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हरिशंकर परसाई

 

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हिंदी साहित्य के यशस्वी निबंधकार हरिशंकर परसाई का जन्म मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में जमानी नामक ग्राम में 22 अगस्त 1922 को हुआ था । प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने नागपुर से हिंदी में एम.ए  करके कुछ दिनों तक अध्यापन कार्य भी किया।  फिर अध्यापन कार्य छोड़कर स्वतंत्र लेखन को ही अपना उपजिव्य बनाया।  इसी क्रम में उन्होंने जबलपुर से साहित्यिक पत्रिका वसुधा का प्रकाशन भी प्रारंभ किया था।


हरिशंकर परसाई ने 20 से अधिक रचनाएं हिंदी जगत को प्रदान की हैं। उनकी कृतियों में प्रमुख हैं-  हंसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे, ( कहानी संग्रह), रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज, ( उपन्यास) तब की बात और थी, भूत के पांव पीछे, बेईमानी की परत, पगडंडियों का जमाना , सदाचार की ताबीज, शिकायत मुझे भी है, ( निबंध संग्रह) वैष्णव की फिसलन, तिरछी रेखाएं, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, विकलांग श्रद्धा का दौर ( व्यंग संग्रह )।


परसाई की समकालीन राजनीति पर बड़ी पैनी निगाह थी। वे समाजवादी होते हुए भी वामपंथी दलों और वामपंथी लेखक संगठनों पर करारा प्रहार करने में कोई कोताही नहीं बरतते थे। सुप्रसिद्ध समालोचक डॉ रामविलास शर्मा यदि कबीर के बाद प्रेमचंद को स्वाधीनता आंदोलन का व्यंग्यकार मानते हैं तो परसाई जी को स्वतंत्रता के बाद भारत का समकालीन राजनीति के साथ-साथ धार्मिक खोखले पन और पाखंड पर उनकी दिलचस्पी कम नहीं थी। उनकी पहली रचना स्वर्ग से नरक धार्मिक पाखंड और अंधविश्वास पर करारा प्रहार है। परसाई जी  कार्ल मार्क्स से अधिक प्रभावित है।


हरिशंकर परसाई उत्तम कोटि के व्यंग्यकार माने जाते हैं। उन्होंने अपनी रचना कौशल से व्यंग्य को साहित्यिक विधा का दर्जा दिलाने में सफलता प्राप्त की है।  उनका व्यंग मनोरंजन और विलास की सामग्री मात्र ना होकर समाज की कुरीतियों पर गहरा कटाक्ष है। भ्रष्टाचार और शोषण पर भी उनके व्यंग बहुत गहरे हैं। मध्यवर्गीय लोगों में झूठी शान पाने की ललक पर उन्होंने गहरी चोट की है। ' प्रेमचंद के फटे जूते' और ' दो नाक वाले लोग' शीर्षक निबंध में उन्होंने इन प्रवृत्तियों को गहराई से उकेरा है। वे ईमानदारी से सामाजिक विसंगतियों का उन्मूलन करना चाहते थे।


हरिशंकर परसाई की भाषा शैली व्यंग प्रधान है । साधारण बोलचाल की भाषा में लिखे छोटे-छोटे वाक्य गंभीर व्यंग से उत्तम उदाहरण है , जो आसानी से हृदय की गहराइयों में उतरने में सक्षम है । तत्सम , तद्भव , उर्दू और विदेशी भाषाओं के शब्दों के प्रयोग से भाषा में और जान आ जाती है। व्यंग प्रधान होने के बावजूद उनकी रचनाओं में करुणा और सौंदर्य बोध के भी दर्शन हो जाते हैं। ' फिर भी उसी नर्मदा मैया की जय ' नामक निबंध में 16 वर्षीय केवट कन्या का करुणा और त्याग इसके प्रत्यक्ष प्रमाण है।



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