकता और विघटन का संबंध, व्यंग्य के माध्यम से भारतीय जीवन पर प्रहार, व्यंग्य के कई कारण — रचनात्मक संवेदन में आयी हुई तीव्रता। |
65 — 82 |
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पंचम अध्याय : |
पात्र योजना और सामाजिक विघटन पात्रों की क्रिया और सोच पर प्रभाव, पात्रों के व्यवहार में बदलाव। |
83 — 100 |
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षष्ठ अध्याय : |
उपसंहार |
101 — 102 |
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सहायक ग्रन्थों की सूची |
103 — 104 |
आत्म निवेदन
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"रागदरबारी" आधुनिक काल का सर्वाधिक चर्चित एवं विवादास्पद उपन्यास है जिसके बारे में आलोचक अब तक यही निश्चित नहीं कर पाये हैं कि इसे आंचलिक उपन्यास कहा जाय, या महाकाव्यात्मक उपन्यास कहा जाय अथवा इतिवृत्तात्मक उपन्यास कहा जाय, परन्तु यह निर्विवाद कहा जा सकता है कि वर्तमान विघटित समाज का अत्यन्त व्यंग्यपूर्ण चित्रण और व्यवस्था पर इतनी गहरी निर्मम चोट पहले नहीं किया गया। प्रस्तुत शोध-अधिनिबन्ध इस उपन्यास को इसी दृष्टिापथ में रखकर भारतीय परिवेश का मूल्यांकन प्रस्तुत करता है।
सर्व प्रथम मैं उस कृपालु विभु के प्रति नतमस्तक हूँ जिनके स्मरण-मात्र से ही जीवन के सारे क्लेश मिट जाते हैं।
"विघटित भारतीय परिवेश और रागदरबारी" शीर्षक शोध-अधिनिबन्ध का यह स्वरूप पूज्य गुरुवर डॉ० पूर्णमासी राय, भूतपूर्व अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, मगध विश्वविद्यालय, बोधगया, की कृपा का फल है जिन्होंने विषय की स्वीकृति प्रदान कर मुझे अनुगृहीत किया। अतः मैं उनके प्रति नतमस्तक हो चरण-कमलों में श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ।
स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग और अपने ज्येष्ठ चाचा, श्री प्रभुनाथ सिंह के प्रति मात्र औपचारिक आभार व्यक्त कर उनकी कृपा-दृष्टि का मूल्य कम नहीं करना चाहता, जिन्होंने बचपन से आजतक मुझे हिन्दी साहित्य की ओर प्रवृत्त होने की प्रेरणा दी। इतना ही नहीं, एक गुरू की भूमिका में उन्होंने बड़े स्नेह, सहृदयता और वात्सल्य भाव से मेरा पथ-प्रदर्शन किया। जब भी मैं उलझनों और कठिनाइयों के कारण निराश हुआ, उन्होंने बड़े ही मनोवैज्ञानिक ढंग से मेरा साहस बढ़ाया और कर्त्तव्य-पथ पर अग्रसर किया।
यदि उनकी असीम अनुकंपा न होती तो मैं इस योग्य कदापि न बनता। अतः उनके स्नेह-समन्वित व्यवहार और सदपरामर्शों के प्रति किन शब्दों से कृतज्ञता व्यक्त करूं, समझ में नहीं आता। अन्ततोगत्वा, श्रद्धाकुल हृदय से उनके चरण-कमलों में विनम्र प्रणति निवेदित करता हूँ।
प्रस्तुत शोध-अधिनिबन्ध के निर्देशक डॉ० तालकेश्वर सिंह (प्रोफेसर हिन्दी विभाग, मगध विश्वविद्यालय, बोधगया) की असीम अनुकम्पा का स्मरण कर उनके चरणों में श्रद्धा-सुमन अर्पित करता हूँ, जिन्होंने इस कार्य में मुझे अद्योपान्त मार्गदर्शन किया।
उपन्यास और समीक्षा-शास्त्र के मूर्धन्य विद्वान डॉ० राम विनोद सिंह (यूनिवर्सिटी प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, मगध विश्वविद्यालय, बोधगया) के प्रति विशेष श्रद्धावनत हूँ, जिन्होंने अपने बहुमूल्य समय में से कुछ क्षणों का दान देकर इस विषय के विभिन्न पहलुओं को इंगित किया तथा समय-समय पर बहुमूल्य परामर्श भी दिये। अतः उनके प्रति भी आभार व्यक्त करता हूँ।
