सवेरे - सवेरे , हिंदी कविता, कवि कुंवर नारायण 2026-27 sawere - sawere , poem in Hindi, poet kuwar narayana

       

सवेरे सवेरे कविता

सवेरे - सवेरे , हिंदी कविता, कवि कुंवर नारायण sawere - sawere , poem in Hindi, poet kuwar narayana 



कार्तिक की एक हंसमुख सुबह!
नदी - तट से लौटती गंगा नहाकर
सुवासित भींगी हवाएं
सदा पावन
मां सरीखी
अभी जैसे मंदिरों में चढ़ाकर खुशरंग फूल
ठंड से सीत्कारती घर में घुसी हो,
और सोते देख मुझको जगाती हो --
सिरहाने रख एक फूल हरसिंगार के ,
नर्म ठंडी उंगलियों से गाल छूकर प्यार से
बाल बिखरे हुए तनिक सवांर के --


सवेरे सवेरे कविता का भावार्थ 

कुँवर नारायण की कविता 'सवेरे-सवेरे' उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है। यह कविता केवल सुबह के प्राकृतिक दृश्य का वर्णन नहीं करती, बल्कि यह मानवीय जिजीविषा (जीने की इच्छा) और अस्तित्व के गहरे बोध को व्यक्त करती है।

​इस कविता का भावार्थ निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:

​1. नई शुरुआत और निरंतरता

​कुँवर नारायण इस कविता के माध्यम से बताते हैं कि हर सुबह दुनिया का पुनर्जन्म होता है। रात का अंधेरा बीत जाने के बाद जब सूरज निकलता है, तो वह केवल प्रकाश नहीं लाता, बल्कि जीवन को एक नया अवसर देता है।

​2. प्रकृति का सहज रूप

​कविता में सुबह को बहुत ही सरल और आडंबरहीन तरीके से प्रस्तुत किया गया है। कवि ओस की बूंदों, ताजी हवा और हल्की धूप के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि शांति और सुंदरता सरल चीजों में ही छिपी है।

​3. दार्शनिक दृष्टिकोण

​कुँवर नारायण की कविताओं में अक्सर एक दार्शनिक गहराई होती है। यहाँ 'सवेरे' का अर्थ केवल समय से नहीं है, बल्कि यह चेतना के जागने का प्रतीक है। यह मनुष्य को अपने भीतर झाँकने और संसार के साथ नए सिरे से जुड़ने की प्रेरणा देती है।

​कविता की मुख्य विशेषताएं

  • सादगी: जटिल शब्दों के बजाय सीधे और मर्मस्पर्शी बिंबों का प्रयोग।
  • सकारात्मकता: निराशा के क्षणों के बाद आशा की किरण का दिखना।
  • संवेदनशीलता: प्रकृति के प्रति एक गहरा जुड़ाव और सम्मान।
  • मुख्य भाव: यह कविता हमें सिखाती है कि चाहे कल कितना भी कठिन क्यों न रहा हो, हर सुबह अपने साथ एक नई संभावना लेकर आती है। हमें बीते हुए कल के बोझ को छोड़कर वर्तमान के इस 'सवेरे' का स्वागत करना चाहिए।





प्रश्न -- प्रातः काल में नींद से कौन जगाती हैं ?


उत्तर -- प्रातःकालीन बेला में नींद से हमें मां जगाती हैं ।

 प्रश्न  सवेरे  सवेरे मां सरीखी समीर जगाने आती है । कविता में यह क्यों कहा गया है ?


उत्तर -- प्रातः काल में सवेरे सवेरे हमें सोते से मां जगाती हैं। उसी तरह सवेरे सवेरे ठंडी हवाएं थोड़ी तेज होकर हमारे गालों को छूकर हमें जगाती हैं। इसलिए कहा गया है कि सवेरे सवेरे समीर हमें जगाती है मां की तरह।

प्रश्न -- ठंडी हवाएं किस प्रकार जगाती हैं ?


उत्तर -- ठंडी हवाएं धीरे धीरे सहला कर मां की तरह जगाती हैं ।









राम नाम की महानता 




 राम -नाम - मनि दीप धरु जीह देहरि द्वार।

'तुलसी ' भीतर - बाहिरौ जो चाहसि उजियार।।

भक्त शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं --- यदि शरीर के अंदर और बाहर दोनों ओर पवित्रता का आलोक फैलाना चाहते हो तो राम - नाम रूपी दीपक को अपनी जीभ पर सदा के लिए रख लो। जिस प्रकार घर के अंदर और बाहर दोनों ओर प्रकाश के लिए दरवाजे पर दीपक रखना चाहिए, इससे  दोनों ओर प्रकाश  फैलता है। उसी प्रकार शरीर के भीतर और बाहर दोनों ओर के  हिस्से को पवित्र रखना है तो राम नाम का सदा उच्चारण करते रहो।

तुलसी दास के इस दोहे में रूपक अलंकार की बहुत सुंदर अभिव्यंजना हुई है। छंद दोहा है।


तुलसी के राम  पढ़ने के लिए क्लिक करें 


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