Phul ka mulya (story ) फूल का मूल्य, आठवीं कक्षा, महात्मा बुद्ध का प्रभाव, रवीन्द्रनाथ ठाकुर

 
फूल का मूल्य

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' फूल का मूल्य' रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित एक ऐसी कहानी है जिसमें  सच्ची भक्ति और निष्ठा को धन दौलत की चाह से ऊपर दिखाया गया है। भगवान के यहां राजा और प्रजा में कोई फर्क नहीं होता है। यहां फूल का मूल्य  कहानी का सारांश, प्रश्न उत्तर विस्तार से दिया गया है। आठवीं कक्षा में यह कहानी पढ़ाई जाती है।

शीतकाल के दिन थे प्रचंड सीट से सारे पुष्प सूख गए हैं लेकिन एक सरोवर में एक कमल दल खिला हुआ था यह सरोवर किसका है सभी अचंभित होकर उस कमल फूल को देख रहे थे क्योंकि ऐसा मनोहर फूल तो बसंत ऋतु में भी नहीं मिलता। यह सरोवर सुवास माली का था।

सुदास का मन खुश था ।वह सोच रहा था आज राजा तो इस सुंदर कमल फूल का मुंह मांगा दाम देगा। उसके सारे मनोरथ सिद्ध हो जाएंगे।

कमल फूल लेकर सुवास राजमहल के सामने खड़ा था। उसने राजमहल में खबर भेजवा दिया था। बस थोड़ी देर में राजा जी बुलवाएगे। तभी वहां एक पुरुष आया और सुदास से कहा - यह फूल तो बहुत सुंदर है, क्या यह फूल बेचना है ? सुदास ने कहा - इसे राजा के चरणों में अर्पित करना है।

उस व्यक्ति ने कहा - मुझे राजाओं के राजा तथागत के श्री चरणों में फूल अर्पित करना है, बोलो कितना लोगे ?

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सुदास ने कहा - एक माशा स्वर्ण मुद्रा की आशा है। उसने कहा , मुझे स्वीकार है।

तभी राजा प्रसेनजीत अपने पैरों पर चलते हुए महल से बाहर निकले, महात्मा बुद्ध जो पधारे हैं। उन्हें भी महात्मा बुद्ध के श्री चरणों अर्पित करने के लिए कमल फूल चाहिए था। सुदास के हाथों में कमल पुष्प देखकर वह प्रसन्न हो गए। सुदास से पूछा -इस फूल का क्या मूल्य लोगे ?

" महाराज फूल तो इस सज्जन ने ले लिया है। " सुदास ने कहा। 

किस कीमत पर ? राजा ने पूछा ?

" एक माशा स्वर्ण पर "

" मैं दस माशा देता हूं " राजा ने सुदास माली से कहा।

राजा जी को माता नवाकर उस सज्जन ने कहा - " सुदास  ! मेरे बीस माशे "

राजा को कुछ क्रोध भी आया लेकिन तभी सुवास बोल उठा - राजा जी ! आज हम और आप दोनों प्रजा और राजा नहीं, वल्कि दोनों भक्त हैं। बुरा न मानिए राजन, भक्ति के प्रवाह में  दुनियादारी की मर्यादा नहीं रहेगी।

मधुर वाणी में राजा ने कहा, मेरे चालिस माशे।

वह व्यक्ति कुछ आगे बोलता तभी सुदास बोल उठा, क्षमा करें महाराज, क्षमा करें श्री मान, मुझे यह पुष्प नहीं बेचना है। इतना कहकर माली सुदास वहां से चलता बना। दोनों आश्चर्य से देखते रह गए।

सुदास माली नगर से बाहर आ गया। एकांत में खड़ा होकर सोचने लगा, जिस बुद्ध देव के लिए ये लोग इतना द्रव्य खर्च करने को तैयार हैं, वह पुरुष स्वयं कितना धनवान होगा ? उसी के चरणों में यह पुष्प अर्पित कर दूं तो न जाने कितना द्रव्य मिलेगा ?

वट वृक्ष की छाया में महात्मा बुद्ध पद्मासन लगाकर बैठे थे। उज्ज्वल ललाट, मुख पर आनंद की प्रभा, ओंठो से सुधा झर रही थी और नयनों से अमृत टपक रहा था।

भूमि पर झुक कर सुदास ने इस परम तपस्वी के चरणों में कमल फूल चढ़ा दिया। सुदास का मन शांत था।

स्मित भरे मधुर स्वर में बुद्धदेव ने प्रश्न किया, " हे वत्स ! कुछ कहना है ? कुछ चाहिए ?

गद्गद स्वर में माली ने कहा -" और कुछ नहीं , आपकी चरण रज की एक कणिका ।" 

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फूल का मूल्य कहानी का प्रश्न उत्तर  questions answers phul ka mulaya

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1. कहानी में किस ऋतु का वर्णन किया गया है ? इस ऋतु का क्या प्रभाव दिखाई पड़ रहा था ? 

उत्तर - फूल का मूल्य कहानी में शीत ऋतु का प्रभाव दिखाई पड़ रहा था। शीत ऋतु के प्रभाव से सारे पुष्प सूख गए थे।

2. सुदास का मन आनंद से नाच उठा क्यों ?

उत्तर - शीत काल में सुंदर कमल फूल देखकर सुदास का मन आनंद से नाच उठा क्योंकि उसे लगा कि इस ऋतु में फूल तो मिलते नहीं है, इसलिए राजा उसे मनमुताबिक मूल्य देंगे।

3 वह सरोवर किसका था जिसमें फूल खिला था ?

उत्तर - वह सरोवर सुदास माली का था जिसमें फूल खिला था।

4. सुदास का चरित्र चित्रण करें।

उत्तर - सुदास एक माली था। फूल बेचकर वह अपनी आजीविका चलाता था। प्रत्येक वयवसायी की तरह सुदास भी अपने द्वारा बेचे जाने वाले वस्तु का अधिक से अधिक मूल्य लेना चाहता है, परन्तु जैसे ही उसकी भेंट महात्मा बुद्ध से होती है,उसका लोभ समाप्त हो जाता है। इस तरह वह धार्मिक बनाता है । सुदास का चरित्र चित्रण में लेखक सफल हुआ है।

5. कोयल के कूकने को कैसा चिह्न माना जाता है ?

उत्तर - कोयल के कूकने को शुभ संकेत माना जाता है।

6. माली सुवास फूल क्यों बेचना चाहता था ?

उत्तर - माली सुदास पैसे के लिए फूल बेचना चाहता था।

7. फूल का मूल्य राजा ने कहां तक लगाया और भक्त ने कहां तक ?

उत्तर - राजा ने फूल का मूल्य चालीस मासा लगाया, भक्त ने बीस मासा।



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