मैं अन्य सभी विभागीय शिक्षकों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ क्योंकि सभी शिक्षकों का स्नेह मुझे सदैव प्राप्त होता रहा है। अतः मैं सभी विभागीय गुरुजनों के प्रति श्रद्धा निवेदित करता हूँ।
मैं उन विद्वान लेखकों के प्रति भी विशेष रूप से कृतज्ञ एवं श्रद्धावनत हूँ, जिनकी रचनाओं से मैंने प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से सहायता ली है। उन सभी पुस्तकालयों के अधिकारियों और कर्मचारियों के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ जिन्होंने यथासंभव मेरी सहायता की है। इस दृष्टि से विभागीय पुस्तकालय एवं केन्द्रीय पुस्तकालय आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।
इसके अतिरिक्त मैं श्री श्लोक सिंह (ग्राम-मौनिया, बोधगया), श्री उमेश कुमार राय (ग्राम+पो०- शेरपुर, पटना) तथा अन्य सभी विभागीय एवं ग्रामीण मित्रों के प्रति विशेष रूप से कृतज्ञ हूँ जिन्होंने अपनी कृपा और सत्यपरामर्शों द्वारा इस शोध कार्य में मेरी सहायता की है।
मैं टंकक श्री राम प्रवेश शुक्ल (सहायक, स्नातकोत्तर मनोविज्ञान विभाग, मगध विश्वविद्यालय, बोधगया) को भी हार्दिक धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ जिन्होंने अत्यन्त ही अल्प समय में इस अधिनिबन्ध कार्य को सम्पन्न करने में पूरी तन्मयता से योगदान दिया है।
अन्ततोगत्वा, यह सविनय निवेदन है कि यह अधिनिबन्ध लेखन मेरा बाल-प्रयास है। अतः इसमें मुझसे जो भूलें हुई उनकी क्षमा और त्रुटिपूर्ति की पूरी आशा करके ही यह अधिनिबन्ध प्रस्तुत करता हूँ।
उमेश कुमार सिंह
गणतन्त्र दिवस 1991 बोधगया।
प्राक्कथन
स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारतीय परिवेश में जो बदलाव आया है उससे भौतिक सुखों में वृद्धि भले ही हुई है परन्तु इसके साथ ही व्यक्ति अपने पारंपरिक संस्कारों एवं उद्देश्यों से दिग्भ्रमित ज़रूर हुआ है। औद्योगिक क्रान्ति और अर्थवाद के व्यापक प्रसार के साथ ही लोगों में स्वार्थ की भावना का भी प्रसार हुआ है जिससे समाज और परिवार में विघटन अवश्यम्भावी हो गया है। आधुनिक हिन्दी उपन्यासकारों ने इस स्थिति को बखूबी समझा है, अतः इसका पूर्ण विश्लेषण आक्रोशपूर्ण शैली में अपने उपन्यासों के माध्यम से किया है।
श्रीलाल शुक्ल के "रागदरबारी" के माध्यम से विघटित होते भारतीय परिवेश का चित्रण व्यंग्यात्मक शैली में किया है। "विघटित भारतीय परिवेश और रागदरबारी" शीर्षक अधिनिबन्ध "आधुनिक भारतीय परिवेश और उसे रेखांकित करने में रागदरबारी की भूमिका" की दृष्टि में सफल प्रयास है। इस अधिनिबन्ध के पूर्व "रागदरबारी" को दृष्टिापथ में रखकर कोई शोध-कार्य नहीं सम्पन्न हुआ, भले ही कुछ विद्वानों ने समय-समय पर अपने निबन्धों एवं आलोचनाओं में प्रसंगवश "रागदरबारी" का उल्लेख किया है परन्तु उसका सम्यक विश्लेषण नहीं कर पाये हैं।
रामवृक्ष सिंह एवं डॉ० बालेन्दु शेखर तिवारी द्वारा सम्पादित "रागदरबारी : व्यंग्य संदर्भ की परख" भी "रागदरबारी" के व्यंग्यात्मक पहलुओं की ओर इंगित किया हुआ निबन्धों का संग्रह मात्र है। इस तरह प्रस्तुत
