भजन और कीर्तन का आध्यात्मिक महत्व
भजन और कीर्तन का आध्यात्मिक महत्व भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में भक्ति मार्ग को ईश्वर प्राप्ति का सबसे सहज और उत्तम साधन माना गया है। श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित नवधा भक्ति में 'श्रवण' के बाद 'कीर्तन' का स्थान आता है। मानव मन चंचल है, और इस चंचलता को शांत कर परमात्मा से जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम भजन और संकीर्तन है। भजन और कीर्तन में मूल अंतर भजन: यह प्रायः व्यक्तिगत या एकांत में गाया जाने वाला ईश्वर का संगीतमय स्मरण है। इसमें साधक अपने इष्टदेव के गुणों, लीलाओं और महिमा का भावपूर्ण ध्यान करते हुए लीन होता है। कीर्तन: यह सामूहिक रूप से गाया जाने वाला प्रभु का नाम-स्मरण है। इसमें एक मुख्य गायक पंक्तियों का गायन करता है और अन्य लोग एक स्वर में उसका अनुसरण करते हैं। इसमें ढोलक, मंजीरा और खड़ताल जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की लय पर सभी भक्त मिलकर झूमते हैं। तुलसी का माला सुखदाई जीवन के लिए जिसे धारण करने से श्री हरि विष्णु प्रसन्न रहते हैं। Amazon से खरीदें कम दामों में click here आध्यात्मिक एवं मानसिक लाभ मानसिक शांति और एकाग्रता: निरंतर राम-नाम या...