1- डॉ० राम विनोद सिंह: हिन्दी उपन्यास साठ के बाद
प्रस्तुत अधिनिबन्ध पाँच अध्यायों में विभक्त है। इसके प्रथम अध्याय में मैंने विघटन के कारणों का उल्लेख किया है। किसी भी देश का परिवेश किन परिस्थितियों और कारकों के प्रभाव में आकर विखंडित होने लगती है, इसका उल्लेख मैंने इस अध्याय में किया है।
द्वितीय अध्याय में मैंने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि किन परिस्थितियों में समाज और परिवार विघटन के कगार पर आ जाते हैं। इस सन्दर्भ में व्यक्तिवाद का व्यापक प्रभाव, पारिवारिक जीवन में स्वच्छंदता, ईर्ष्या, द्वेष, और आर्थिक संकट आदि को समाहित किया गया है।
इस अधिनिबन्ध के तृतीय अध्याय में मैंने विघटित भारतीय परिवेश को स्थापित करने में "रागदरबारी" के वस्तु-नियोजन का उल्लेख किया है।
चतुर्थ अध्याय में विघटन और व्यंग्यमूलकता के सम्बन्ध को स्थापित करने का प्रयास किया गया है, साथ ही व्यंग्य के प्रहार क्षमता की ओर इशारा करते हुए आलोच्य उपन्यास के व्यंग्यमूलकता का परीक्षण भी किया गया है।
पंचम अध्याय में मैंने उपन्यास में पात्रों के महत्त्व को प्रतिपादित किया है, साथ ही आधुनिक हिन्दी उपन्यासों में पात्रों के क्रिया और सोच तथा व्यवहार पर प्रभाव डालने वाले कारणों को भी स्थापित किया गया है। इसके अतिरिक्त प्रस्तुत अध्याय में रागदरबारी के पात्र-योजना पर भी विचार प्रस्तुत किया गया है।
इस कृति का षष्ठ अध्याय उपसंहार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसमें अध्ययन के सभी विचार - बिन्दुओं का आकलन करते हुए निष्कर्ष एवं उपलब्धियों के साथ अधिनिबन्ध की परिसमाप्ति की गई है।
अध्याय — प्रथम
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सामाजिक विघटन के कारण — आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक।
विघटन का शाब्दिक अर्थ टूटना होता है। वर्तमान युग में मनुष्य अपनी ही विकृतियों के कारण आंतरिक एवं वाह्य दोनों रूपों में टूट रहा है। वह अपने ही द्वारा बनाये गये जाल में अकेला फंस गया है। आधुनिक युग की बढ़ती समस्याओं एवं अपेक्षाकृत कम आमदनी के कारण आज मानव एक-दूसरे के हक पर अपना अधिकार जमाने पर लगे हुए हैं। पूंजीवादी वर्ग निम्न वर्ग का शोषण कर रहा है। फलस्वरूप धनी एवं साधन सम्पन्न लोगों का अलग समूह बन गया है तथा निम्न वर्ग का एक अलग समूह है। इस वर्ग भावना को पनपने का मूल आधार अर्थ ही है। अर्थ ही सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक भावनाओं को प्रभावित करता है। प्रत्येक निम्नवर्ग के व्यक्ति को यह अभीष्ट होता है कि वह अधिक-से-अधिक साधन जुटाकर धनी बन जाये। इसी प्रकार धनी व्यक्ति इतना सुविधाभोगी बन बैठा है कि वह अपने साधनों का अन्य लोगों में बटवारा नहीं करना चाहता। फलस्वरूप शोषित जनों का एक अलग-वर्ग बन जाता है और शोषक जनों का एक अलग वर्ग। मैकाईवर तथा पेज ने वर्ग की...परिभाषा देते हुए कहा है कि – "वर्ग समुदाय का वह भाग है जो सामाजिक परिस्थिति के कारण दूसरे भागों से अलग दिखाई पड़ता है।" "ए सोशल क्लास इज एनी पोर्सन ऑफ कम्युनिटी मार्क्ड ऑफ फ्रॉम दी रेस्ट वाई शोसल स्टेटस" (सोसाईटी पेज नं०-348)।
मिस्टर एम० जोर्डन के अनुसार – धन, आय, व्यवसायिक स्तर, सामुदायिक शक्तिदल की विशिष्टता, उपभोग का स्तर और पारिवारिक पृष्ठभूमि व्यक्तियों को उनके वर्गों में प्रतिष्ठित करने वाले आवश्यक तत्व हैं।¹
इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका ने वर्ग की भावना पर अपना विचार देते हुए कहा है कि किसी वर्ग विशेष के व्यक्तियों का स्तर उसकी आय, सम्पत्ति, जीविका, रहन-सहन का स्तर, शिक्षा, उसकी व्यक्तिगत शक्ति, जिसके आधार पर वह समाज के अन्य व्यक्तियों के बीच अपनी विशिष्ट स्थिति का निर्माण करता है, के द्वारा जाना जाता है।²
ल्यूक एवरसोल जैसे समाजशास्त्री ने व्यक्ति के सामाजिक स्तर का निर्माण करने वाला आवश्यक तत्त्वों में सम्पत्ति, आय, वंश-परम्परा और वैयक्तिक विशेषताओं को मान्यता दी है।³
1- सोशल क्लास इन अमेरिकन सोसाइटी, पृ०-3
2- इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका भाग-5, सं०-1960
3- अमेरिकन सोसाइटी पृ०- 262
उपरोक्त मतों की समीक्षा के उपरान्त हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वर्ग या श्रेणी किसी समाज का आवश्यक अंग है जिसका निर्माण उस समाज के श्रम, उत्पादन तथा वितरण के साधनों के द्वारा होता है। वर्तमान युग में धन ही सारी विकृतियों के मूल में विद्यमान है। प्रारम्भ में जन्म नहीं, वरन कर्म के आधार पर वर्णों का विभाजन होता था परन्तु धीरे-धीरे मानवीय आवश्यकताएं बढ़ने लगीं तथा व्यक्ति का बौद्धिक विकास होता गया, परिणाम यह हुआ कि वे अपनी हितों के लिए एकत्र होने लगे एवं सामंतवाद के खिलाफ आवाज बुलंद होने लगा।
स्वार्थ लोलुपता ही सामाजिक विघटन का सबसे सशक्त कारण है। चाहे वह लोलुपता धन इकट्ठा करने के प्रति हो, या समाज में झूठी प्रतिष्ठा पाने के लिए हो, या राजनैतिक लाभ के लिए हो। जब मनुष्य में व्यक्तिवादी भावना जड़ पकड़ती है तब वह दूसरे के अधिकारों का हनन करता है, उन्हें शोषित करता है। और, इस प्रकार समाज दो भागों में विभक्त होने लगता है। मार्क्स ने इन शोषित वर्ग को सर्वहारा वर्ग और शोषक वर्ग को पूँजीवादी वर्ग की संज्ञा दी है।
हिन्दी के सामाजिक उपन्यासकार समाज एवं मानव मूल्यों की टूटन से पीड़ित हैं। उन्हें ऐसी स्थिति से साक्षात्कार हुआ है जहाँ मनुष्य अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं। जहाँ सर्वत्र स्वार्थ, हिंसा, और द्वेष का साम्राज्य विद्यमान है। व्यक्ति ही व्यक्ति के दुश्मन हैं। और, अगर सबसे बड़ी वस्तु कुछ है तो वह स्वार्थ है। प्रेमचन्द्र ने अपनी रचनाओं में इन विघटनकारी स्थितियों को सही रूप में समझा है और उनसे उभरने का आदर्शवादी समाधान भी सुझाये हैं। उनका कहना है कि जिस समाज में गरीबों की पूछ नहीं है, वह समाज नींव विहीन घर के समान है। यही वह स्थिति है जब समाज कमजोर हो जाता है और व्यक्ति अलग-अलग समुदायों में विभक्त हो।
जाते है। मनुष्य का नैतिक पतन प्रारम्भ हो जाता है। जयशंकर प्रसाद की दृष्टि भले ही परम्परावादी रही है परन्तु उन्होंने व्यक्तिवाद को बढ़ावा दिया है। उनके समस्या समाधान में मानवतावादी दर्शन के अनेक तत्व विद्यमान हैं।¹
प्रसाद जी परम्परावादी आदर्शों का कभी तिरस्कार नहीं किये परन्तु इसके बावजूद उन्होंने समाज में व्याप्त रूढ़ियों एवं जर्जरित मान्यताओं की खामियों को समझा और उनपर तीव्र प्रहार किया। और, समाज की टूटन, गलन एवं सड़ांध पर तीव्र आक्रोश प्रकट किया है। वे व्यक्ति स्वातंत्र्य के समर्थक थे जिससे व्यक्ति कुंठा रहित होकर मानवीय मूल्य मैत्री करुणा जैसे भावों को अपना सकें। उन्होंने "तितली" में यही संदेश दिया है। वे अनुभव करते हैं कि आज का व्यक्ति कुंठावश रूढ़ियों, राजनीतिक अराजकता तथा सामाजिक विकृतियों के मध्य घिरा है। अमृतलाल नागर के उपन्यासों में भी व्यक्ति और समाज के सामंजस्य पर बल दिया गया है। नागर जी का मत है कि विवेक और संतुलन ही आज की विसंगति और स्वार्थ भरे अंधकार में मनुष्य में सामंजस्य स्थापित कर सकता है। इसमें अनास्था की नहीं बल्कि आस्था की आवश्यकता है। तभी हम प्रभावशाली ढंग से संघर्ष कर सकते हैं। "महाकाल" नामक रचना में उन्होंने व्यापक रूप से मानवीय मूल्यों की टूटन से पाठकों को साक्षात्कार कराया है। इसलिए कहा गया है कि "महाकाल" में बंगाल के अकाल में विकसित समाज तथा मानवसमूह के अर्जित मानव मूल्यों की शव परीक्षा की गई है। चारों ओर मृत्यु की विषादमय छाया, आतंक तथा भयावह परिस्थितियों में जमींदार दलाल, व्यापारी, मोनाई तथा सरकारी अफसर मिस्टर दास के लिए धन अर्जित करने का यह स्वर्ण अवसर है।²
1- हिन्दी के सामाजिक उपन्यासों में सामंतवाद, पृ०- 259
2- डॉ० सुरेश सिंह: हिन्दी उपन्यास पृ०- 237
इस उपन्यास में नागर जी ने यह सिद्ध किया है कि व्यक्ति ही व्यक्ति के अधःपतन का जिम्मेदार है। व्यक्ति ही व्यक्ति की हत्या का उत्तरदायी है। अकाल प्राकृतिक विद्रोह होते हुए भी प्रकृति का उतना कोप नहीं है, जितना मनुष्य जीवन की विडम्बना है। "अलका" उपन्यास में निराला जी ने सामाजिक विघटन का रूप प्रदर्शित किया है। सामन्त वर्ग द्वारा निम्न वर्ग का शोषण जारी है। निम्न वर्ग जमींदार के शोषण का शिकार हो रहे हैं। इस उपन्यास में मुरलीधर सामंत वर्गीय पात्र है जिसके पूर्वजों ने अंग्रेजों की सेवा के फलस्वरूप काफी जमीन अर्जित की है। इसलिए अंग्रेज अफसरों की सेवा में रत रहना उनका परम कर्त्तव्य है। विलासी जीवन बिताना उनका एकमात्र ध्येय है और इसके लिए निरीह नारियों एवं निम्न वर्ग के लोगों का शोषण उनका अभीष्ट है। निराश्रित नारियाँ एवं असहाय कृषक वर्ग उनके दमन का शिकार हैं।
समाज में मानवीय मूल्यों की अवहेलना की जा रही है। वर्तमान युग में वैसे ही वर्ग प्रतिष्ठित हैं जिनके पास पर्याप्त मात्रा में धन उपलब्ध है। आज अर्थ रूपी तुला पर मानवों की आत्मा, वजन, एवं उसके व्यक्तित्व को परखा जा रहा है। अर्थविहीन व्यक्तित्व की कोई मूल्य ही नहीं समझी जा रही है। यही कारण है कि आज समाज में असामाजिक तत्वों की बहुलता होती जा रही है। हम चाँदी के जूतों के तले इस तरह दबे हैं कि उनके विरुद्ध चाहकर भी आवाज नहीं बुलंद कर सकते। समाज में उनकी पूछ है। आधुनिक युग में सिद्धान्त और व्यवहार में परस्पर मतभेद है। सैद्धान्तिक रूप में हम जिसे गलत समझते हैं, व्यावहारिक रूप में हम चोरी-छिपे उसका सेवन कर रहे हैं। "सेवा सदन" में प्रेमचंद ने वैश्या समस्या को लेकर समाज के अन्तर्विरोधी मूल्यों पर कड़ा प्रहार किया है। एक ओर समाज में वैश्या घृणा का पात्र है। लोग उससे घृणा करते हैं परन्तु दूसरी ओर हम अपनी उत्सवों में उसे आकर्षण का केन्द्र बनाते हैं। घृणित..होते हुए भी वह देवी देवताओं के पूजन समारोह में आकर्षण का निमित्त बनती है। यह इसी कारण संभव है कि हमारी मानसिकता उस बात को स्वीकार नहीं.करती की वह दोषयुक्त है परन्तु अपनी रूढ़ियों, परंपराओं आदि के कारण हम विवश हैं और धर्म की आड़ लेकर बड़े से बड़े कुकर्म कर सकते हैं। बाजार में खुले कोकशास्त्र लेकर घूमना निंदनीय है परन्तु रामनामी चादर के भीतर महाकोकशास्त्र भी रहे तो उस पर किसी की नजर नहीं जाती। तब इन खोखले आदर्शवाद से क्या होता है, जहाँ लोग मानसिक रूप से ग्रस्त हैं। वस्तुतः "सेवासदन" की सुमन के चारित्रिक पतन का वास्तविक कारण हमारे समाज का विकृत सांस्कृतिक स्वरूप ही है। आदर्श मान्यताओं तथा व्यवहारिक जीवन में विरोध की स्थिति में समाज के नैतिक मूल्य विखड़ जाते हैं। "प्रेमाश्रम" में भी यही अन्तर्विरोधी मूल्य दृष्टि विद्यमान है। ज्ञानशंकर एक ओर आधुनिक विचारों का आश्रय लेकर संयुक्त परिवार व्यवस्था को तोड़ता है, क्योंकि इससे उसकी स्वार्थ सिद्धि होती है, किन्तु दूसरी ओर वह भाई की सम्पत्ति हड़पने के लिए पुराण पंथी विचारों का समर्थक बन जाता है। स्वार्थ अंधता के कारण उसकी दृष्टि में सांस्कृतिक मूल्य तथा विचारों का कोई मूल्य नहीं है। "कायाकल्प" के राजा विशाल सिंह की तीन पत्नियाँ हैं। तीन पत्नियों के बावजूद वे एक ऐसी सुशिक्षित लड़की से शादी सम्पन्न करना चाहते हैं जो आधुनिक और निष्कलंक हो। तीन पत्नियों का पति भी नारी की पवित्रता की मांग करता है यह कैसी विडम्बना है।
समाज में मर्दों को इतनी एकाधिकार प्राप्त है कि वह लाख बुराइयों के बावजूद...निष्कलंक है। समाज उसकी इस मांग को स्वीकार भी करती है। "कर्मभूमि" का समरकान्त भी इसी अन्तर्विरोधी स्थिति से परिपूर्ण है। वह धर्म तथा व्यापार को विकृत रूप में स्वीकार करता है। गंगा-स्नान, रामनामा, व्रत-उपवास उसके व्यक्तित्व में शामिल हैं परन्तु व्यापार क्षेत्र में वह धर्म का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करता। ऐसा लगता है जैसे जीवन के सभी सांस्कृतिक मूल्य विखंडे पड़े हैं। जब आदर्श और व्यवहार में सामंजस्य टूट जाता है तब मानवीय मूल्यों के बिखराव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। "कुंडलीचक्र" का ललितसेन भी इसी प्रकार के अन्तर्विरोधी भावनाओं से ग्रस्त प्रतीत होता है। उसकी धन लिप्सा, कंजूसी, तथा कठोर स्वभाव पाश्चात्य संस्कृति का परिणाम है परन्तु दूसरी ओर परम्परागत संस्कारों से प्रभावित होने के कारण वह अन्य विश्वासों तथा ज्योतिष पर विश्वास करता है। यही कारण है कि उसका व्यक्तित्व उलझनपूर्ण एवं अव्यवहारिक है।
सामाजिक विघटन हमारे देश में कोढ़ की तरह फैलती जा रही है। इसके कारण हमारा जीवन विषाक्त होता जा रहा है। हमें विदेशी शासन से भौतिक रूप में भले ही मुक्ति मिल गयी है परन्तु मानसिक रूप में भारतीय अभी भी जकड़े हुए हैं। जिस घृणात्मक एवं निषेधात्मक भावनाओं से हमें मुक्ति मिलनी चाहिए थी, वह मुक्ति हमें आज तक नहीं मिल पायी। कहा जाता है कि राजनीतिक स्वतंत्रता बिना आर्थिक स्वतंत्रता महत्वहीन है, यह बात पूर्णतः सत्य है परन्तु यह भी सत्य है कि राजनीतिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता बिना... क्रमशः
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